आज हर इंसान की सुबह आंख खुलने से पहले ही मोबाइल की स्क्रीन से शुरू होती है और रात को नींद आने से पहले भी आखिरी नजर उसी स्क्रीन पर होती है। खबरें, सोशल मीडिया, काम, मनोरंजन, बैंकिंग और संचार—जीवन का एक बड़ा हिस्सा अब डिजिटल हो चुका है। भारत में 2025 के दौरान 806 मिलियन इंटरनेट उपयोगकर्ता थे और 85.5 प्रतिशत घरों में कम से कम एक स्मार्टफोन मौजूद था। 15–29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 97.1 प्रतिशत युवाओं ने मोबाइल फोन के इस्तेमाल की जानकारी दी।
दोष तकनीक का नहीं, बल्कि तकनीक के साथ हमारे बेकाबू रिश्ते का है। हर नोटिफिकेशन दिमाग को नई जानकारी की ओर मोड़ता है। लगातार संदेश, ईमेल, रील्स और खबरें मन को आराम देने के बजाय हमेशा ‘सचेत’ बनाए रखती हैं। इसका परिणाम चिड़चिड़ापन, ध्यान भटकना, मानसिक थकान और तनाव के रूप में सामने आता है।
सबसे बड़ा नुकसान नींद को होता है। 41,716 लोगों को शामिल करने वाली 55 अध्ययनों की एक मेटा-पड़ताल में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के इस्तेमाल और नींद की खराब गुणवत्ता के बीच महत्वपूर्ण संबंध सामने आया। नींद खराब होने पर अगले दिन ध्यान, मूड, उत्पादकता और निर्णय लेने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
शरीर भी इस डिजिटल जीवन की कीमत चुकाता है। लंबे समय तक बैठे रहना, चाहे टीवी के सामने हो या मोबाइल और कंप्यूटर के साथ, एक गतिहीन जीवनशैली का हिस्सा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अत्यधिक निष्क्रिय समय हृदय रोग, कैंसर और टाइप-2 मधुमेह के खतरे से जुड़ा है।
लेकिन समाधान मोबाइल फोन को फेंक देना नहीं है। समाधान है डिजिटल अनुशासन। सुबह का पहला आधा घंटा स्क्रीन-मुक्त रखें। आंख खुलते ही नोटिफिकेशन देखने के बजाय पानी पिएं, कुछ मिनट शांत बैठें या टहलें। इसके बाद नोटिफिकेशन कम करें। हर ऐप को आपके ध्यान पर अधिकार देना जरूरी नहीं है। गैर-जरूरी अलर्ट बंद करना मानसिक शोर कम करने का सबसे आसान तरीका है।
इसके साथ ही 20–30 मिनट के ‘स्क्रीन ब्रेक’ लें। उठें, टहलें, खिड़की से बाहर देखें, परिवार से बात करें या कुछ समय बिना किसी डिजिटल उत्तेजना के बिताएं। खाने की मेज और बेडरूम को भी स्क्रीन-मुक्त क्षेत्र बनाएं। सोने से पहले लगातार स्क्रीन इस्तेमाल करने की आदत छोड़ना नींद की दिनचर्या के लिए विशेष रूप से लाभदायक हो सकता है।
स्क्रीन का समय कम करने के साथ शरीर को सक्रिय रखना भी जरूरी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन वयस्कों के लिए सप्ताह में कम से कम 150–300 मिनट मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि की सिफारिश करता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्क्रीन से दूर होना दुनिया से दूर होना नहीं, बल्कि खुद के करीब आना है। कुछ मिनटों की खामोशी, एक कप चाय बिना फोन के, परिवार के साथ आमने-सामने बातचीत, खुली हवा में सैर और रात की शांत नींद—ये वे ‘ऑफलाइन’ अनमोल पल हैं, जिनमें जिंदगी वास्तव में जी जाती है।
तकनीक हमारी सुविधा बने, हमारी आदत की मालिक नहीं। स्क्रीन को बंद करने का साहस ही कई बार मन को दोबारा सक्रिय करने का सबसे आसान तरीका होता है।
छत्रपाल सिंह






