Wednesday, September 30, 2026
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भारत-चीन सीमा विवाद का स्थायी समाधान जरूरी: मनीष तिवारी

 

शी जिनपिंग के भारत दौरे के दौरान कांग्रेस सांसद ने कहा—सीमा पर शांति के बिना द्विपक्षीय संबंधों को पूरी तरह सामान्य करना मुश्किल

नई दिल्ली, 12 सितंबर 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सात साल बाद भारत दौरे और 18वें BRICS शिखर सम्मेलन के मद्देनजर भारत-चीन संबंध एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं। इसी बीच कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने भारत और चीन के बीच सीमा विवाद का समाधान बेहद जरूरी बताया है। उनका मानना है कि दोनों देशों के संबंधों में टिकाऊ सुधार के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक है।

तिवारी की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब शी जिनपिंग 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित हो रहे 18वें BRICS शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए भारत पहुंचे हैं। यह 2019 के बाद उनका पहला भारत दौरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग के बीच BRICS से इतर द्विपक्षीय मुलाकात भी होनी है, जिसमें सीमा और व्यापार सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।

गलवान के बाद बदले भारत-चीन संबंध: भारत-चीन संबंधों में सबसे बड़ा झटका वर्ष 2020 में पूर्वी लद्दाख की गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद लगा था। इस घटना में 20 भारतीय और चार चीनी सैनिकों की मौत हुई थी। इसके बाद दोनों परमाणु-संपन्न देशों के बीच सीमा पर बड़े पैमाने पर सैन्य तैनाती हुई और कूटनीतिक संबंधों पर भी गंभीर प्रभाव पड़ा।

दोनों देश लगभग 3,800 किलोमीटर लंबी विवादित और पूरी तरह निर्धारित नहीं हुई सीमा साझा करते हैं।

हालांकि, अक्टूबर 2024 में दोनों देशों के बीच पेट्रोलिंग और सैन्य डिसइंगेजमेंट को लेकर हुए समझौते के बाद हालात में कुछ सुधार देखने को मिला। वर्ष 2024 के अंत तक कई टकराव वाले क्षेत्रों से सैनिकों को पीछे हटाया गया। इसके बाद दोनों पक्षों ने हवाई संपर्क, वीजा, व्यापार और लोगों के बीच संपर्क को दोबारा बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं।

सीमा पर डिसइंगेजमेंट, लेकिन भरोसा पूरी तरह बहाल नहीं: विशेषज्ञों के अनुसार भारत-चीन संबंधों में सुधार के संकेत जरूर मिले हैं, लेकिन इसे अभी पूरी तरह सामान्य हुए संबंध नहीं कहा जा सकता। हिमालयी सीमा पर दोनों देशों की बड़ी सैन्य मौजूदगी बनी हुई है।

अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन के दावे, लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC से जुड़े मुद्दे और चीन-पाकिस्तान के रणनीतिक सहयोग जैसे विषय दोनों देशों के बीच भरोसे की पूरी बहाली में चुनौती बने हुए हैं।

इसी वजह से मनीष तिवारी द्वारा सीमा विवाद के समाधान पर दिया गया जोर केवल तत्काल कूटनीतिक संपर्क के बजाय दीर्घकालिक रणनीतिक स्थिरता के संदर्भ में देखा जा रहा है।

व्यापार भी बड़ा मुद्दा: भारत-चीन संबंधों का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक है। संबंधों में सुधार के बावजूद भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा काफी बड़ा है। वर्ष 2025-26 में चीन भारत के लिए सबसे बड़ा आयात स्रोत बना और लगभग 132 अरब डॉलर के सामान की आपूर्ति की। इनमें भारतीय उद्योग के लिए महत्वपूर्ण कई कच्चे माल और औद्योगिक कंपोनेंट भी शामिल हैं।

संभावित मोदी-शी बातचीत में व्यापार घाटा, बाजार तक पहुंच, चीनी निवेश, वीजा प्रतिबंधों और औद्योगिक सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर भी ध्यान रहने की संभावना है।

सीधी उड़ानें फिर शुरू होने का संकेत: भारत-चीन संबंधों में धीरे-धीरे आ रहे सुधार का एक संकेत सीधी हवाई सेवाओं की बहाली भी है। 21 सितंबर से ग्वांगझू–नई दिल्ली सीधी उड़ान फिर शुरू होने की घोषणा की गई है।

इसे दोनों देशों के बीच लोगों और व्यापारिक संपर्क को दोबारा मजबूत करने की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में देखा जा रहा है।

BRICS के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर: भारत की मेजबानी में आयोजित हो रहा BRICS सम्मेलन केवल भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे समूह की भूमिका के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है।

BRICS के भीतर भारत और चीन दो प्रमुख शक्तियां हैं, लेकिन दोनों के रणनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं। भारत एक गैर-पश्चिमी लेकिन बहुध्रुवीय विदेश नीति पर जोर देता है, जबकि चीन और रूस कई मुद्दों पर पश्चिमी प्रभाव को चुनौती देने वाली अधिक स्पष्ट रणनीतिक दृष्टि रखते हैं।

ऐसे में मोदी-शी मुलाकात को केवल एक द्विपक्षीय बैठक के रूप में नहीं, बल्कि एशिया और ग्लोबल साउथ की बदलती भू-राजनीति के संदर्भ में भी देखा जा रहा है।

मुख्य चुनौती—भरोसे की बहाली: भारत-चीन संबंधों में सुधार के लिए कूटनीतिक बातचीत, सीमा पर शांति, सैन्य तनाव में कमी, व्यापारिक संतुलन और लोगों के बीच संपर्क—ये सभी मुद्दे आपस में जुड़े हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक या राजनीतिक संपर्क बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। LAC पर स्थायी शांति और सीमा विवाद के दीर्घकालिक समाधान की दिशा में ठोस प्रगति जरूरी होगी।

इस पृष्ठभूमि में मनीष तिवारी का संदेश स्पष्ट है कि भारत-चीन संबंधों को आगे ले जाने के लिए सीमा विवाद का समाधान और आपसी विश्वास की पुनर्बहाली केंद्रीय शर्त होनी चाहिए।

अब सबकी नजर इस बात पर है कि शी जिनपिंग का मौजूदा भारत दौरा भारत-चीन संबंधों में इस प्रक्रिया को कितनी नई दिशा देता है और क्या दोनों देश सीमा, व्यापार तथा रणनीतिक संबंधों से जुड़े लंबित मुद्दों पर आगे बढ़ने के लिए कोई ठोस रास्ता तैयार कर पाते हैं।

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