चुनाव का मौसम आते ही राजनीति की फिजा में एक अजीब-सा बदलाव आ जाता है। जो नेता पांच साल तक लोगों की पहुंच से दूर रहते हैं, वे अचानक जनता के सबसे करीबी हो जाते हैं। किसी के घर चाय का कप, किसी के खेत में चक्कर, किसी के दुख में मौजूदगी और किसी के कंधे पर हाथ—ऐसा लगता है जैसे लोकतंत्र नहीं, बल्कि रिश्तेदारी का कोई बड़ा समारोह चल रहा हो।
लेकिन असली खेल तो तब शुरू होता है, जब चुनावी वादों की पोटली खुलती है। मुफ्त बिजली, नौकरियां, पक्के रोजगार, किसानों की आय में बढ़ोतरी, युवाओं को रोजगार, सड़कों की कायापलट, स्वास्थ्य सुविधाएं, शिक्षा में क्रांति, 31 दिसंबर तक नशे का खात्मा—वादों की सूची इतनी लंबी होती है कि कई बार लगता है कि सरकार बनते ही हर समस्या अपनी मौत खुद मर जाएगी।
भारतीय लोकतंत्र में चुनावी घोषणा-पत्र कोई कानूनी समझौता नहीं होता। इसी वजह से वादा करने वाले नेता के लिए उसकी राजनीतिक कीमत और जवाबदेही के बीच बड़ा फासला बन जाता है। नेता के लिए वादा अक्सर चुनाव लड़ने की रणनीति होता है, लेकिन आम नागरिक के लिए वही वादा उसके घर की रसोई, बच्चे की फीस, नौकरी, इलाज और बुढ़ापे की सुरक्षा से जुड़ी उम्मीद होता है।
यहीं इस पूरी कवायद की सबसे कड़वी बात सामने आती है—चुनाव से पहले वोटर को “मालिक” कहा जाता है और चुनाव के बाद वही मालिक अपने काम के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता हुआ बेहाल नजर आता है।
हकीकत यह है कि भारत में चुनावी वादों की पूर्ति को लेकर जवाबदेही का कोई एकसमान और मजबूत कानूनी ढांचा नहीं है। ऐसे में वोटर की सबसे बड़ी ताकत उसका वोट ही रह जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वोटर हर बार जाति, धर्म, निजी रिश्ते, तत्काल लाभ या भावनात्मक नारों से ऊपर उठकर उम्मीदवार के पिछले कार्यकाल का हिसाब मांगता है?
क्योंकि लोकतंत्र में सिर्फ नेता ही जवाबदेह नहीं होता, वोटर का फैसला भी जवाबदेह होता है।
वादे सुनने से पहले यह पूछना जरूरी है कि पैसा कहां से आएगा? योजना कब पूरी होगी? कितने लोगों को इसका लाभ मिलेगा? पिछले वादों में से कितने पूरे हुए? और अगर वादा पूरा नहीं हुआ तो जवाबदेह कौन होगा?
वरना हर चुनाव में नया नारा आएगा, नई उम्मीद जगेगी, नए वादे होंगे और कुछ साल बाद वही पुरानी कहानी दोहरा दी जाएगी।
राजनेताओं को वादे करने का अधिकार है, लेकिन वोटर को हिसाब मांगने का भी पूरा अधिकार है।
क्योंकि लोकतंत्र में वोट सिर्फ उंगली पर लगी स्याही नहीं है—यह पांच साल के लिए दिया गया भरोसा है।
और जब भरोसा बार-बार झूठे दिलासों में बदल जाए, तो सवाल नेता से नहीं, बल्कि खुद से पूछना चाहिए—
“हमने वादा सुनकर वोट दिया था या वादे का हिसाब लेकर?”
आस-पास के लोग आज भी यही सोच रहे हैं। चुनाव तो हर पांच साल बाद आ जाते हैं, लेकिन वादों का हिसाब कब आएगा?
छत्रपाल सिंह





