Monday, October 12, 2026
HomeLifestyleआधुनिक युग में घटती सिविक सेंस, घर से संसद तक जिम्मेदारी के...

आधुनिक युग में घटती सिविक सेंस, घर से संसद तक जिम्मेदारी के हालात टेंस

जब इंसान अपने अधिकारों के प्रति जागरूक, लेकिन अपने कर्तव्यों के प्रति लापरवाह हो जाता है, तो संकट केवल व्यक्ति के चरित्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे समाज, व्यवस्था और भविष्य का संकट बन जाता है।

भारत की तरक्की के दावों के बीच एक गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा है—क्या हमारी आर्थिक, तकनीकी और शैक्षणिक प्रगति के अनुपात में हमारी नागरिक समझ भी विकसित हो रही है? सिविक सेंस यानी नागरिक समझ केवल सड़क पर कूड़ा न फेंकने या यातायात नियमों का पालन करने तक सीमित नहीं है। यह दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करने, नियमों को स्वीकार करने और अपनी स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी निभाने की सामाजिक चेतना है।

परिवार सिविक सेंस की पहली पाठशाला है। जब घरों में बच्चों को अनुशासन का उपदेश तो दिया जाता है, लेकिन माता-पिता स्वयं नियम तोड़ते हैं, जब बुजुर्गों के प्रति सम्मान कम होने लगता है, महिलाओं की स्वतंत्रता को नियंत्रण से जोड़ दिया जाता है और पारिवारिक मतभेदों को संवाद के बजाय अहंकार से सुलझाया जाता है, तो बच्चे विरोधाभासी संस्कार ही सीखते हैं। परिवारों की बदलती संरचना अपने आप में पतन का प्रमाण नहीं है। असली चुनौती आपसी सम्मान, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी को बनाए रखने की है।

सामाजिक जीवन में सिविक सेंस की कमी कतारें तोड़ने, सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी फैलाने, बेवजह हॉर्न बजाने, दूसरों की निजता में हस्तक्षेप करने और सामाजिक मतभेदों को दुश्मनी में बदलने के रूप में दिखाई देती है। परेशानी यह है कि हम अपने घर की सफाई को अपनी प्रतिष्ठा, लेकिन गली की सफाई को किसी और की जिम्मेदारी समझ लेते हैं।

राजनीतिक क्षेत्र में यह संकट और भी गंभीर है। जब नीतियों के बजाय व्यक्तिगत हमले, तथ्यों के बजाय प्रचार और जनहित के बजाय सत्ता के हित प्रमुख हो जाते हैं, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। हालांकि, सरकार की आलोचना, विरोध और असहमति सिविक सेंस की कमी नहीं, बल्कि लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जवाबदेही के बजाय राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता देने लगते हैं।

आर्थिक क्षेत्र में कर चोरी, रिश्वतखोरी, मिलावट, काम में बेईमानी और मजदूरों के अधिकारों का उल्लंघन सामूहिक विश्वास को कमजोर करते हैं। शैक्षणिक क्षेत्र में नकल, शोध में साहित्यिक चोरी, अंकों की दौड़ और शिक्षकों या विद्यार्थियों के प्रति असंवेदनशीलता शिक्षा के नैतिक उद्देश्य को नुकसान पहुंचाती है। डिग्री प्राप्त करना और जिम्मेदार नागरिक बनना दो अलग-अलग उपलब्धियां हैं।

सरकारी और निजी संस्थानों में समय की पाबंदी, पारदर्शिता, जवाबदेही, ग्राहकों और कर्मचारियों का सम्मान तथा नियमों का निष्पक्ष पालन कार्य-संस्कृति के बुनियादी मानक हैं। सरकारी कार्यालयों में अनावश्यक देरी और निजी संस्थानों में कर्मचारियों का शोषण—ये दोनों ही जिम्मेदार प्रबंधन की कमी को दर्शाते हैं। इसके साथ ही, खराब सुविधाओं और कमजोर निगरानी जैसी व्यवस्थागत कमियों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस संकट का समाधान केवल भाषणों, जुर्मानों या अभियानों में नहीं है। घरों में व्यवहारिक संस्कार, स्कूलों में नागरिक शिक्षा, संस्थानों में जवाबदेही, कानून का निष्पक्ष पालन और सार्वजनिक सेवाओं में सुधार—ये सभी एक साथ आवश्यक हैं। नागरिकों को अपने कर्तव्य निभाने होंगे और प्रशासन को भी अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हटना चाहिए।

भारत कितनी तरक्की कर रहा है, इससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण सवाल अब यह है कि इस विकास के साथ हमारा समाज कितना जिम्मेदार, संवेदनशील और न्यायपूर्ण बन रहा है।

क्योंकि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक सभ्यता उसकी इमारतों की ऊंचाई से नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र की ऊंचाई से मापी जाती है। जिस दिन हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को भी समान महत्व देना सीख लेंगे, उस दिन सिविक सेंस केवल एक नारा नहीं, बल्कि हमारी राष्ट्रीय पहचान बन जाएगी।

छत्रपाल सिंह

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments