विशेष संपादकीय | तकनीकी युग में मानवीय कौशल की अनकही त्रासदी
मानव इतिहास में हर नई तकनीक ने काम करने के तौर-तरीकों को बदला है। कृषि के मशीनीकरण ने हाथों से होने वाली मेहनत की जगह मशीनों को दी, औद्योगिक क्रांति ने उत्पादन की रफ्तार बदल दी और कंप्यूटरों ने दफ्तरों में कामकाज की दुनिया को नया रूप दिया। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मौजूदा लहर में एक ऐसा सवाल उभर रहा है, जिसका जवाब केवल रोजगार के आंकड़ों से नहीं दिया जा सकता। यदि मशीनें काम के सबसे शुरुआती चरण भी संभाल लें, तो आज का नया उम्मीदवार अनुभव हासिल करके विशेषज्ञ कैसे बनेगा?
आज कंपनियों का एक बड़ा हिस्सा तकनीक को केवल काम आसान करने के साधन के रूप में नहीं, बल्कि लागत घटाने और कम समय में अधिक परिणाम हासिल करने के हथियार के रूप में भी देख रहा है। दस्तावेजों का सार निकालना, शुरुआती रिपोर्ट तैयार करना, आंकड़ों को छांटना, ई-मेल के जवाबों का मसौदा बनाना और बैठकों का समय निर्धारित करना—ये वे काम हैं, जिनके माध्यम से कभी नए कर्मचारी दफ्तरों की दुनिया के गुर सीखते थे। अब इनमें से कई काम सॉफ्टवेयर और AI एजेंटों के जरिए किए जा रहे हैं।
आज मुद्दा मशीन की क्षमता नहीं, बल्कि यह है कि व्यावसायिक दक्षता की दौड़ में कहीं मानव प्रशिक्षण का रास्ता ही बंद न हो जाए।
भारत में जून 2026 के दौरान जारी कॉग्निजेंट और पियर्सन के संयुक्त अध्ययन के अनुसार, सर्वेक्षण में शामिल भारतीय संगठनों में शुरुआती स्तर के 37 प्रतिशत कार्य AI के माध्यम से किए जा रहे थे, जबकि वैश्विक स्तर पर यह आंकड़ा 33 प्रतिशत था। यह अध्ययन अमेरिका, इंग्लैंड और भारत के 750 वरिष्ठ मानव संसाधन अधिकारियों के सर्वेक्षण पर आधारित था। इसलिए इस आंकड़े को सभी भारतीय कर्मचारियों या सभी नौकरियों की स्थिति का प्रतिनिधि आंकड़ा नहीं समझना चाहिए। यह कार्यस्थलों पर हो रहे बदलाव का एक महत्वपूर्ण संकेत जरूर है।
इसी तरह, जुलाई 2026 में प्रकाशित गार्टनर के सर्वेक्षण के अनुसार, मानव संसाधन विभागों के 22 प्रतिशत प्रमुखों ने बताया कि उनके संगठन में कम से कम एक कारोबारी नेता ने AI ऑटोमेशन के कारण शुरुआती स्तर पर भर्ती बंद कर दी थी। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इसका अर्थ यह नहीं है कि 22 प्रतिशत कंपनियों ने अपनी सारी नई भर्तियां बंद कर दीं, बल्कि सर्वेक्षण में कम से कम एक ऐसे फैसले की जानकारी दी गई थी।
इसके अलावा, स्टैनफोर्ड डिजिटल इकोनॉमी लैब के 2026 के विश्लेषण में अमेरिका के 22 से 25 वर्ष की आयु वाले युवाओं के रोजगार में AI से अधिक प्रभावित क्षेत्रों में, कम प्रभावित क्षेत्रों की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत का तुलनात्मक अंतर दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं ने इस रुझान को मुख्य रूप से युवाओं की कम भर्ती से जोड़ा। हालांकि, यह आंकड़ा सीधे तौर पर साबित नहीं करता कि पूरा अंतर केवल AI के कारण ही पैदा हुआ।
इन तथ्यों का सही अर्थ यह नहीं है कि हर युवा की नौकरी खत्म होने वाली है। असली चिंता यह है कि जब तकनीक काम के बंटवारे को बदलती है, तो नौकरी के दरवाजे नए उम्मीदवारों के लिए किन शर्तों पर खुलेंगे और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि क्या उन्हें सीखने का अवसर भी मिलेगा?
किसी भी पेशे में विशेषज्ञ बनने का रास्ता सीधे मंजिल तक नहीं पहुंचता। एक पत्रकार पहले खबरों को छांटना सीखता है, फिर तथ्यों की पुष्टि करना सीखता है और समय के साथ खबर के पीछे छिपे संदर्भ को समझने लगता है। एक वकील पहले दस्तावेज पढ़ता है, फिर मामलों की बारीकियों को समझता है और अनुभव के साथ दलीलों की ताकत पहचानना सीखता है। इंजीनियर, लेखाकार, डिजाइनर और प्रबंधक भी छोटे-छोटे कामों के जरिए बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार होते हैं।
ये शुरुआती काम भले ही देखने में साधारण हों, लेकिन इन्हीं के माध्यम से गलतियां पहचानने, तथ्यों की जांच करने, काम की प्राथमिकताएं तय करने और फैसलों के परिणाम समझने की क्षमता विकसित होती है।
यदि कोई कंपनी कहे कि अब दस्तावेजों का सार AI तैयार करेगा, आंकड़ों को AI छांटेगा, मसौदा AI लिखेगा और शुरुआती जांच भी AI करेगा, तो नए कर्मचारी को सीखने के लिए क्या मिलेगा? यदि उससे पहले ही दिन किसी विशेषज्ञ की तरह सोचने की अपेक्षा की जाए, लेकिन उसे जांच की बुनियाद तैयार करने वाले काम ही न दिए जाएं, तो यह प्रशिक्षण नहीं, बल्कि अपेक्षाओं के साथ अन्याय है।
गार्टनर ने भी अपने अध्ययन में चेतावनी दी है कि शुरुआती स्तर की भूमिकाओं को पूरी तरह समाप्त करने से भविष्य में अनुभवी कर्मचारियों की कमी पैदा हो सकती है। कंपनियों को तब बाहर से महंगे विशेषज्ञ तलाशने पड़ सकते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने ही संगठन में नए विशेषज्ञ तैयार करने का रास्ता कमजोर कर दिया होगा।
यह उस माली की कहानी जैसी है, जो जल्दी फल पाने के चक्कर में पौधे लगाना ही छोड़ दे। आज भले ही उसकी लागत कम हो जाए, लेकिन कल फल कहां से आएंगे?
आधुनिक कॉरपोरेट जगत में हर काम को समय, लागत और उत्पादकता के पैमानों पर परखा जाता है। यह दृष्टिकोण अपने आप में गलत नहीं है। यदि AI किसी कर्मचारी का घंटों का काम मिनटों में कर दे, तो उस बचे हुए समय का इस्तेमाल शोध, नई योजनाओं, ग्राहकों की समस्याओं और बेहतर निर्णय लेने के लिए किया जा सकता है। लेकिन असली सवाल यह है कि बचा हुआ समय किसके हिस्से आएगा—मनुष्य के या केवल कंपनी के मुनाफे के?
यदि तकनीक से कार्यक्षमता बढ़े, लेकिन नौकरियों में प्रवेश के अवसर घटें, काम का दबाव बढ़े और प्रशिक्षण के लिए समय कम हो जाए, तो कौशल का लाभ समाज में समान रूप से वितरित नहीं होगा। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की जून 2026 में प्रकाशित शोध रिपोर्ट भी संकेत देती है कि AI से कार्यक्षमता में वास्तविक लाभ हो सकते हैं, लेकिन उनका प्रभाव हर जगह एक जैसा नहीं होता। समय की बचत अपने आप अधिक आय या रोजगार में नहीं बदल जाती।
यहां सवाल केवल इतना नहीं है कि मशीन कितना काम कर सकती है, बल्कि यह भी है कि मशीन द्वारा बचाए गए समय और संसाधनों का लाभ किसे मिल रहा है।
आज तेज रफ्तार वाले माहौल में एक सांस्कृतिक रुझान भी ध्यान खींच रहा है—‘एंटी-एफिशिएंसी’, यानी हर काम को अधिक से अधिक तेज, मापने योग्य और लाभकारी बनाने की सोच से जानबूझकर दूरी बनाना। इसका अर्थ तरक्की का विरोध करना या आलस्य को जीवन-दर्शन बना लेना नहीं है। इसका मूल विचार यह है कि मानव जीवन की हर गतिविधि को उत्पादकता के खाते में दर्ज करना जरूरी नहीं है।
कागज की किताब पढ़ना, बिना फोन के दोस्तों के साथ बैठना, बागवानी करना, हाथों से कोई चीज बनाना, डायरी लिखना या बिना किसी खास उद्देश्य के टहलना—ये काम किसी कंपनी के उत्पादन लक्ष्य में योगदान न भी दें, तब भी मानव जीवन को अर्थ दे सकते हैं। डिजिटल दुनिया से कुछ समय के लिए दूर रहने और वास्तविक सामाजिक संबंधों की ओर लौटने के इस रुझान को आजकल ‘एनालॉग वेलनेस’ जैसे नाम भी दिए जा रहे हैं।
इस रुझान का गहरा संदेश यह है कि मनुष्य कोई मशीन नहीं है, जिसकी कीमत केवल उसकी कार्यक्षमता से मापी जाए। यदि मनोरंजन भी कार्यक्षमता बढ़ाने का साधन बन जाए, आराम अगले काम के लिए ऊर्जा जुटाने की तकनीक बन जाए और दोस्ती भी संपर्कों का नेटवर्क बनकर रह जाए, तो जीवन के वे हिस्से कहां बचेंगे, जिनका उद्देश्य केवल जीना है?
भारत जैसे युवा आबादी वाले देश के लिए यह मुद्दा विशेष महत्व रखता है। हर साल लाखों युवा डिग्रियां लेकर रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। उन्हें केवल नौकरी नहीं, बल्कि पहला अवसर, प्रशिक्षण, आर्थिक आत्मनिर्भरता और अपनी योग्यता साबित करने का मौका चाहिए।
AI के कारण नए कौशलों की मांग भी बढ़ रही है। इसलिए समाधान तकनीक को रोकना नहीं, बल्कि शिक्षा और रोजगार के बीच की दूरी कम करना है। कॉलेजों को केवल सैद्धांतिक ज्ञान देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वास्तविक परियोजनाओं, तथ्य-जांच, समस्या समाधान, संवाद कौशल और AI के जिम्मेदार इस्तेमाल का प्रशिक्षण भी देना चाहिए। कंपनियों को इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप और नए कर्मचारियों के लिए मार्गदर्शन की व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए।
सरकार को भी यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कौशल विकास की नीतियां केवल प्रशिक्षण के घंटे पूरे करके प्रमाणपत्र बांटने तक सीमित न रहें, बल्कि युवाओं को वास्तविक काम का अनुभव भी दें। इसके साथ ही भर्ती और रोजगार के आंकड़ों की नियमित निगरानी होनी चाहिए, ताकि तकनीक के लाभों और नुकसान के बारे में फैसले अनुमानों के बजाय प्रमाणों के आधार पर लिए जा सकें।
AI के युग में सबसे बड़ी चुनौती मशीनों से मुकाबला करना नहीं, बल्कि ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें मशीनें मानवीय क्षमताओं को बढ़ाएं और मनुष्य को सीखने, सोचने तथा आगे बढ़ने के अधिक अवसर मिलें। हर दोहराया जाने वाला काम मनुष्य के लिए जरूरी नहीं है, लेकिन हर शुरुआती काम बेकार भी नहीं होता। कई बार यही छोटे काम बड़ी समझ की नींव बनते हैं।
कॉरपोरेट जगत को समझना होगा कि आज के नए कर्मचारी ही कल के विशेषज्ञ, प्रबंधक और नेतृत्वकर्ता बनेंगे। यदि आज प्रशिक्षण की लागत बचाने के लिए युवाओं को अवसर नहीं दिए जाते, तो कल अनुभव की कमी की कीमत भी उसी व्यवस्था को चुकानी पड़ेगी।
तरक्की का अर्थ केवल कम समय में अधिक काम करना नहीं है। वास्तविक तरक्की वह है, जिसमें मानवीय श्रम का सम्मान, युवाओं का भविष्य और समाज की सामूहिक खुशहाली भी शामिल हो।
क्योंकि यदि हम हर काम को तेज करने की दौड़ में मनुष्य से सीखने के लिए जरूरी समय ही छीन लेंगे, तो हो सकता है कि हमारे पास दुनिया की सबसे तेज मशीनें हों, लेकिन उन्हें समझदारी से चलाने वाले अनुभवी इंसान न हों।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







