लौंगोवाल, 15 अक्टूबर 2026 (चौधरी प्रभजीत सिंह): पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी (PAU), लुधियाना के निदेशक प्रसार शिक्षा के मार्गदर्शन में PAU-फार्म सलाहकार सेवा केंद्र (FASC), संगरूर द्वारा गांव लौंगोवाल (बटूहा खुर्द) में कृषि अवशेषों के खेत में प्रबंधन (In-situ Crop Residue Management–CRM) और खादों के संतुलित उपयोग संबंधी गांव स्तरीय किसान जागरूकता शिविर आयोजित किया गया।
किसानों को संबोधित करते हुए डॉ. अशोक कुमार गर्ग, वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक (मृदा विज्ञान) ने धान की पराली जलाने से पूरी तरह परहेज करने तथा पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ पराली प्रबंधन तकनीकें अपनाने की अपील की। उन्होंने बताया कि पराली को खेत में ही प्रबंधित करने से न केवल वायु प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है, बल्कि मूल्यवान पोषक तत्वों का पुनः उपयोग भी होता है। इससे मिट्टी में जैविक पदार्थ की मात्रा बढ़ती है, मिट्टी की सेहत में सुधार होता है और लंबे समय तक उसकी उत्पादकता बनी रहती है।
पराली जलाने से होने वाले प्रमुख पोषक तत्वों के नुकसान के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. गर्ग ने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलोग्राम जैविक कार्बन, 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है। उन्होंने कहा कि इन मूल्यवान तत्वों को जलाने के बजाय उचित पराली प्रबंधन तकनीकों के माध्यम से खेत में ही संरक्षित करके मिट्टी में मिलाया जाना चाहिए। इससे मिट्टी की उर्वरता और जैविक सेहत में सुधार होता है।
डॉ. गर्ग ने खेत में पराली प्रबंधन की विभिन्न तकनीकों, जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, PAU स्मार्ट सीडर और सतही बुवाई-सह-मल्चिंग (Surface Seeding-cum-Mulching) के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इन तकनीकों के उपयोग से पराली जलाए बिना समय पर गेहूं की बुवाई की जा सकती है।
उन्होंने मृदा परीक्षण को तर्कसंगत खाद प्रबंधन का आधार बताते हुए किसानों को मिट्टी और फसल की वास्तविक जरूरत के अनुसार पोषक तत्वों का उपयोग करने की सलाह दी। उन्होंने टिकाऊ फसल उत्पादन के लिए एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM) के साथ-साथ खादों के उचित और संतुलित उपयोग पर भी जोर दिया।
किसानों को रबी फसलों में अनुशंसित जैविक खाद मिश्रण के उपयोग, इसके लाभ और इस्तेमाल की सही विधि के बारे में भी जानकारी दी गई। इसके साथ ही पंजाब की कृषि परिस्थितियों के अनुकूल PAU द्वारा अनुशंसित गेहूं और अन्य रबी फसलों की किस्मों से भी अवगत करवाया गया।
विशेष रूप से नई अनुशंसित अधिक उपज देने वाली गेहूं की किस्म PBW 887 के बारे में जानकारी दी गई, जो लगभग 155 दिनों में पकती है और जिसकी औसत उपज 24.60 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके अतिरिक्त PBW 872 और PBW 826 के साथ-साथ विशेष गुणों वाली किस्मों PBW Zinc 2, PBW 1 Chapati, PBW RS 1 और PBW 1 Biscuit के बारे में भी जानकारी साझा की गई।
डॉ. गर्ग ने किसानों को रबी फसल चक्र में दलहनी और तिलहनी फसलों को शामिल करके फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने तथा संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन अपनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने घरेलू खपत और पोषण सुरक्षा के लिए विशेष रूप से गोभी सरसों (GSC 7), चना (PBG 10) और मटर (PB 90) की खेती करने की सलाह दी।
शिविर के दौरान किसानों ने सक्रिय रूप से भाग लिया और विभिन्न कृषि समस्याओं से संबंधित सवाल पूछे, जिनका डॉ. गर्ग ने उचित जवाब दिया। किसानों को गोभी सरसों का बीज, गेहूं के लिए जैविक खाद और PAU द्वारा तैयार कृषि साहित्य भी वितरित किया गया, ताकि वे विश्वविद्यालय की सिफारिशों को खेती में अपना सकें।
इस शिविर के सफल आयोजन में बटूहा खुर्द के सरपंच श्री जगराज सिंह और वडियाणी पिंडी के सरपंच श्री निहाल सिंह ने सक्रिय सहयोग दिया।






