हिमालय की गोद में बसा नेपाल आज दुनिया के सामने एक ऐसा सवाल रख रहा है, जिससे अमीर और बड़े औद्योगिक देश लंबे समय से बचते आए हैं। सवाल है—पर्यावरण प्रदूषित करने वालों की जिम्मेदारी कौन तय करेगा? क्या नेपाल की तबाही का मुआवजा दिया जाएगा?
26 अगस्त 2026 को भोटेकोशी क्षेत्र में ग्लेशियर और पहाड़ी ढांचे के ढहने से आई भीषण बाढ़ ने नेपाल को हिलाकर रख दिया। ताजा आधिकारिक अनुमानों के अनुसार, मृतकों की संख्या 1,250 से अधिक हो चुकी है, 4,200 से ज्यादा लोग लापता हैं और करीब 7,500 घर पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। कुल आर्थिक नुकसान लगभग 387.5 अरब नेपाली रुपये यानी करीब 2.56 अरब अमेरिकी डॉलर बताया गया है।
लेकिन यह केवल एक प्राकृतिक आपदा की कहानी नहीं है। यह उस बड़े संघर्ष का प्रतीक है, जिसे दुनिया अब जलवायु न्याय के नाम से जानती है।
नेपाल का तर्क सीधा है। विश्व बैंक के अनुसार, वैश्विक स्तर पर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में नेपाल की हिस्सेदारी करीब 0.1 प्रतिशत है। इसके बावजूद यह देश जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के लिहाज से दुनिया के सबसे संवेदनशील देशों में शामिल है।
ऐतिहासिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले में भी तस्वीर स्पष्ट है। नेपाल का ऐतिहासिक योगदान बेहद मामूली रहा है, जबकि अमेरिका ऐतिहासिक कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में सबसे बड़े योगदानकर्ताओं में शामिल है और चीन भी बड़े पैमाने पर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता रहा है।
आज के समय में भी चीन, अमेरिका और भारत दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में शामिल हैं। 2023 में इन तीनों की संयुक्त हिस्सेदारी ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में 53 प्रतिशत से अधिक थी। यानी नेपाल जलवायु संकट में बहुत कम योगदान देता है, लेकिन इसके गंभीर प्रभावों में से एक का सामना कर रहा है।
हालांकि, किसी एक प्राकृतिक आपदा को केवल किसी एक देश के कार्बन उत्सर्जन का सीधा परिणाम कहना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा। मौसम संबंधी आपदाओं के पीछे तापमान, वर्षा, भूगोल, ग्लेशियरों की स्थिति, भूस्खलन, मानवीय निर्माण, नदी प्रबंधन और स्थानीय पर्यावरण सहित कई कारक काम करते हैं। इसलिए यह कहना कि “नेपाल की तबाही किसी एक देश की गलती है”, वैज्ञानिक दृष्टि से कमजोर तर्क होगा।
जलवायु विज्ञान यह स्पष्ट कर चुका है कि मानव गतिविधियों से होने वाला ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन आधुनिक वैश्विक तापमान वृद्धि का प्रमुख कारण है।
हिमालय में बर्फ, ग्लेशियरों और स्थायी रूप से जमी धरती की परत में बदलाव पर्वतीय क्षेत्रों की अस्थिरता तथा बाढ़ और भूस्खलन के खतरे को बढ़ा सकते हैं।
इसी विचार ने अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में नुकसान और क्षति (Loss and Damage) की अवधारणा को जन्म दिया है। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन ढांचे के तहत बनाया गया नुकसान और क्षति कोष उन विकासशील देशों की सहायता के लिए है, जो जलवायु परिवर्तन के कारण आर्थिक और गैर-आर्थिक नुकसान झेल रहे हैं।
नेपाल ने भोटेकोशी आपदा के बाद इस कोष से तत्काल वित्तीय सहायता की मांग की है। लेकिन कोष की स्थापना के बावजूद उसकी वित्तीय क्षमता और वास्तविक भुगतान की गति अभी भी जरूरत की तुलना में काफी कम है।
इसलिए नेपाल की मांग केवल पैसे की मांग नहीं है। यह अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के सामने एक बुनियादी सवाल है—क्या जलवायु सहायता को केवल दान माना जाए या इसे जिम्मेदारी का रूप भी दिया जाए?
भारत का नाम इस चर्चा में केवल इसलिए नहीं आता कि वह दुनिया के बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में से एक है। भारत और नेपाल की भौगोलिक, नदी आधारित, आर्थिक और सांस्कृतिक निकटता इस मुद्दे को और गंभीर बनाती है।
भारत का अपना तर्क है कि जलवायु परिवर्तन एक साझा वैश्विक चुनौती है और उसने नेपाल को राहत एवं सहायता भी प्रदान की है।
इसलिए भारत के लिए सबसे प्रभावी रास्ता केवल जवाबी बयानों तक सीमित रहने के बजाय क्षेत्रीय जलवायु सहयोग को मजबूत करना हो सकता है।
हिमालयी ग्लेशियरों की साझा निगरानी, बाढ़ की पूर्व चेतावनी प्रणाली, नदी संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान, आपदा प्रबंधन और जलवायु जोखिमों को सहने में सक्षम बुनियादी ढांचे में निवेश जैसे कदम भारत और नेपाल दोनों के हित में हैं।
23 जुलाई 2025 को अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी ऐतिहासिक सलाहकारी राय जारी की। अदालत ने देशों की अंतरराष्ट्रीय कानूनी जिम्मेदारियों को और स्पष्ट किया तथा पर्यावरण को गंभीर नुकसान से बचाने के लिए देशों की जिम्मेदारियों पर जोर दिया।
लेकिन एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। इस सलाहकारी राय का अर्थ यह नहीं है कि किसी एक देश को नेपाल में हुई किसी विशेष आपदा का मुआवजा अपने आप देना होगा।
किसी विशेष नुकसान के लिए कानूनी मुआवजा साबित करने के लिए यह निर्धारित करना होगा कि गलती किसकी थी, उस गलती और नुकसान के बीच कानूनी तथा कारणात्मक संबंध क्या है और नुकसान की जिम्मेदारी किस तरह तय की जा सकती है।
इसलिए नेपाल की मांग का सबसे मजबूत पक्ष शायद आज किसी एक देश से सीधे मुआवजा वसूलना नहीं, बल्कि वैश्विक जलवायु वित्तीय व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण बनाना है।
नेपाल को इस संकट में तत्काल वित्तीय सहायता की जरूरत है। पुनर्वास और पुनर्निर्माण की लागत पहले ही अरबों डॉलर तक पहुंच रही है। जलविद्युत परियोजनाओं, सड़कों, पुलों, घरों और स्थानीय अर्थव्यवस्था को हुआ नुकसान देश की विकास यात्रा को वर्षों पीछे धकेल सकता है।
सवाल यह है कि क्या दुनिया अगली तबाही से पहले पर्याप्त रूप से तैयार है? यदि हर आपदा के बाद केवल राहत भेजी जाए, लेकिन जलवायु परिवर्तन की गति को रोकने के लिए ठोस कदम न उठाए जाएं, तो यह स्थायी समाधान नहीं बल्कि केवल अस्थायी राहत होगी।
दुनिया को तीन मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा—ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तेज और व्यापक कमी, जलवायु अनुकूलन के लिए बड़े स्तर पर निवेश तथा नुकसान और क्षति के लिए भरोसेमंद एवं पर्याप्त वित्तीय व्यवस्था।
आज नेपाल है। कल हिमालय का कोई दूसरा देश हो सकता है। उसके बाद छोटे द्वीपीय देश, अफ्रीका के सूखे क्षेत्र या एशिया के घनी आबादी वाले नदी क्षेत्र हो सकते हैं।
जलवायु संकट की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि इसकी कीमत आज हर कोई चुका रहा है—कोई ज्यादा, कोई कम… लेकिन बराबर नहीं।
जिसने सबसे कम प्रदूषण किया, वह अक्सर सबसे पहले बाढ़, सूखे, अत्यधिक गर्मी, भूस्खलन और ग्लेशियरों के पिघलने का शिकार बन रहा है।
इसलिए जलवायु मुआवजे की चर्चा को केवल नेपाल की एक मांग समझना गलती होगी। यह 21वीं सदी की वैश्विक आर्थिक और नैतिक व्यवस्था की परीक्षा है।
नेपाल को कितना मुआवजा मिलेगा, यह सवाल महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या दुनिया ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए तैयार है, जिसमें विकास का लाभ लेने वाले और उसकी पर्यावरणीय कीमत चुकाने वाले देशों के बीच न्याय कायम किया जा सके?
यदि हां, तो नेपाल की त्रासदी एक नई वैश्विक व्यवस्था की शुरुआत बन सकती है।
यदि नहीं, तो भोटेकोशी (नेपाल) की तबाही केवल नेपाल की त्रासदी नहीं रहेगी—यह आने वाले समय की एक गंभीर चेतावनी होगी, जिसकी गूंज हिमालय से बहुत दूर तक सुनाई देगी।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्युको चीफ (98552 21193)







