Monday, October 12, 2026
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सियासी कशमकश ने रगड दिया निज़ाम, तबाह भविष्य, बेबस आवाम

जब राजनीति का उद्देश्य जनसेवा के बजाय सत्ता बचाना, विरोधियों को नीचा दिखाना और अपने हितों को साधना बन जाए, तो राजनीतिक खींचतान केवल विधानसभा या संसद तक सीमित नहीं रहती। इसकी कीमत आम आदमी को अपनी रोजी-रोटी, पारिवारिक सुख, मानसिक शांति और भविष्य की संभावनाओं के रूप में चुकानी पड़ती है।

लोकतंत्र में विचारों का मतभेद स्वाभाविक है। सरकार और विपक्ष के बीच मुद्दों पर असहमति, विधानसभा में बहस, अदालतों द्वारा सरकारी फैसलों की समीक्षा और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा सत्ता पर निगरानी—ये सभी स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक अंग हैं। हर असहमति को राजनीतिक टकराव समझना भी उचित नहीं है।

लेकिन जब असहमति का उद्देश्य समाधान तलाशने के बजाय फैसलों को रोकना, विरोधियों को असफल साबित करना, संस्थाओं का इस्तेमाल अपने हितों के लिए करना या जनता की समस्याओं को राजनीतिक लाभ का साधन बनाना हो, तो स्थिति राजनीतिक खींचतान का रूप ले लेती है।

इसका सबसे गंभीर पहलू यह है कि नेताओं की लड़ाई के परिणाम अक्सर वे लोग भुगतते हैं, जिनकी नीतियां बनाने में कोई निर्णायक भूमिका नहीं होती और न ही उनके पास व्यवस्था को बदलने के पर्याप्त साधन होते हैं। सत्ता के गलियारों में होने वाली देरी, बाधाओं और टकराव का बोझ आखिरकार परिवारों के बजट, युवाओं के रोजगार, किसानों की आय और बच्चों के भविष्य पर पड़ता है।

राजनीति का आदर्श जनकल्याण होना चाहिए, लेकिन जब सत्ता में बने रहना ही मुख्य लक्ष्य बन जाए, तो दीर्घकालिक जनहितकारी नीतियों के बजाय तत्काल राजनीतिक लाभ को प्राथमिकता मिलने लगती है।

कभी कोई सरकार पिछली सरकार की योजना को केवल इसलिए बदल सकती है, क्योंकि उसका राजनीतिक श्रेय विपक्ष को मिलता है। दूसरी ओर, विपक्ष किसी अच्छी नीति का समर्थन करने से भी हिचक सकता है, क्योंकि उसे आशंका होती है कि इससे सरकार को राजनीतिक लाभ मिल जाएगा।

इस तरह जनता के हित राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ सकते हैं। जिस योजना का उद्देश्य लोगों की जिंदगी बेहतर बनाना होना चाहिए, वह राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हथियार बन जाती है।

जब समाज को राजनीतिक विचारधाराओं और दलों के आधार पर विरोधी खेमों में बांट दिया जाता है, तो तर्क की जगह पक्षपात और तथ्यों की जगह प्रचार हावी होने लगता है। विरोधी विचार रखने वाले व्यक्ति को दुश्मन समझना, उसकी हर बात को गलत मानना और अपने पक्ष की हर कार्रवाई को सही ठहराना लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।

इसका असर परिवारों और सामाजिक रिश्तों तक पहुंच सकता है, जहां राजनीतिक मतभेद निजी वैमनस्य में बदलने लगते हैं।

भारत में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अधिकारों का संवैधानिक बंटवारा है। कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग, वित्तीय संसाधनों और प्रशासनिक तालमेल की आवश्यकता होती है। यदि इन मुद्दों पर राजनीतिक टकराव लंबे समय तक जारी रहे, तो विकास कार्यों और सार्वजनिक सेवाओं में देरी हो सकती है।

इसी तरह, विधानसभा या संसद में लगातार व्यवधान, प्रशासनिक फैसलों में अनावश्यक देरी और संस्थाओं के बीच तालमेल की कमी सरकारी कामकाज को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, हर संवैधानिक रोक या न्यायिक हस्तक्षेप नुकसानदायक नहीं होता। कई बार ये सत्ता की मनमानी रोकने और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए आवश्यक होते हैं। समस्या तब पैदा होती है, जब संस्थागत प्रक्रियाएं जनहित के बजाय राजनीतिक गणनाओं से प्रभावित होने लगती हैं।

विकास परियोजनाओं की मंजूरी, जमीन अधिग्रहण, ठेके जारी करने या बुनियादी ढांचे के निर्माण में अनावश्यक देरी से परियोजनाओं की लागत बढ़ सकती है। इसका बोझ सरकारी खजाने पर पड़ता है और अंततः जनता को कम सुविधाओं या अतिरिक्त आर्थिक दबाव के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ सकती है।

यदि निवेशकों को नीतियों में अनिश्चितता, प्रशासनिक अस्थिरता या कानूनी जटिलताओं का डर हो, तो वे नए निवेश को टाल सकते हैं। इससे औद्योगिक विकास और रोजगार सृजन की गति प्रभावित होने का खतरा रहता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं कि हर राजनीतिक विवाद का ऐसा ही परिणाम हो।

राजनीतिक खींचतान का प्रभाव केवल सरकारी कार्यालयों या सदन की कार्यवाही तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी पर भी पड़ सकता है।

रोजगार के सीमित अवसर, छोटे कारोबारों के लिए प्रतिकूल माहौल, किसानों के लिए नीतियों को लेकर अनिश्चितता और युवाओं के सामने अपने क्षेत्र में भविष्य बनाने की कठिनाइयां आर्थिक दबाव बढ़ा सकती हैं।

जब रोजगार की अनिश्चितता बढ़ती है, महंगाई का दबाव महसूस होता है या सरकारी सहायता और सेवाएं समय पर नहीं मिलतीं, तो परिवारों की चिंताएं बढ़ जाती हैं। माता-पिता को बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य, घर के किराये और भविष्य की बचत को लेकर अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है।

जो पिता अपने बच्चे को अच्छी शिक्षा देना चाहता है, वह सरकारी स्कूलों में पर्याप्त सुविधाओं की कमी होने पर अतिरिक्त खर्च करने के लिए मजबूर हो सकता है। इसी तरह, सरकारी अस्पतालों में आवश्यक सुविधाएं या सेवाएं समय पर उपलब्ध न होने पर परिवारों को निजी इलाज का खर्च उठाना पड़ सकता है।

आर्थिक रूप से मजबूत परिवार कुछ समस्याओं का समाधान अपने संसाधनों से निकाल सकते हैं, लेकिन गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के पास ऐसे विकल्प सीमित होते हैं। इसलिए प्रशासनिक कमियां और सार्वजनिक सेवाओं में रुकावट सामाजिक असमानता को और गहरा कर सकती हैं।

किसी भी सरकार की असली कसौटी यह नहीं है कि वह अपने विरोधियों को कितनी प्रभावी तरीके से जवाब देती है, बल्कि यह है कि वह लोगों को शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, रोजगार और न्याय जैसी सुविधाएं कितनी प्रभावी ढंग से उपलब्ध कराती है।

यदि सरकार का अधिकतर ध्यान राजनीतिक बयानबाजी और आपसी आरोपों में उलझा रहे, तो नीतियों की समीक्षा, सेवाओं की गुणवत्ता और जवाबदेही जैसे जरूरी काम पीछे छूट सकते हैं।

स्कूलों में शिक्षकों की कमी, अस्पतालों में सुविधाओं का अभाव, अदालतों में लंबित मामले और सरकारी कार्यालयों में देरी जैसी समस्याओं के कई कारण होते हैं। इन सभी को केवल राजनीतिक खींचतान से जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन जहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जरूरी फैसलों और प्रशासनिक सुधारों को रोकती है, वहां जनता को नुकसान उठाना पड़ सकता है।

खासकर जरूरतमंद परिवारों के लिए सरकारी सेवाएं केवल सुविधाएं नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं हैं। इन सेवाओं में देरी उनके अधिकारों और अवसरों को प्रभावित कर सकती है।

जब राजनीतिक दल सामाजिक, धार्मिक, जातिगत या क्षेत्रीय पहचानों का इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितों के लिए करते हैं, तो लोगों के बीच अविश्वास बढ़ने का खतरा पैदा होता है। राजनीतिक विरोध धीरे-धीरे सामाजिक वैमनस्य का रूप ले सकता है।

इसका असर लोकतांत्रिक व्यवस्था की गुणवत्ता पर भी पड़ता है। जब लोग तथ्यों और नीतियों के बजाय केवल पार्टी के प्रति निष्ठा के आधार पर फैसले लेने लगते हैं, तो जवाबदेही कमजोर हो सकती है।

अच्छे फैसलों का समर्थन करने और गलत फैसलों की आलोचना करने के बजाय हर कार्रवाई को अपने राजनीतिक पक्ष या विरोध के नजरिये से देखना लोकतांत्रिक संवाद को सीमित करता है।

इस स्थिति में चुनावी प्रक्रिया सक्रिय रहने के बावजूद जनकल्याण के लिए आवश्यक सहयोग, विचार-विमर्श और सामूहिक जिम्मेदारी कमजोर पड़ सकती है।

राजनीतिक टकराव का समाधान विपक्ष को समाप्त करना या सभी असहमतियों को दबाना नहीं है। इसका समाधान संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करने, पारदर्शिता बढ़ाने, जवाबदेही सुनिश्चित करने और जनहित को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से ऊपर रखने में है।

सबसे पहले, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि और स्थानीय विकास जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार और विपक्ष के बीच तथ्य आधारित चर्चा होनी चाहिए। इन विषयों को अनावश्यक राजनीतिक टकराव से बचाने की जरूरत है।

दूसरा, सरकारी योजनाओं और खर्चों की सार्वजनिक निगरानी होनी चाहिए। जनता को पता होना चाहिए कि किसी योजना के लिए कितना बजट आवंटित हुआ, काम कहां तक पहुंचा और देरी के लिए कौन जिम्मेदार है।

तीसरा, मीडिया और नागरिकों को राजनीतिक दावों की तथ्यों के आधार पर जांच करनी चाहिए। अफवाहों, अधूरी जानकारी और भड़काऊ प्रचार को बिना जांचे आगे फैलाना सामाजिक विभाजन को बढ़ा सकता है।

चौथा, मतदाताओं को केवल चुनाव के समय ही नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल के दौरान अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से जवाब मांगना चाहिए। वादों की पूर्ति, सार्वजनिक धन का इस्तेमाल और स्थानीय समस्याओं का समाधान राजनीतिक जवाबदेही के महत्वपूर्ण आधार होने चाहिए।

राजनीति लोकतंत्र की आवश्यकता है, लेकिन उसका मूल उद्देश्य लोगों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए। यदि सत्ता की खींचतान के कारण रोजगार के अवसर प्रभावित होते हैं, सार्वजनिक सेवाओं में बाधाएं आती हैं, परिवार आर्थिक दबाव झेलते हैं और समाज में अविश्वास बढ़ता है, तो इन परिस्थितियों की गंभीर समीक्षा जरूरी है।

नेताओं की राजनीतिक हार या जीत कुछ वर्षों का मामला हो सकती है, लेकिन किसी बच्चे की शिक्षा पर पड़ा नकारात्मक प्रभाव, किसी युवा के हाथ से निकला रोजगार का अवसर और किसी परिवार का आर्थिक संकट लंबे समय तक असर छोड़ सकता है।

इसलिए हर राजनीतिक दल, हर निर्वाचित प्रतिनिधि और हर जवाबदेह संस्था को समझना होगा कि लोकतंत्र केवल सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनता के विश्वास की अमानत भी है।

जब राजनीतिक खींचतान में लोगों की बुनियादी जरूरतें पीछे छूटने लगती हैं, तो सवाल केवल सरकार की कार्यप्रणाली का नहीं रहता, बल्कि लोकतंत्र के मूल उद्देश्य का बन जाता है।

क्योंकि राजनीति की वास्तविक सफलता विरोधी को हराने में नहीं, बल्कि आम आदमी की मुश्किलें कम करने, परिवारों को सुरक्षा देने और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य तैयार करने में है।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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