“खेतों और कारखानों में अगर निवेश, रोजगार और उत्पादन नहीं बढ़ा तो पंजाब की आर्थिक तस्वीर किस दिशा में जाएगी? यह सवाल हर पंजाबी को परेशान कर रहा है।”
पंजाब को कभी देश का आर्थिक इंजन कहा जाता था। हरित क्रांति ने कृषि को मजबूत किया, लुधियाना ने साइकिल और होजरी उद्योग को दुनिया तक पहचान दिलाई, जालंधर खेलों के सामान के लिए प्रसिद्ध हुआ और मंडी गोबिंदगढ़ ने लौह-इस्पात उद्योग में अपनी पहचान बनाई। लेकिन सवाल यह है कि आखिर पंजाब अपनी पुरानी आर्थिक ताकत को नए औद्योगिक मॉडल में क्यों नहीं बदल पाया?
आंकड़े निश्चित रूप से चिंता पैदा करते हैं। 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार पंजाब का कुल बकाया कर्ज करीब 4.48 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है। कर्ज-जीएसडीपी अनुपात लगभग 45 प्रतिशत के आसपास है। 2026-27 के लिए राज्य ने कुल सरकारी खर्च का लक्ष्य जीएसडीपी के करीब 4.08 प्रतिशत रखा है।
हालांकि कर्ज अपने आप में गलत नहीं है, असली सवाल यह है कि कर्ज का पैसा कहां खर्च हो रहा है? यदि इसका इस्तेमाल सड़कें, औद्योगिक पार्क, बिजली, पानी, लॉजिस्टिक्स, कौशल विकास और उत्पादक परिसंपत्तियां बनाने में हो तो यह भविष्य की आय बढ़ा सकता है। लेकिन यदि इसका बड़ा हिस्सा वेतन, सब्सिडी, ब्याज और रोजमर्रा के खर्चों में चला जाए तो कर्ज विकास का साधन बनने के बजाय भविष्य की आय पर बोझ बन जाता है।
पंजाब की औद्योगिक चुनौती केवल नए कारखाने लगाने तक सीमित नहीं है। छोटे और मध्यम उद्योगों के सामने महंगी बिजली, जमीन, वित्तीय लागत, आधुनिक तकनीक, कुशल श्रम, परिवहन और बाजार तक पहुंच जैसी कई समस्याएं हैं।
लुधियाना की मैन्युफैक्चरिंग इकाई, जालंधर के खेल सामान उद्योग या मंडी गोबिंदगढ़ की औद्योगिक इकाइयों के लिए बिजली की लागत, बैंक से मिलने वाला ऋण और समय पर ऑर्डर का भुगतान बेहद महत्वपूर्ण है। बड़े निवेशकों को नीतिगत स्पष्टता चाहिए, जबकि छोटे और मध्यम उद्योगों को सबसे पहले सुचारू कारोबार का माहौल चाहिए।
पंजाब की 2025-26 की आर्थिक तस्वीर भी कई सवाल खड़े करती है। राज्य की अनुमानित विकास दर 6.1 प्रतिशत रही, जबकि भारत की विकास दर इससे अधिक रही। उद्योग का सकल मूल्य वर्धन में हिस्सा करीब 29 प्रतिशत बताया गया है।
यह कहना भी सही नहीं होगा कि पंजाब में निवेश नहीं आ रहा। वित्त वर्ष 2026 में करीब 29,480 करोड़ रुपये के निवेश की रिपोर्ट है, जिससे 67,000 से अधिक रोजगार पैदा होने की संभावना जताई गई है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह निवेश पंजाब की पारंपरिक औद्योगिक क्षमता को नई ऊंचाई देने के लिए पर्याप्त है?
भारत की औद्योगिक अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रही है। 2026 की पहली तिमाही में देश की औद्योगिक विकास दर 9.2 प्रतिशत रही। यदि पंजाब इस गति के साथ नहीं चलता तो सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को होगा। रोजगार के स्थानीय अवसर सीमित होने पर युवा विदेश जाने को बेहतर विकल्प समझ सकते हैं। इससे गांवों से युवा आबादी का पलायन, परिवारों की बचत का विदेश में खर्च और पंजाब के उत्पादक आधार के कमजोर होने का खतरा बढ़ सकता है।
पंजाब को अब केवल “निवेश सम्मेलन” नहीं, बल्कि “औद्योगिक अमल मिशन” की जरूरत है।
- हर जिले की अपनी प्रमुख औद्योगिक पहचान विकसित की जाए।
- सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों के लिए सस्ता और आसान ऋण उपलब्ध कराया जाए।
- औद्योगिक क्षेत्रों में बिजली, पानी, सड़क और जल निकासी की बेहतर व्यवस्था सुनिश्चित हो।
- सिंगल-विंडो मंजूरी व्यवस्था को जमीन पर प्रभावी बनाया जाए।
- कृषि को फूड प्रोसेसिंग, डेयरी, मशीनरी और एग्री-टेक से जोड़ा जाए।
- आईटी, इलेक्ट्रॉनिक्स, नवीकरणीय ऊर्जा, रक्षा उपकरणों के पुर्जों और आधुनिक विनिर्माण में रोजगार के अवसर बढ़ाए जाएं।
- सरकारी खर्च में राजस्व व्यय से उत्पादक पूंजीगत व्यय की ओर स्पष्ट बदलाव किया जाए।
पंजाब की असली लड़ाई केवल कर्ज से नहीं, बल्कि कर्ज पैदा करने वाली परिस्थितियों से है।
यदि करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये का कर्ज भविष्य में नए उद्योग, रोजगार और बढ़ते कर राजस्व का आधार बनता है तो इसे निवेश में बदला जा सकता है। लेकिन अगर कर्ज बढ़ता रहे, उद्योग धीमा रहे, युवा बाहर जाते रहें और सरकारी आय उसी गति से न बढ़े, तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि पंजाब के भविष्य का संकट बन सकता है।
अब सवाल यह नहीं होना चाहिए कि “सरकार कितना खर्च कर रही है?” बल्कि यह होना चाहिए कि उस खर्च और निवेश से पंजाब में कितना नया उत्पादन, कितना नया निवेश और कितनी नई नौकरियां पैदा हो रही हैं?
छत्रपाल सिंह






