सुनाम, 10 अक्टूबर 2026 (चौधरी प्रभजीत सिंह): धान की पराली न जलाने के अभियान के तहत पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पी.ए.यू.) के कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर द्वारा कृषि एवं किसान कल्याण विभाग तथा सहकारी सभा, छाजली के सहयोग से गांव छाजली, ब्लॉक सुनाम में जिला स्तरीय किसान जागरूकता शिविर आयोजित किया गया। इस शिविर में 150 से अधिक किसानों ने भाग लिया।
इस अवसर पर डॉ. मनदीप सिंह, प्रभारी, पी.ए.यू.-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर ने किसानों को पराली जलाने से पर्यावरण, मिट्टी के स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक किया। उन्होंने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है।
उन्होंने कहा कि पराली जलाने से निकलने वाली हानिकारक गैसें पर्यावरण को प्रदूषित करती हैं और कई बीमारियों का कारण बनती हैं। उन्होंने किसानों से पराली को खेत में ही प्रबंधित करने की तकनीकें अपनाने की अपील की। उन्होंने बताया कि पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक कार्बन की मात्रा बढ़ती है, मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है, खादों पर होने वाला खर्च कम होता है और फसल की पैदावार बढ़ती है।
डॉ. मनदीप सिंह ने गेहूं की नई अधिक उपज देने वाली किस्म पी.बी.डब्ल्यू. 887 के बारे में भी जानकारी दी। यह किस्म पकने में 155 दिन लेती है और इसकी औसत उपज 24.60 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके अतिरिक्त उन्होंने पी.बी.डब्ल्यू. 872, पी.बी.डब्ल्यू. 826 तथा विशेष गुणवत्ता वाली किस्मों पी.बी.डब्ल्यू. जिंक 2, पी.बी.डब्ल्यू. 1 चपाती, पी.बी.डब्ल्यू. आर.एस. 1 और पी.बी.डब्ल्यू. 1 बिस्कुट के बारे में भी बताया। उन्होंने किसानों को रबी मौसम में दलहनी एवं तिलहनी फसलें उगाने और उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. सुनील कुमार, सहायक प्रोफेसर (फार्म मशीनरी) ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित मशीनों—स्मार्ट सीडर, सुपर सीडर, सरफेस सीडर, हैप्पी सीडर, पलटने वाले हल, मल्चर तथा बेलर से पराली की गांठें बनाने की तकनीक के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी दी। उन्होंने पराली को खेत में ही संरक्षित करने पर जोर दिया।
इस अवसर पर श्री नरेंद्रपाल सिंह चीमा, कृषि विकास अधिकारी, सुनाम ने किसानों से पराली न जलाने तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने की अपील की। उन्होंने किसान आईडी बनाने की प्रक्रिया और इसकी आवश्यकता के बारे में भी जानकारी दी।
शिविर के अंत में किसानों के सवालों के जवाब दिए गए। इसके साथ ही विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किए गए गोभी सरसों के बीज और कृषि साहित्य का वितरण भी किया गया।
इस अवसर पर सहकारी सभा के अध्यक्ष, सचिव और गांव के सरपंच विशेष रूप से उपस्थित रहे।





