आज के दौर में, खासकर वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड मॉडल के आम होने के कारण, दफ्तर और घर के बीच की रेखा लगभग मिट चुकी है। लैपटॉप खुला रहता है, मोबाइल पर रात तक दफ्तर के संदेश आते रहते हैं और बहुत से लोगों को यह भी पता नहीं चलता कि काम कब खत्म हुआ और निजी जिंदगी कब शुरू हुई।
यह समस्या केवल पश्चिमी देशों तक सीमित नहीं है। भारत और पंजाब में भी, जहां आईटी, बीपीओ, शिक्षा, स्वास्थ्य और सरकारी क्षेत्रों में हाइब्रिड काम का चलन तेजी से बढ़ रहा है, यह मुद्दा उतना ही गंभीर है। आज हम ताजा वैश्विक और भारतीय शोध, आंकड़ों, मनोवैज्ञानिक पहलुओं, स्वास्थ्य पर प्रभाव, कंपनियों की नीतियों और व्यावहारिक उपायों के जरिए गहराई से समझने की कोशिश करेंगे कि दफ्तर के समय और घरेलू जीवन को अलग कैसे रखा जाए और यह अलगाव वास्तव में हमारी सेहत, परिवार और करियर के लिए क्यों जरूरी है।
काम और घर के बीच धुंधली होती सीमाएं वैश्विक समस्या
दुनिया भर के सर्वेक्षण बताते हैं कि काम और घर के बीच धुंधली होती सीमाएं अब एक वैश्विक समस्या बन चुकी हैं।
ईगल हिल कंसल्टिंग के 2025 के सर्वेक्षण के मुताबिक, अमेरिका की आधे से अधिक यानी 55% वर्कफोर्स बर्नआउट (गहरी मानसिक थकान) का सामना कर रही है। पूरी तरह घर से काम करने वाले कर्मचारियों में यह आंकड़ा बढ़कर 61% तक पहुंच जाता है।
शोध बताता है कि अकेलापन, काम से दूरी बनाने में कठिनाई और स्पष्ट सीमाओं की कमी बर्नआउट के प्रमुख कारण हैं।
लगभग 69% रिमोट कर्मचारियों का कहना है कि डिजिटल संचार माध्यमों—जैसे व्हाट्सऐप, ईमेल और ग्रुप चैट—ने उनकी थकान को और बढ़ा दिया है।
काम के समय के बाद आने वाले संदेशों के कारण 14% कर्मचारी चिंता या तनाव महसूस करते हैं, जबकि 18% को गुस्सा आता है।
74% कर्मचारियों ने पिछले साल बीमार होने के बावजूद काम किया। इसे “प्रेजेंटिज्म” कहा जाता है।
रैंडस्टैड के 2025 के सर्वेक्षण में 22 साल के इतिहास में पहली बार काम-जीवन संतुलन (83%) को वेतन (82%) से अधिक प्राथमिकता मिली है।
83% कर्मचारी बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस के लिए कम वेतन वाली नौकरी लेने को भी तैयार हैं, जबकि 56% का कहना है कि कोई भी रकम उन्हें अपना संतुलन त्यागने के लिए तैयार नहीं कर सकती।
वर्कप्लेस बर्नआउट के कारण हर साल कंपनियों को उत्पादकता में लगभग 322 अरब डॉलर का नुकसान होता है। इसके अलावा स्वास्थ्य देखभाल पर 125-190 अरब डॉलर का अतिरिक्त खर्च भी जुड़ जाता है।
46% महिलाएं बर्नआउट की शिकायत करती हैं, जबकि पुरुषों में यह दर 37% है। नेतृत्व की भूमिकाओं में यह अंतर और अधिक बढ़ जाता है, जहां महिलाओं में यह दर 43% और पुरुषों में 31% है।
पूरी आजादी वाली फ्लेक्सिबिलिटी हमेशा बेहतर नहीं
एक दिलचस्प शोध यह भी सामने आया है कि पूरी तरह खुली या अनलिमिटेड फ्लेक्सिबिलिटी हमेशा अच्छी नहीं होती।
गैलप की एक रिसर्च के मुताबिक, जो कर्मचारी अपना शेड्यूल खुद तय करते हैं, वे टीम द्वारा तय किए गए शेड्यूल पर काम करने वालों की तुलना में 76% अधिक बर्नआउट की शिकायत करते हैं।
इसका मतलब है कि “स्ट्रक्चर्ड फ्लेक्सिबिलिटी” यानी ढांचाबद्ध लचीलापन, पूरी तरह खुली स्वतंत्रता की तुलना में बेहतर परिणाम दे सकता है।
भारतीय कर्मचारियों में भी बढ़ी संतुलन की प्राथमिकता
भारतीय वर्कफोर्स में भी अब काम-जीवन संतुलन सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है।
एक सर्वेक्षण के अनुसार, भारतीय कर्मचारियों के लिए काम-जीवन संतुलन (50%) अब नौकरी की स्थिरता (44%) और काम के प्रति जुनून (38%) से भी बड़ा प्रेरक कारक बन गया है।
88% भारतीय नियोक्ता मानते हैं कि घर से काम करना कर्मचारियों की खुशी और वफादारी के लिए महत्वपूर्ण है। यह आंकड़ा वैश्विक औसत 83% से भी अधिक है।
भारत में हाइब्रिड काम करने वाले 73% लोग चाहते हैं कि टीम के लिए सप्ताह में कुछ निश्चित “एंकर डे” तय किए जाएं, जब सभी कर्मचारी कार्यालय आएं। यानी पूरी तरह अनियमित उपस्थिति की बजाय लोग ढांचाबद्ध लचीलेपन को अधिक पसंद करते हैं।
71% भारतीय नौकरी तलाशने वाले लोग लचीले समय और घर से काम करने का विकल्प चाहते हैं, क्योंकि यह सीधे उनके काम-जीवन संतुलन से जुड़ा हुआ है।
भारत में रिमोट काम करने वाले लोगों की संख्या 2025 तक 6 करोड़ से 9 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। यह दर्शाता है कि यह मुद्दा अब करोड़ों परिवारों को सीधे प्रभावित करता है।
पंजाब में समस्या और भी गंभीर हो सकती है
पंजाब जैसे क्षेत्रों में, जहां संयुक्त परिवार, कृषि से जुड़े घरेलू काम और सामाजिक सहभागिता—जैसे विवाह-शादियां, गुरुद्वारा सेवा और पारिवारिक समारोह—जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, वहां दफ्तर के काम का घर में प्रवेश करना अधिक नुकसानदेह साबित हो सकता है।
इसका असर केवल व्यक्ति पर ही नहीं बल्कि पूरे पारिवारिक ढांचे पर पड़ सकता है।
कर्मचारियों को पूरी तरह कार्यालय बुलाने की नीतियां
पिछले कुछ समय में कई बड़ी कंपनियों ने कर्मचारियों को पूरी तरह कार्यालय वापस बुलाने की नीतियां लागू कीं, लेकिन शोध बताता है कि यह हमेशा लाभदायक नहीं रहा।
65% Gen Z और मिलेनियल कर्मचारी कहते हैं कि अगर उन्हें पूरी तरह कार्यालय वापस जाने के लिए मजबूर किया गया तो वे नौकरी छोड़ देंगे।
लगभग आधे रिमोट कर्मचारियों का मानना है कि कार्यालय वापस बुलाने के आदेश वास्तव में माइक्रोमैनेजमेंट या कार्यालय की लीज का अधिक इस्तेमाल करने के लिए होते हैं, न कि वास्तविक उत्पादकता बढ़ाने के लिए।
रिमोट काम करने वाले कर्मचारियों को कार्यालय में काम करने वालों की तुलना में लगभग दोगुना अधिक महसूस होता है कि मैनेजमेंट उन पर भरोसा करता है—61% बनाम 31%।
हाइब्रिड कर्मचारियों में, जिनकी कार्य नीति टीम स्तर पर तय होती है, 91% इसे निष्पक्ष मानते हैं। इसके विपरीत, ऊपर से थोपे गए नियम केवल 73% मामलों में निष्पक्ष माने जाते हैं।
98% कर्मचारी कम से कम कुछ समय के लिए रिमोट काम करना चाहते हैं। इससे स्पष्ट है कि लचीलापन अब केवल सुविधा नहीं बल्कि कर्मचारियों की अपेक्षा बन चुका है।
काम की सीमाओं का मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर असर
दफ्तर और घर के बीच धुंधली होती सीमाओं का सीधा असर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
रिमोट (40%) और हाइब्रिड (38%) कर्मचारियों में चिंता और अवसाद की दर पूरी तरह कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों (35%) की तुलना में थोड़ी अधिक पाई गई।
गैलप की रिसर्च के मुताबिक, पूरी तरह रिमोट कर्मचारियों में से 45% ने किसी खास दिन बहुत अधिक तनाव महसूस करने की बात कही, जबकि कार्यालय में काम करने वाले कर्मचारियों में यह आंकड़ा 38-39% था।
फिर भी, लचीले काम के कई सकारात्मक पहलू भी हैं। 79% रिमोट पेशेवर कम तनाव और 82% बेहतर मानसिक स्वास्थ्य की रिपोर्ट करते हैं, जब काम और निजी जीवन के बीच सीमाओं का सही तरीके से प्रबंधन किया जाता है।
हाइब्रिड कर्मचारी कार्यालय में काम करने वालों की तुलना में 15% कम बार बर्नआउट के लक्षण महसूस करते हैं और 78% का मानना है कि हाइब्रिड या रिमोट काम ने उनकी समग्र भलाई में सुधार किया है।
इससे स्पष्ट होता है कि समस्या केवल काम के मॉडल—दफ्तर या घर—में नहीं है। असली मुद्दा यह है कि सीमाएं कितनी स्पष्ट और ढांचाबद्ध हैं।
सीमाएं दोनों तरफ से धुंधली हो रही हैं
महत्वपूर्ण बात यह है कि सीमाएं केवल एक तरफ से धुंधली नहीं हो रही हैं।
82% कर्मचारी मानते हैं कि वे कार्यालय के समय में भी निजी काम करते हैं और 39% कर्मचारी ऐसा रोजाना एक घंटे से अधिक समय तक करते हैं।
लगभग आधे हाइब्रिड या रिमोट कर्मचारी (46%) काम की कॉल के दौरान मल्टीटास्किंग करते हैं या घरेलू काम निपटाते हैं।
शायद इसका कारण यह है कि उनके पास दिन में इसके लिए अलग समय ही नहीं बचता।
इससे पता चलता है कि सीमाओं की कमी दोतरफा समस्या है—काम घर में घुसता है और घर का काम कार्यालय के समय में। इसलिए समाधान भी दोनों तरफ से स्पष्ट होना चाहिए।
चार दिन के कार्य सप्ताह से मिले सकारात्मक परिणाम
नेचर ह्यूमन बिहेवियर में प्रकाशित 2025 के सबसे बड़े चार-दिवसीय कार्य सप्ताह के प्रयोग के परिणाम स्पष्ट थे। इसमें बर्नआउट कम हुआ, नौकरी से संतुष्टि बढ़ी और मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार आया। ये फायदे एक साल बाद भी बरकरार रहे।
खास बात यह है कि उत्पादकता में कोई कमी नहीं आई। 90% से अधिक कंपनियों ने छह महीने बाद भी इस मॉडल को जारी रखा।
काम और घर के बीच सीमाएं क्यों धुंधली होती हैं?
तकनीक की हमेशा मौजूदगी: मोबाइल, ईमेल और चैट ऐप्स के कारण दफ्तर अब हमारी जेब में ही रहता है।
घर से काम के दौरान भौतिक अलगाव की कमी: जब काम करने और आराम करने की जगह एक ही हो, तो दिमाग के लिए दोनों के बीच बदलाव को समझना मुश्किल हो जाता है।
“हमेशा उपलब्ध रहने” का सांस्कृतिक दबाव: बहुत से लोगों को डर रहता है कि अगर उन्होंने देर रात आए संदेश का जवाब नहीं दिया तो इसे नकारात्मक रूप से देखा जाएगा।
स्पष्ट शेड्यूल की कमी: बिना तय समय के काम पूरे दिन खिंचता रहता है।
संतुलन को व्यावहारिक बनाने के 10 तरीके
1. भौतिक सीमा बनाएं
अगर संभव हो तो घर में एक अलग जगह को ही “ऑफिस” बनाएं। काम खत्म होते ही लैपटॉप बंद करके उस जगह से दूर हो जाएं।
अगर अलग कमरा नहीं है, तो कम से कम लैपटॉप बंद करके उसे बैग में रख दें या ढक दें। यह दिमाग के लिए काम खत्म होने का एक प्रतीकात्मक संकेत बन सकता है।
2. काम शुरू और खत्म करने की रस्म बनाएं
काम शुरू करने से पहले और खत्म करने के बाद कोई छोटी-सी दिनचर्या बनाएं—जैसे सुबह टहलना, शाम को कपड़े बदलना या दिन के कामों की सूची बंद करना।
इससे दिमाग को स्पष्ट संकेत मिलता है कि अब “वर्क मोड” खत्म हो गया है।
3. नोटिफिकेशन पर नियंत्रण रखें
काम के समय के बाद ईमेल और वर्क चैट ऐप्स के नोटिफिकेशन बंद रखें।
हमेशा चालू रहने वाले संचार माध्यम मानसिक थकान और बर्नआउट को बढ़ा सकते हैं।
4. शेड्यूल को ढांचाबद्ध रखें
पूरी आजादी की बजाय काम के निश्चित घंटे तय करें, जैसे सुबह 9 बजे से शाम 6 बजे तक।
शोध बताता है कि जो लोग पूरी तरह खुद ही अपना समय तय करते हैं, वे अधिक थकान महसूस कर सकते हैं।
5. “नहीं” कहना सीखें
कार्यालय के समय के बाद आने वाली हर मांग का तुरंत जवाब देना जरूरी नहीं है।
अपनी टीम के साथ स्पष्ट रूप से तय करें कि आप किन समयों में उपलब्ध रहेंगे।
6. छुट्टियों का पूरा इस्तेमाल करें
शोध बताता है कि जो लोग अपनी छुट्टियों का पूरा इस्तेमाल करते हैं, उनका काम-जीवन संतुलन बेहतर रहता है।
छुट्टी के दौरान भी लगातार ईमेल चेक करने की आदत छोड़ने की कोशिश करें।
7. शारीरिक गतिविधि और शौक के लिए समय निकालें
काम के बाद का समय केवल आराम के लिए नहीं, बल्कि खुद को दोबारा ऊर्जा देने के लिए भी होना चाहिए।
टहलना, व्यायाम, परिवार के साथ समय बिताना या अपने किसी शौक के लिए समय निकालना मानसिक और शारीरिक रिकवरी में मदद करता है।
8. प्रबंधकों से खुलकर बात करें
अगर कार्यालय का माहौल ही देर रात संदेश भेजने को बढ़ावा देता है तो इस मुद्दे को अपने मैनेजर के साथ खुलकर साझा करें।
95% कर्मचारी मानते हैं कि कंपनी द्वारा उनकी निजी समय की सीमाओं का सम्मान करना जरूरी है।
9. कैलेंडर में “फोकस टाइम” ब्लॉक करें
शोध के अनुसार, 58% कर्मचारी मीटिंगों की अधिकता से बचने के लिए अपने कैलेंडर में विशेष समय पहले से रिजर्व कर लेते हैं।
इसी तरह शाम के समय को “परिवार के साथ समय” के रूप में कैलेंडर में ब्लॉक करना भी प्रभावी तरीका हो सकता है।
10. कार्यालय के समय निजी काम भी सीमित रखें
जिस तरह कार्यालय का काम घर में नहीं घुसना चाहिए, उसी तरह घरेलू काम भी कार्यालय के समय में लगातार नहीं होने चाहिए।
इससे दोनों तरफ ध्यान बंटता है और व्यक्ति किसी भी काम पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित नहीं कर पाता।
कंपनियों की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण
काम-जीवन संतुलन केवल व्यक्ति के प्रयासों से नहीं बनता। इसमें कंपनी की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
ढांचाबद्ध लचीलापन दें
पूरी आजादी देने की बजाय टीम स्तर पर तय किए गए “कोर आवर्स” या “एंकर डे” रखें, ताकि कर्मचारी बाकी समय को अपनी सुविधा के अनुसार प्रबंधित कर सकें।
देर रात संदेश भेजने को प्रोत्साहित न करें
लीडरशिप को भी सप्ताहांत या कार्यालय समय के बाद संदेश भेजने से बचना चाहिए, क्योंकि कर्मचारी अक्सर अपने मैनेजर के व्यवहार की नकल करते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम शुरू करें
जिन कंपनियों में कर्मचारियों की मानसिक सेहत का समर्थन किया जाता है, वहां कर्मचारियों के बर्नआउट या अवसाद से प्रभावित होने की संभावना कम होती है।
छुट्टियां लेने के लिए प्रोत्साहित करें
कई कर्मचारी अपनी पूरी छुट्टियां इसलिए नहीं लेते क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनके करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।
कंपनी संस्कृति में बदलाव करके इस डर को खत्म किया जा सकता है।
घंटों की बजाय परिणामों पर ध्यान दें
लंबे समय तक काम करने की बजाय स्पष्ट लक्ष्य और परिणाम तय करने वाली टीमें अधिक प्रभावी हो सकती हैं।
चार दिन के कार्य सप्ताह के प्रयोग इसके महत्वपूर्ण उदाहरण हैं।
यात्रा और टीम-बॉन्डिंग बजट बढ़ाएं
जिन कंपनियों ने कर्मचारियों को आपस में जोड़ने के लिए यात्रा बजट बढ़ाया, वहां कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की दर में 29% की कमी देखी गई।
कामकाजी लोगों के सामान्य सवाल
सवाल: अगर मेरी नौकरी की प्रकृति ही ऐसी है कि मुझे देर रात भी जवाब देना पड़ता है, तो क्या करूं?
हर पेशे में पूरी तरह संपर्क से बाहर रहना संभव नहीं है। स्वास्थ्य सेवाओं या आपातकालीन भूमिकाओं जैसे क्षेत्रों में देर रात उपलब्ध रहना जरूरी हो सकता है।
ऐसे मामलों में “आपातकालीन” और “गैर-जरूरी” संपर्कों के बीच स्पष्ट अंतर तय करें, ताकि हर संदेश तुरंत ध्यान देने की मांग न करे।
सवाल: क्या कार्यालय समय के बाद ईमेल का जवाब न देने से करियर पर बुरा असर पड़ता है?
शोध बताता है कि स्पष्ट सीमाएं रखने वाले कर्मचारी लंबे समय में अधिक ऊर्जावान और केंद्रित रहते हैं, जिसका सीधा लाभ उनके काम की गुणवत्ता पर पड़ता है।
बर्नआउट से प्रभावित कर्मचारियों के नौकरी छोड़ने की संभावना लगभग तीन गुना अधिक होती है। इसलिए संतुलन वास्तव में करियर को नुकसान पहुंचाने की बजाय उसे लंबे समय तक स्थिरता दे सकता है।
सवाल: संयुक्त परिवार में रहते हुए घर से काम करते समय सीमाएं कैसे बनाएं?
परिवार के अन्य सदस्यों के साथ अपने काम के समय के बारे में खुलकर बात करें।
एक दृश्य संकेत भी तय किया जा सकता है—जैसे दरवाजा बंद होना या हेडफोन लगाना—ताकि परिवार के सभी लोगों को पता हो कि आप उस समय काम में व्यस्त हैं।
निष्कर्ष
दफ्तर और घर के बीच स्पष्ट रेखा खींचना केवल एक निजी आदत नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, उत्पादकता, पारिवारिक रिश्तों और लंबे समय के करियर के लिए भी जरूरी है।
आंकड़े स्पष्ट रूप से बताते हैं कि बर्नआउट अब एक-दो लोगों की समस्या नहीं बल्कि वैश्विक स्तर की चुनौती बन चुका है, जो भारत और पंजाब समेत हर जगह के कर्मचारियों को प्रभावित कर रही है।
शोध यह भी बताता है कि सवाल केवल यह नहीं है कि काम दफ्तर से हो रहा है या घर से। असली सवाल यह है कि काम और निजी जीवन के बीच सीमाएं कितनी स्पष्ट, ढांचाबद्ध और आपसी समझ से तय की गई हैं।
भौतिक सीमा, काम शुरू और खत्म करने की दिनचर्या, नोटिफिकेशन पर नियंत्रण, ढांचाबद्ध शेड्यूल, “नहीं” कहने की क्षमता, पूरी छुट्टियां लेना और प्रबंधकों के साथ खुला संवाद—ये सभी मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करते हैं जिसमें काम भी आगे बढ़ता है और जिंदगी भी पूरी तरह जी जा सकती है।अंततः, संतुलन कोई लग्जरी नहीं है। यह एक टिकाऊ, स्वस्थ और खुशहाल जिंदगी की बुनियादी जरूरत है।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







