शेरपुर/धूरी, 25 अक्टूबर 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और कृषि को अधिक टिकाऊ बनाने के उद्देश्य से पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना के निदेशक प्रसार शिक्षा के दिशा-निर्देशों के तहत फार्म सलाहकार सेवा केंद्र (एफएएससी), संगरूर की ओर से गांव हेड़ीके की कोऑपरेटिव सोसायटी में किसान जागरूकता शिविर आयोजित किया गया।
इस दौरान किसानों को धान की पराली के वैज्ञानिक प्रबंधन, उर्वरकों के संतुलित उपयोग, फास्फोरस के वैकल्पिक स्रोतों, गेहूं की उन्नत किस्मों और रबी की फसलों में विविधता लाने के बारे में जानकारी दी गई। शिविर में गांव हेड़ीके के 30 से अधिक किसानों ने भाग लिया।
डॉ. अशोक कुमार गर्ग, वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक एवं प्रभारी ने किसानों से धान की पराली जलाने की प्रथा छोड़कर इसका उपयोग मिट्टी की सेहत सुधारने के लिए करने की अपील की। उन्होंने बताया कि फसल अवशेष जैविक कार्बन और पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। इन्हें खेतों में ही संरक्षित करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति में सुधार होता है और लंबे समय तक फसलों की उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिलती है।
पराली जलाने से होने वाले नुकसान के बारे में जानकारी देते हुए डॉ. गर्ग ने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलोग्राम जैविक कार्बन, 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है। उन्होंने किसानों को हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, पीएयू स्मार्ट सीडर और सरफेस सीडिंग-कम-मल्चिंग जैसी पीएयू द्वारा अनुशंसित मशीनों एवं तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया, ताकि पराली को आग लगाए बिना अगली गेहूं की फसल की बिजाई की जा सके।
उर्वरक प्रबंधन पर चर्चा करते हुए डॉ. गर्ग ने जोर दिया कि उर्वरकों का उपयोग मिट्टी की जांच, फसल की जरूरत और पोषक तत्वों की संतुलित आपूर्ति के आधार पर किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि फास्फोरस की पूर्ति के लिए डीएपी ही एकमात्र विकल्प नहीं है। सिंगल सुपर फास्फेट (एसएसपी), ट्रिपल सुपर फास्फेट (टीएसपी) और एनपीके 12:32:16 जैसे उर्वरकों का भी उचित उपयोग किया जा सकता है।
डॉ. गर्ग ने किसानों को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा गेहूं के बीज पर लगाने वाले जैव उर्वरक के टीके, उसमें मौजूद सूक्ष्मजीवों और उनके फायदों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
शिविर के दौरान किसानों को आगामी रबी सीजन के लिए पीएयू द्वारा अनुशंसित गेहूं की किस्मों के बारे में भी बताया गया। डॉ. गर्ग ने पीबीडब्ल्यू 887 किस्म की विशेषताओं की जानकारी देते हुए कहा कि यह किस्म लगभग 155 दिनों में पककर तैयार हो जाती है और इसकी औसत उपज क्षमता 24.60 क्विंटल प्रति एकड़ है। इसके अलावा पीबीडब्ल्यू 872 और पीबीडब्ल्यू 826 के साथ-साथ विशेष उपयोग एवं पौष्टिक गुणों के लिए विकसित किस्मों, जैसे पीबीडब्ल्यू जिंक 2, पीबीडब्ल्यू 1 चपाती और पीबीडब्ल्यू आरएस 1 के बारे में भी जानकारी साझा की गई।
रबी की फसलों में विविधता को प्रोत्साहित करते हुए डॉ. गर्ग ने किसानों को उपयुक्त परिस्थितियों में गेहूं के साथ-साथ दलहनी और तिलहनी फसलों की खेती करने की सलाह दी। उन्होंने घरेलू उपयोग के लिए गोभी सरसों की किस्म जीएससी 7, चने की किस्म पीबीजी 10 और मटर की किस्म पीबी 90 के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस तरह की फसल विविधता से भोजन में पोषण और विविधता बढ़ने के साथ-साथ पोषण सुरक्षा तथा टिकाऊ कृषि को भी बढ़ावा मिलता है।
शिविर के दौरान किसानों ने पराली प्रबंधन, उर्वरकों के चयन, मैंगनीज तत्व के छिड़काव के समय और मात्रा, गेहूं की किस्मों तथा रबी की फसलों की योजना से संबंधित विभिन्न सवाल पूछे। डॉ. गर्ग ने किसानों के सवालों के उचित जवाब दिए।
किसानों को पीएयू की सिफारिशें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से गोभी सरसों के बीज, गेहूं के लिए जैव उर्वरक और पीएयू का कृषि साहित्य भी उपलब्ध करवाया गया।
इस कार्यक्रम की सफलता में रविंदर सिंह, कुलदीप सिंह, कोऑपरेटिव सोसायटी के सचिव तथा गांव हेड़ीके के अन्य किसानों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। अंत में रविंदर सिंह के बासमती के खेतों का दौरा भी किया गया।






