3 सितंबर, 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): पश्चिमी एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते टकराव के कारण ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री व्यापार और वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। अब इसका असर युद्ध के मैदान से बाहर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखाई देने लगा है। इस संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य बना हुआ है। यह महत्वपूर्ण जलमार्ग फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसके माध्यम से दुनिया के बड़े हिस्से की कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति होती है।
ताजा हालात ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि इस जलमार्ग में समुद्री आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित होती है तो इसका असर केवल मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत समेत दुनिया के हर बड़े आर्थिक केंद्र तक पहुंच सकता है।
3 सितंबर की ताजा रिपोर्टों के अनुसार, होर्मुज जलडमरूमध्य से एक दिन में केवल 4 जहाज गुजरे, जबकि पिछले 10 दिनों में यहां से गुजरने वाले जहाजों की औसत संख्या 13 जहाज प्रतिदिन रही थी। यह गिरावट केवल समुद्री यातायात में कमी नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रणाली के लिए गंभीर चेतावनी है।
इसी बीच कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में भी भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला। ब्रेंट क्रूड करीब 95.20 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी कच्चा तेल करीब 90.77 डॉलर प्रति बैरल रहा।
ताजा रिपोर्टों के अनुसार, 56 जहाजों को काली सूची में शामिल किया गया है। इनमें कच्चा तेल ले जाने वाले बड़े जहाजों के अलावा तरल प्राकृतिक गैस (LNG), तरल पेट्रोलियम गैस (LPG) और अन्य पेट्रोलियम उत्पाद ले जाने वाले जहाज भी शामिल हैं।
इस कारण समुद्री परिवहन कंपनियों के लिए जोखिम दोहरा हो गया है—एक तरफ युद्ध का खतरा और दूसरी तरफ प्रतिबंधों, जहाजों के जब्त होने तथा बीमा लागत बढ़ने की आशंका।
वर्ष 2025 की अंतिम तिमाही में इस जलमार्ग से लगभग 2.16 करोड़ बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम तरल पदार्थ गुजरते थे। लेकिन वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही में यह मात्रा घटकर लगभग 49 लाख बैरल प्रतिदिन रह गई।
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति की एक महत्वपूर्ण धारा में बड़ी रुकावट पैदा हो चुकी है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका प्रभाव कच्चे तेल से आगे बढ़कर पेट्रोल, डीजल, रसोई गैस, विमानन ईंधन, उर्वरक, रसायन उद्योग, बिजली उत्पादन और परिवहन तक पहुंच सकता है।
भारत पर पड़ सकता है सीधा असर
भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आयात करता है।
सामान्य परिस्थितियों में भारत के कच्चे तेल के आयात का लगभग 30 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज के रास्ते आता रहा है। इसके अलावा रसोई गैस और तरल प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए भी यह जलमार्ग बेहद महत्वपूर्ण है।
यदि होर्मुज में संकट लंबा खिंचता है तो भारत में इसके प्रभाव की श्रृंखला कुछ इस प्रकार हो सकती है—
महंगा तेल → महंगा परिवहन → बढ़ी उत्पादन लागत → महंगाई → घरेलू बजट पर दबाव।
इसका प्रभाव किसानों, उद्योगों, व्यापारियों, परिवहन क्षेत्र और आम परिवारों तक पहुंच सकता है।
मध्य-पूर्वी तनाव ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में भी अस्थिरता पैदा की है। अनिश्चितता के माहौल में निवेशक अपनी पूंजी को अलग-अलग सुरक्षित या कम जोखिम वाले साधनों की ओर ले जाते हैं।
हालांकि सोने की कीमत में हालिया गिरावट को केवल मध्य-पूर्वी तनाव का परिणाम मानना सही नहीं होगा। अमेरिकी ब्याज दरें, सरकारी कर्ज पर मिलने वाला प्रतिफल और केंद्रीय बैंकों की नीतियां भी सोने की कीमत को प्रभावित करती हैं।
इसी तरह शेयर बाजारों में गिरावट का मुख्य कारण केवल युद्ध नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक विकास दर, महंगाई और ऊर्जा लागत को लेकर बढ़ती अनिश्चितता भी है।
भारत ने बढ़ाई ऊर्जा स्रोतों में विविधता
भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी ऊर्जा आयात के स्रोतों में विविधता लाने की कोशिश की है। विभिन्न देशों से कच्चा तेल मंगाना और वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल इसी रणनीति का हिस्सा है।
रिपोर्टों के अनुसार, भारत ने संकट के दौरान अपने कच्चे तेल के आयात का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा होर्मुज से बाहर के स्रोतों की ओर मोड़ने का प्रयास किया है।
यह कदम तत्काल संकट के प्रभाव को कम कर सकता है, लेकिन यदि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो भारत के विदेशी मुद्रा खर्च, आयात बिल और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।
दुनिया के लिए बड़ा सबक
होर्मुज का मौजूदा संकट दुनिया को एक बड़ा सबक दे रहा है—वैश्विक अर्थव्यवस्था आज भी कुछ महत्वपूर्ण भौगोलिक जलमार्गों पर बेहद निर्भर है।
यदि होर्मुज में समुद्री आवाजाही पूरी तरह सामान्य नहीं होती या स्थिति और बिगड़ती है तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। समुद्री बीमा महंगा हो सकता है, माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है और ऊर्जा से जुड़े उद्योगों पर अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
सबसे बड़ा खतरा यह है कि दुनिया को एक साथ ऊंची महंगाई और धीमी आर्थिक विकास दर का सामना करना पड़ सकता है।
होर्मुज में सुरक्षित और निर्बाध समुद्री आवाजाही कच्चे तेल की कीमतों पर बड़ा प्रभाव डाल सकती है। युद्ध भले ही पश्चिमी एशिया में हो, लेकिन इसकी आर्थिक लहर दुनिया के हर कोने तक पहुंच रही है।
होर्मुज में रुका एक तेल टैंकर केवल एक जहाज की आवाजाही नहीं रोकता, बल्कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था की अनेक आपस में जुड़ी कड़ियों को प्रभावित कर सकता है।
इसलिए होर्मुज का संकट केवल मध्य-पूर्व की जंग नहीं है; यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता की सबसे बड़ी परीक्षाओं में से एक बन चुका है।






