करोड़ों मतदाताओं के नाम काटे जाने के विवाद से लेकर पुलिस कार्रवाई तक—क्या चुनाव प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का निष्पक्ष जवाब मिलेगा?
विशेष विश्लेषण
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत न कोई सिंहासन है, न कोई ताज और न ही सत्ता के गलियारों में गूंजने वाले आदेश। इसकी असली ताकत उस आम नागरिक की उंगली पर लगी स्याही है, जिसके माध्यम से वह अपने शासकों का चुनाव करता है। लेकिन जब उसी वोट की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगें, वोटों के सहारे सत्ता में पहुंचे शासक ही मतदाताओं को फर्जी बताने लगें, मतदाता सूचियों से नाम हटाए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो जाए और देश की विपक्षी पार्टियां मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग करते हुए सड़कों पर उतर आएं, तो यह टकराव केवल राजनीतिक नहीं रह जाता। यह संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही, नागरिक के मतदान के अधिकार और लोकतंत्र में जनता के विश्वास की परीक्षा बन जाता है।
अक्टूबर 2026 में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग की विशेष गहन मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर उठा विवाद संवैधानिक बहस का केंद्र बन गया है। 12 अक्टूबर को कांग्रेस के नेतृत्व वाले INDIA गठबंधन के नेताओं और समर्थकों ने दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च करके मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने, एसआईआर प्रक्रिया पर रोक लगाने और वोटों में हेराफेरी की स्वतंत्र जांच की मांग उठाई। इससे पहले भी दिल्ली में कई दिनों से प्रदर्शन जारी थे।¹
इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर नामों का हटाया जाना है। द इंडियन एक्सप्रेस और रॉयटर्स की रिपोर्टों के मुताबिक, एसआईआर से संबंधित प्रक्रिया में लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा चर्चा में है। रिपोर्टों में मृत व्यक्तियों, दूसरी जगहों पर जा चुके लोगों और जिनका पता नहीं चल पाया, उनकी प्रविष्टियों को इस प्रक्रिया से जोड़ा गया है।
लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर समझना जरूरी है कि मतदाता सूची से हटाई गई हर प्रविष्टि अपने आप में किसी पात्र नागरिक के मतदान के अधिकार की गैरकानूनी कटौती साबित नहीं करती। मृत्यु, दोहरी प्रविष्टि या स्थायी रूप से स्थान बदलने के कारण नाम हटाना उचित हो सकता है। दूसरी ओर, यदि कोई पात्र नागरिक केवल सत्यापन की कमी, गलत छंटनी, दस्तावेजी कठिनाई या प्रशासनिक गलती के कारण सूची से बाहर हो जाता है, तो यह गंभीर समस्या है। इसलिए असली सवाल केवल यह नहीं है कि कितने नाम हटाए गए; सवाल यह भी है कि कितने नाम उचित कारणों से हटे, कितने पात्र मतदाता गलती से बाहर हुए और उन्हें दोबारा शामिल करने के लिए कौन-सी प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।
चुनाव आयोग ने एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूचियों को सटीक, अद्यतन और दोहरी या अपात्र प्रविष्टियों से मुक्त करना बताया है। इसके साथ ही, रिपोर्टों के अनुसार आयोग ने 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में छूट गए पात्र मतदाताओं को दोबारा दर्ज करने के लिए विशेष अभियान चलाने के निर्देश भी दिए हैं। यह कदम महत्वपूर्ण है, लेकिन इसकी सफलता का पैमाना केवल आदेश जारी होना नहीं, बल्कि वास्तव में पात्र मतदाताओं के नाम बहाल होना होगा।
विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर की कार्रवाई में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं और चुनाव आयोग के फैसलों की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं। विपक्षी नेताओं ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्र जांच की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में एसआईआर से जुड़े फैसलों और कथित अनियमितताओं की जांच कराने तथा जांच पूरी होने तक मतदान संबंधी प्रक्रिया स्थगित करने की मांग भी की गई है।¹
इसके विपरीत, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 13 अक्टूबर को एसआईआर का बचाव किया और विपक्ष के प्रदर्शनों को घुसपैठियों के मुद्दे से जोड़कर पेश किया। इस तरह विवाद अब केवल मतदाता सूचियों के तकनीकी संशोधन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें राजनीतिक विश्वास, चुनाव प्रबंधन और जवाबदेही के सवाल भी शामिल हो गए हैं। लेकिन लोकतंत्र में न तो किसी विपक्षी पार्टी का आरोप अदालत के फैसले का विकल्प हो सकता है और न ही सत्तारूढ़ पक्ष का जवाब या बयान जांच का विकल्प है। आरोपों की सच्चाई दस्तावेजों, आंकड़ों, कानूनी प्रक्रिया और स्वतंत्र जांच से ही परखी जाएगी।
10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने, यातायात पर प्रतिबंध और कुछ स्थानों पर इंटरनेट सेवाएं प्रभावित होने की रिपोर्टें सामने आईं। विरोध प्रदर्शनों की कवरेज कर रहे कुछ पत्रकारों और वकीलों ने भी पुलिस पर दुर्व्यवहार, रोक-टोक और गैरकानूनी हिरासत के आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की कानूनी जांच और संबंधित अधिकारियों का पक्ष महत्वपूर्ण है।
सुप्रीम कोर्ट ने 11 अक्टूबर की विशेष सुनवाई के दौरान कहा कि किसी व्यक्ति को कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के बिना हिरासत में नहीं लिया जाना चाहिए। अदालत ने शांतिपूर्ण और निहत्थे जमावड़ों, वकीलों और पत्रकारों के काम तथा शहर में आवागमन से जुड़े मुद्दों पर भी निर्देश दिए। 13 अक्टूबर को इन मामलों की अगली सुनवाई 15 अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दी गई।
यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण संवैधानिक सिद्धांत की ओर ध्यान आकर्षित करता है। संवैधानिक दायरे में सार्वजनिक प्रदर्शनों को नियंत्रित रखना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन शांतिपूर्ण विरोध करना भी नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है। दोनों के बीच संतुलन कानून के अनुसार बना रहना चाहिए। न तो प्रदर्शन के नाम पर कानून तोड़ने की छूट मिल सकती है और न ही कानून-व्यवस्था के नाम पर शांतिपूर्ण विरोध को अनावश्यक रूप से दबाया जा सकता है।
इस विवाद का समाधान केवल इस्तीफे की मांग या राजनीतिक बयानबाजी में नहीं छिपा है। इसके लिए कुछ ठोस कदम जरूरी हैं। मतदाता सूचियों से हटाए गए नामों के कारणों से संबंधित स्पष्ट आंकड़े सार्वजनिक किए जाएं, पात्र मतदाताओं के लिए सरल और समयबद्ध अपील प्रक्रिया हो, गलत तरीके से हटाए गए नामों की बहाली की निगरानी की जाए और जहां गंभीर अनियमितताओं के सबूत हों, वहां निष्पक्ष जांच के माध्यम से जवाबदेही तय की जाए।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियाद है। इसी तरह, उसकी निष्पक्षता और जवाबदेही भी लोकतंत्र की अनिवार्य शर्तें हैं। किसी संस्था की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि उससे सवाल न पूछे जाएं और सवाल पूछने का अर्थ यह भी नहीं है कि बिना सबूत उसे दोषी ठहरा दिया जाए। मुद्दा ज्ञानेश कुमार के पद से भी बड़ा है। सवाल यह है कि क्या भारत का हर पात्र नागरिक अपने मतदान के अधिकार को लेकर निश्चिंत रह सकता है?
यदि कोई गलत प्रविष्टि हटाई गई है, तो उसका कारण स्पष्ट होना चाहिए। यदि कोई पात्र मतदाता गलती से बाहर हुआ है, तो उसकी बहाली सुनिश्चित होनी चाहिए। यदि विपक्ष के आरोप निराधार हैं, तो दस्तावेजी सबूतों के माध्यम से उनका जवाब दिया जाना चाहिए और यदि कहीं नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
लोकतंत्र की जीत किसी एक पार्टी, नेता या पदाधिकारी की जीत नहीं होती। इसकी जीत तब होती है, जब सत्ता बदलने का फैसला करने वाले नागरिक को यह भरोसा हो कि उसकी वोट मतदाता सूची में भी सुरक्षित है और मतगणना में भी उसकी अहमियत बरकरार है। वोट केवल एक निशान नहीं है; यह नागरिक की आवाज, उसका अधिकार और लोकतंत्र के साथ उसका वादा है। इस वादे की रक्षा करना ही इस समय देश की सबसे बड़ी संवैधानिक कसौटी है।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







