Tuesday, September 29, 2026
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हड़तालों के कारण बेहाल जनता : लोग दे रहे लोगों को सज़ा?

लोकतंत्र में विरोध की आवाज़ को दबाया नहीं जा सकता। अपनी मांगों के लिए हड़ताल करना, धरना देना, विरोध प्रदर्शन करना, सरकार की नीतियों से असहमति जताना और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना लोकतांत्रिक व्यवस्था का अहम हिस्सा है। लेकिन सवाल यह है कि जब किसी के अधिकारों की लड़ाई का सबसे बड़ा खामियाजा उस आम नागरिक को भुगतना पड़े, जिसका उस विवाद से कोई सीधा संबंध ही नहीं है, तो क्या यह विरोध अपने मूल लोकतांत्रिक उद्देश्य के साथ न्याय करता है?

आज पंजाब समेत देश के कई हिस्सों में हड़तालों, धरनों, सड़क जाम, सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार और सार्वजनिक परिवहन के ठप होने की घटनाएं आम लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। कहीं कर्मचारियों की हड़ताल, कहीं बसें बंद, कहीं कार्यालयों में कामकाज ठप और कहीं सड़कों पर विरोध प्रदर्शन—नतीजा यह कि आम नागरिक पूछने के लिए मजबूर है कि सरकार और आंदोलनकारियों के बीच टकराव की कीमत जनता ही क्यों चुकाए?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि अनुच्छेद 19(1)(b) शांतिपूर्ण और बिना हथियार एकत्र होने का अधिकार देता है। लेकिन ये अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं हैं। संविधान के अनुच्छेद 19(2) और 19(3) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था आदि के हित में उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार स्पष्ट किया है कि विरोध का अधिकार अन्य नागरिकों के अधिकारों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर सकता।

यहां यह बात उल्लेखनीय है कि विरोध के अधिकार और हड़ताल के अधिकार को हर स्थिति में समान कानूनी दर्जा प्राप्त नहीं है।

औद्योगिक संबंधों के क्षेत्र में 21 नवंबर 2025 से इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 लागू है। इसकी धारा 62 हड़ताल और तालाबंदी से संबंधित नियम निर्धारित करती है और निर्धारित परिस्थितियों में हड़ताल से पहले नोटिस का प्रावधान करती है। सरकार द्वारा जारी स्पष्टीकरण के अनुसार यह संहिता हड़ताल को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करती, लेकिन 14 दिन का नोटिस अनिवार्य करती है।

इसलिए यह कहना भी सही नहीं है कि हड़ताल अपने आप में गैर-कानूनी है और यह कहना भी सही नहीं है कि हर प्रकार की हड़ताल या सड़क जाम संवैधानिक अधिकार के नाम पर जायज है।

एक दिहाड़ीदार मजदूर के लिए बस बंद होने का मतलब केवल परिवहन की समस्या नहीं, बल्कि एक दिन की कमाई का नुकसान है।

एक मरीज के लिए अस्पताल तक पहुंचने में देरी केवल असुविधा नहीं, बल्कि कई बार जीवन और मृत्यु का सवाल हो सकती है।

एक विद्यार्थी के लिए सड़क जाम या परिवहन बंद होना परीक्षा, पढ़ाई या खेल का नुकसान है।

एक छोटे व्यापारी के लिए बाजार बंद होना सीधे आर्थिक नुकसान का कारण बनता है।

एक किसान के लिए मंडी या सरकारी कार्यालय का काम रुकना उसके समय और पैसे दोनों का नुकसान है।

इसलिए जब विरोध का हथियार इस हद तक पहुंच जाए कि सरकार पर दबाव बनाने के बजाय आम जनता को बंधक बनाया जाने लगे, तो हमें रुककर सोचना पड़ेगा।

शाहीन बाग मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार को स्वीकार करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रास्तों और सार्वजनिक स्थानों को अनिश्चितकाल तक रोका नहीं जा सकता। अदालत ने कहा कि लोकतंत्र और असहमति साथ-साथ चलते हैं, लेकिन विरोध के लिए निर्धारित स्थानों का इस्तेमाल और अन्य लोगों के अधिकारों का ध्यान रखना जरूरी है। इस फैसले का मूल संदेश किसी एक आंदोलन के पक्ष या विरोध में नहीं, बल्कि अधिकारों के संतुलन में है।

यदि एक व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है तो दूसरे व्यक्ति को उसी सड़क से गुजरने का अधिकार भी है।

यदि किसी संगठन को सरकार के खिलाफ नारे लगाने की स्वतंत्रता है तो एंबुलेंस में पड़े मरीज को अस्पताल पहुंचने का अधिकार भी है।

हर हड़ताल के लिए केवल कर्मचारियों या संगठनों को दोषी ठहराना भी न्यायसंगत नहीं है, क्योंकि कई बार हड़ताल की जड़ सरकार की लंबे समय तक चली चुप्पी होती है।

मांगें वर्षों तक लंबित रहती हैं। समितियां बनती हैं। बैठकें होती हैं। आश्वासन दिए जाते हैं। फाइलें एक मेज से दूसरी मेज तक जाती हैं। लेकिन फैसला नहीं होता। अंत में संगठन हड़ताल का रास्ता चुनता है।

सफल शासन की परीक्षा केवल यह नहीं है कि वह हड़ताल कैसे खत्म करवाता है। वास्तविक प्रशासनिक क्षमता यह है कि हड़ताल की नौबत ही कम से कम आए।

इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड, 2020 की धारा 62 हड़तालों के लिए नियम और नोटिस का प्रावधान करती है। इसी संहिता की धारा 63 निर्धारित परिस्थितियों में गैर-कानूनी हड़तालों और तालाबंदियों से संबंधित प्रावधान करती है। इसके अलावा संहिता में गैर-कानूनी हड़ताल को प्रोत्साहित करने तथा हिंसा, धमकी या जबरदस्ती जैसी कार्रवाइयों से संबंधित प्रावधान भी हैं।

इसका मतलब यह है कि कानून हड़ताल के मुद्दे को केवल “अधिकार बनाम सरकार” के रूप में नहीं देखता; औद्योगिक विवाद, बातचीत, नोटिस, सुलह और कानूनी प्रक्रिया भी इसका हिस्सा हैं। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है—पुराने इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 की धारा 22 का हवाला आज के मुद्दे में अकेले देना अपडेटेड कानूनी स्थिति नहीं होगी, क्योंकि 21 नवंबर 2025 से नया इंडस्ट्रियल रिलेशंस कोड लागू हो चुका है।

स्वास्थ्य, आपातकालीन सेवाओं, पानी, बिजली, परिवहन और अन्य अति-आवश्यक सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों की हड़ताल का प्रभाव सामान्य उद्योगों की तुलना में कहीं अधिक होता है।

यहां सरकार की जिम्मेदारी है कि जायज मांगों को समय पर सुने, लेकिन साथ ही जीवन रक्षक और अति-आवश्यक सेवाओं के लिए न्यूनतम सेवा व्यवस्था सुनिश्चित करे।

दूसरी ओर संगठनों को भी यह सोचना होगा कि उनकी लड़ाई सरकार से है या आम लोगों से?

सार्वजनिक सड़क किसी की निजी संपत्ति नहीं

धरना देना एक बात है।

सड़क को लंबे समय तक बंद कर देना दूसरी बात है।

एंबुलेंस, स्कूल बस, परीक्षा देने जा रहे विद्यार्थी या रोजी कमाने जा रहे मजदूर का रास्ता रोक देना बिल्कुल अलग बात है।

इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने शाहीन बाग मामले में सार्वजनिक रास्तों की लंबे समय तक की गई रोक को स्वीकार नहीं किया और प्रशासन को सार्वजनिक रास्तों को बाधाओं से मुक्त रखने की जिम्मेदारी की ओर संकेत किया।

यह सबसे गंभीर सवाल है—क्या “जिसकी लाठी, उसकी भैंस” लोकतंत्र का नया नियम बन रहा है?

यदि समाज में यह धारणा पैदा हो जाए कि मांग मनवाने के लिए पहले सड़क बंद करो, फिर सरकारी कार्यालय बंद करो, फिर परिवहन ठप करो और अंत में सरकार को फैसला करने के लिए मजबूर करो—तो यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

इससे धीरे-धीरे यह मानसिकता पैदा हो जाएगी कि “जिसके पास ज्यादा लोग, ज्यादा दबाव और ज्यादा राजनीतिक ताकत है, उसकी बात पहले सुनी जाएगी।”

फिर वह नागरिक जिसके पास न संगठन है, न राजनीतिक ताकत और न ही सड़क रोकने की क्षमता, वह भ्रष्टाचार का शिकार बनेगा।

यही वह मोड़ है जहां लोकतंत्र बहुमत का शासन तो रह सकता है, लेकिन हर नागरिक के अधिकारों की रक्षा करने वाली व्यवस्था कमजोर पड़ने लगती है।

सरकार को एक स्थायी और समयबद्ध संवाद प्रणाली बनानी चाहिए।

कर्मचारी संगठनों की मांगों के लिए:

  • नियमित बातचीत का मंच हो।
  • हर मांग पर लिखित स्थिति जारी की जाए।
  • जायज मांगों के लिए समय-सीमा निर्धारित हो।
  • फैसलों को लागू करने की निगरानी हो।
  • असहमति की स्थिति में स्वतंत्र सुलह या मध्यस्थता की व्यवस्था हो।
  • जरूरी सेवाओं के लिए वैकल्पिक प्रबंध पहले से तैयार हो।

आंदोलनकारी संगठनों को भी:

  • शांतिपूर्ण और अनुशासित विरोध को प्राथमिकता देनी चाहिए।
  • एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं का रास्ता खुला रखना चाहिए।
  • विद्यार्थियों, मरीजों और दिहाड़ीदारों के हितों का ध्यान रखना चाहिए।
  • लंबे समय तक सार्वजनिक रास्ते बंद करने के बजाय कानूनी और निर्धारित प्रदर्शन स्थलों का इस्तेमाल करना चाहिए।
  • हिंसा, धमकी और जबरदस्ती से पूरी तरह बचना चाहिए।

विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में हर मुद्दा हड़ताल तक क्यों पहुंचता है?

मांगें समय पर सुनी क्यों नहीं जातीं?

सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच स्थायी संवाद क्यों नहीं बन सकता?

अपने अधिकार के लिए लड़ते हुए उस आम नागरिक का अधिकार क्यों कुचला जाता है, जिसके लिए यह लोकतंत्र बना है?

यदि लोगों की आवाज सुनने के लिए हर बार सड़क पर उतरना पड़े, तो शासन के संवाद तंत्र की परिपक्वता क्या रह जाती है?

लोकतंत्र की ताकत विरोध को दबाने में नहीं, विरोध को सुनने की क्षमता में है।

आंदोलन की ताकत जनता को पीसने में नहीं, जनता को साथ लेकर अपनी बात मनवाने में है।

धरना हो, लेकिन एंबुलेंस का रास्ता खुला रहे।

हड़ताल हो, लेकिन जीवन बचाने वाली सेवाओं का प्रबंध बना रहे।

विरोध हो, लेकिन विद्यार्थी की परीक्षा न रुके।

संघर्ष हो, लेकिन दिहाड़ीदार की रोजी न छीनी जाए।

क्योंकि लोकतंत्र में सरकार भी जनता के लिए है और आंदोलन भी जनता के अधिकारों के लिए। यदि दोनों की लड़ाई में जनता ही पिसने लगे, तो फिर सवाल केवल हड़ताल का नहीं रहता—सवाल लोकतंत्र की कार्यप्रणाली का बन जाता है।

अधिकारों के लिए संघर्ष बेशक जरूरी है, लेकिन दूसरे के अधिकार या जीवन की कीमत पर बिल्कुल नहीं।

गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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