किसी भी सिख को गुरु साहिब की इस लीला और इसके उद्देश्य की जानकारी नहीं थी। जब जंगल गए सिंह कुत्तों को पकड़कर वापस आए तो गुरु साहिब ने चावल पकाने वाले सिखों को आदेश दिया कि साफ चादरें बिछाकर ये चावल कुत्तों के खाने के लिए डाल दिए जाएँ। जब यह प्रक्रिया शुरू हुई तो गुरु साहिब ने रस्सियों से बंधे कुत्तों की रस्सियाँ खोलने का आदेश दिया। सभी कुत्ते एक साथ चावल खाने के लिए झपट पड़े। लेकिन उनमें से किसी एक ने भी एक चावल तक नहीं खाया। वे एक-दूसरे की टाँगों और कानों को काटकर लहूलुहान हो गए और चावल वैसे ही खराब पड़े रह गए।
यह दृष्टांत देखने के बाद भी सिखों को इसकी सीख समझ नहीं आई।
गुरु साहिब ने फिर सिखों को दोबारा चावल बनाने का आदेश दिया और कुछ सिंहों को जंगल से 8-10 हिरन पकड़कर लाने के लिए भेजा। कुछ समय बाद चावल पककर तैयार हो गए। इसी बीच हिरन पकड़ने गए सिंह भी हिरनों को साथ लेकर वापस आ गए। गुरु साहिब ने फिर उसी प्रकार सिखों को चावल बिछाने और हिरनों की रस्सियाँ खोलने का आदेश दिया।
हिरनों ने एक कतार बनाकर भरपेट चावल खाए और फिर एक-एक करके वहाँ से जाकर धूप में आराम करने लगे।
इसके बाद एक सिख ने अपनी जिज्ञासा व्यक्त करते हुए गुरु साहिब से पूछा कि आपके इस दृष्टांत से हमें कुछ समझ नहीं आया।
तब गुरु साहिब ने समूचे सिख समुदाय के एकत्रीकरण में घोषणा की कि लंबे संघर्ष, कुर्बानियों, शहादतों और कठिनाइयों के बाद अब हमारा खालसा राज स्थापित होने वाला है। सिखों को अपने खालसा राज का प्रबंध करते हुए कुत्तों की तरह नहीं, बल्कि हिरनों की तरह आपस में प्रेम और भाईचारा रखते हुए, संयम और दृढ़ता के साथ अपने राज-भाग्य को चलाना है।
आज पंजाब और सिख कौम की राजनीति की जो स्थिति है, वह बिल्कुल गुरु साहिब के समय के हालात जैसी प्रतीत होती है। लंबे संघर्ष और कौमी, आर्थिक, सामाजिक, नैतिक तथा राजनीतिक नुकसान के बाद समूची सिख कौम और पंजाबी पंजाब में ‘सरबत के भले’ की सोच वाली सरकार स्थापित करने की तीव्र इच्छा रखती है और इसके लिए व्यावहारिक रूप से तैयार भी है।
इसलिए आगामी चुनावों में ऊँचे और शुद्ध चरित्र वाले सिखों तथा पंजाबियों को जिताकर अपनी सरकार स्थापित करने की इच्छा लोगों के मन में है। लेकिन सिख नेतृत्व में अपनी-अपनी अहंकार भावना, राजनीतिक और आर्थिक लालसाओं के कारण गुरु साहिब के इस दृष्टांत में परखी गई भावनाओं के अनुसार हिरनों की तरह एकजुट होकर राज-भाग स्थापित करने का प्रयास दिखाई नहीं दे रहा। इसे लेकर सिख कौम और चिंतनशील सिख गहरी चिंता में हैं।
हम समूची वर्तमान लीडरशिप की तुलना गुरु साहिब के दृष्टांत में शामिल कुत्तों या हिरनों में से किसी के साथ नहीं करते। लेकिन वर्तमान नेतृत्व स्वयं अपनी अंतरात्मा में झाँककर देखे कि वह किस प्रकार का आचरण कर रहा है। आज की लीडरशिप को अपनी अंतरात्मा से इसका सही उत्तर स्वयं मिल जाएगा।
यदि सिख नेतृत्व श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के इस दृष्टांत के कौमी और मानवतावादी उद्देश्य को समझकर हिरनों की तरह सूझ-बूझ और एकता के साथ आचरण कर सकेगा, तो खालसाई सरकार की स्थापना को दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकेगी।
अन्यथा आने वाले समय में कौम को चारों ओर होने वाली निश्चित निराशा और दुश्मन ताकतों द्वारा पंजाबियों तथा सिखों के साथ किए जाने वाले जुल्म और भेदभाव से बचना कठिन होगा।
वाहेगुरु भली करें कि हमारी वर्तमान लीडरशिप अपने महान इतिहास से सबक लेकर खालसाई सरकार की स्थापना में अपना योगदान दे सके।
लेखक: इकबाल सिंह टिवाणा
98783-44432





