04 सितंबर, 2026, (गुरमीत सिंह तुंग): दुनिया इस समय केवल रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध नहीं देख रही, बल्कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी वैश्विक व्यवस्था में बड़े बदलाव की गवाह बन रही है। यूरोप की धरती पर चल रहा रूस-यूक्रेन युद्ध अब सीमाओं से बहुत आगे निकल चुका है। इसने ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा, हथियारों, समुद्री सुरक्षा, व्यापार, प्रतिबंधों और महाशक्तियों के आपसी संबंधों को प्रभावित किया है।
इसी बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत का रुख अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है। 3 सितंबर 2026 को कीव में विदेश मंत्री एस. जयशंकर का यह कहना कि भारत युद्ध समाप्त करने के लिए “किसी भी तरीके से” मदद करने को तैयार है, केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं है। यह उस दीर्घकालिक भारतीय नीति का नया रूप है, जिसमें नई दिल्ली किसी एक गुट का हिस्सा बनने के बजाय सभी पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने का प्रयास कर रही है।
31 अगस्त 2026 को बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात में स्पष्ट संदेश दिया कि दुनिया को “अनंत युद्ध” से आगे बढ़कर युद्ध समाप्त करने और गोलीबारी रोकने की दिशा में प्रयास करना चाहिए। मोदी ने इसे मानवता के हित से जोड़ा।
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस भारत का कोई सामान्य व्यापारिक साझेदार नहीं है। सोवियत युग से चले आ रहे रक्षा, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रणनीतिक सहयोग ने दोनों देशों के बीच गहरी नींव तैयार की है।
लेकिन आज का भारत 1970 या 1980 के दशक वाला भारत नहीं है। वह अमेरिका, यूरोप, जापान, ऑस्ट्रेलिया, खाड़ी देशों और इंडो-पैसिफिक साझेदारों के साथ भी मजबूत संबंध बना रहा है। इसलिए भारत की मौजूदा कूटनीति को “किसी एक पक्ष के साथ खड़ा होना” नहीं, बल्कि “सभी पक्षों से बातचीत करने की क्षमता” के रूप में समझना अधिक उचित होगा।
भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अध्याय गुटनिरपेक्ष आंदोलन से जुड़ा रहा है। जवाहरलाल नेहरू के दौर से भारत ने यह सिद्धांत विकसित किया कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच अपनी विदेश नीति को किसी एक धुरी के अधीन नहीं किया जाना चाहिए। इसके बजाय गुटनिरपेक्षता बनाए रखनी चाहिए।
सोवियत संघ के साथ भारत की निकटता जरूर बढ़ी, विशेषकर रक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों में, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को पूरी तरह मॉस्को के हवाले नहीं किया। यही विरासत आज “रणनीतिक स्वायत्तता” के रूप में सामने आ रही है।
रूस के साथ दोस्ती कायम रखते हुए अमेरिका के साथ क्वाड, यूरोप के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध, इंडो-पैसिफिक सहयोग और यूक्रेन के साथ संपर्क—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना आसान नहीं है। लेकिन भारत इसी संतुलन को अपनी कूटनीतिक ताकत बनाने की कोशिश कर रहा है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को बदल दिया। भारत ने बड़ी मात्रा में रूसी कच्चे तेल की खरीद की और इससे दोनों देशों के बीच व्यापार असाधारण रूप से बढ़ा है। रूस के अनुसार, 2024 में दोनों देशों का व्यापार लगभग 70 अरब डॉलर तक पहुंच गया। अब रुपये-रूबल भुगतान प्रणाली ने भी महत्वपूर्ण प्रगति की है और रूसी बैंकिंग सूत्रों के अनुसार लगभग 96 प्रतिशत द्विपक्षीय व्यापार राष्ट्रीय मुद्राओं के माध्यम से हो रहा है।
इसलिए भारत की रूस नीति को केवल “दोस्ती” के शब्द से समझना अधूरा होगा। इसमें ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा आपूर्ति, उर्वरक, परमाणु ऊर्जा, भुगतान प्रणालियां और भारत की आर्थिक स्थिरता भी शामिल हैं।
भारत के पास तीन बड़ी ताकतें हैं।
पहली— मॉस्को के साथ विश्वास का लंबा इतिहास।
दूसरी— यूक्रेन के साथ सीधा और बढ़ता राजनीतिक संपर्क।
तीसरी— पश्चिमी देशों के साथ भारत की बढ़ती रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी।
लेकिन भारत को अपनी निष्पक्षता की विश्वसनीयता भी बनाए रखनी होगी। यदि किसी एक पक्ष को यह महसूस हुआ कि नई दिल्ली दूसरे पक्ष के हितों की वकालत कर रही है, तो मध्यस्थता की संभावना कमजोर हो सकती है।
इसलिए भारत की सबसे बड़ी कूटनीतिक पूंजी कोई हथियार नहीं, बल्कि विश्वास है।
आज जब पुतिन स्वयं भारत को संभावित मध्यस्थ के रूप में देखने की बात करते हैं और कीव में भारत अपनी मदद की पेशकश दोहराता है, तो यह 21वीं सदी में भारत की बदलती भूमिका का संकेत है।
आज दुनिया को केवल महाशक्तियों की नहीं, बल्कि भरोसेमंद पुलों की भी जरूरत है। यदि वॉशिंगटन और मॉस्को, मॉस्को और कीव या पश्चिम और ग्लोबल साउथ के बीच संवाद की रेखाएं कमजोर हो रही हैं, तो भारत जैसे देश के लिए एक नया कूटनीतिक अवसर पैदा होता है।
लेकिन इतिहास यह भी सिखाता है कि शांति केवल किसी बड़े देश की इच्छा से नहीं आती। शांति के लिए युद्धरत पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति, समझौते की तैयारी और दीर्घकालिक सुरक्षा व्यवस्था आवश्यक होती है।
क्या भारत दोनों देशों को एक मेज पर बैठाने के लिए इतना भरोसेमंद बन सकता है कि मॉस्को भी उसकी बात सुने और कीव भी?
यदि आने वाले समय में इस सवाल का जवाब “हां” होता है, तो रूस-यूक्रेन युद्ध केवल यूरोप के इतिहास का एक अध्याय नहीं रहेगा—इसे भारत की वैश्विक कूटनीति के नए युग की शुरुआत के रूप में भी याद किया जा सकता है।
गुरमीत सिंह तुंग, ब्यूरो चीफ (98552 21193)







