लोकतंत्र में चुनाव जीतना जनता की सेवा करने का अधिकार है, न कि जनता को अपने अधीन करने का लाइसेंस। लेकिन जमीनी हकीकत में कई बार विजयी उम्मीदवार लोगों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें आपसी लड़ाइयों में उलझाकर, विकास कार्यों का दिखावा करके और अपनी नाकामियों पर पर्दा डालकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते हैं। यह रवैया किसी एक पार्टी या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। इसकी जांच तथ्यों, दस्तावेजों और सार्वजनिक जवाबदेही के आधार पर होनी चाहिए।
पुराने तरीकों में गुटबाजी, जाति-बिरादरी के आधार पर पक्षपात, चुनाव में विरोध करने वालों की अनदेखी करना और सामूहिक कार्यों को निजी एहसान के रूप में पेश करना शामिल है। नए तरीकों में व्हाट्सऐप ग्रुपों के माध्यम से अधूरी जानकारी फैलाना, सोशल मीडिया पर किसी एक पक्ष की बात को तोड़-मरोड़कर पेश करना और विरोधियों को विकास विरोधी बताना शामिल है।
यदि गांव की किसी गली के निर्माण को लेकर दो मोहल्लों के बीच विवाद पैदा हो जाता है, तो यह जांचना चाहिए कि विवाद तकनीकी कारणों से है या निर्णय लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी के कारण। आरोप लगाने के बजाय बैठक की कार्यवाही, स्वीकृत नक्शे और कार्यों की प्राथमिकता से संबंधित रिकॉर्ड मांगे जाने चाहिए।
दिखावे की राजनीति में नींव-पत्थर रखना, फोटो खिंचवाना, उद्घाटन करना, सोशल मीडिया पर पोस्ट डालना और अधूरे कार्यों को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करना शामिल हो सकता है। लेकिन फोटो विकास का प्रमाण नहीं है और न ही घोषणा किसी काम के पूरा होने की गारंटी है।
यदि सड़क बनाने का दावा किया गया है, तो पांच सवाल जरूर पूछें—कितनी लंबाई में सड़क बनी? बजट कितना था? कितनी राशि खर्च हुई? काम कब तक पूरा होना था? वर्तमान में उसकी गुणवत्ता कैसी है? सरकारी मंजूरियों, वर्क ऑर्डर, बिलों और मौके की तस्वीरों की तुलना करके वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए।
नाकामी की जिम्मेदारी दूसरे विभाग पर डालना, हर समस्या के लिए पिछली सरकार को जिम्मेदार ठहराना, वास्तविक आंकड़ों के बजाय चुनिंदा आंकड़े दिखाना और बार-बार नई घोषणाएं करके पुराने वादों को भुला देना, जवाबदेही से बचने के संभावित तरीके हैं। आधुनिक दौर में पुरानी तस्वीरों को नए कार्यों के रूप में प्रस्तुत करना या किसी घटना का अधूरा वीडियो साझा करना भी लोगों को गुमराह करने का माध्यम बन सकता है।
इसका जवाब भावनात्मक बहस नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच है। चुनावी घोषणापत्र, बजट, सरकारी आदेशों, ऑडिट रिपोर्टों और वास्तविक कार्यों की स्थिति का मिलान करें। जरूरत पड़ने पर सूचना का अधिकार (RTI) कानून का इस्तेमाल करें और संबंधित अधिकारी से लिखित जवाब मांगा जाना चाहिए। किसी भी उम्मीदवार की नाकामी का फायदा तब बढ़ जाता है, जब लोग सवाल पूछना छोड़ देते हैं। यदि मतदाता केवल चुनाव के समय सक्रिय हों और बाकी समय विकास कार्यों की निगरानी न करें, तो वादों और हकीकत के बीच की खाई बढ़ती जाती है।
इसलिए हर वार्ड या गांव में नागरिक निगरानी समिति बनाई जानी चाहिए, विकास कार्यों की समय-सीमा सार्वजनिक की जानी चाहिए और प्रत्येक तीन महीने बाद खुली जवाबदेही बैठक आयोजित की जानी चाहिए। शिकायतों को तारीख, सबूत और प्राप्ति संख्या के साथ दर्ज किया जाना चाहिए।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत न झूठा प्रचार है, न पद और न ही भीड़, बल्कि सबसे बड़ी ताकत जागरूक नागरिक है। विजयी उम्मीदवार की असली परीक्षा उसकी तस्वीरों, भाषणों और दावों से नहीं, बल्कि पारदर्शिता, कार्यक्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही से होती है। जनता को किसी के खिलाफ भड़काना आसान है, लेकिन जनता को तथ्यों के आधार पर जागरूक करना ही वास्तविक लोकतांत्रिक सेवा है।
छत्रपाल सिंह






