Wednesday, September 30, 2026
HomeLifestyleइलाज के लिए गांव से बड़े शहर का सफर, सफर में ही...

इलाज के लिए गांव से बड़े शहर का सफर, सफर में ही सफर का कहर

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था ने पिछले कुछ वर्षों में तकनीक, अस्पतालों और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के स्तर पर काफी प्रगति की है। लेकिन उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों और छोटे शहरों में आज भी एक कड़वी हकीकत मौजूद है। बीमारी का इलाज केवल डॉक्टर से नहीं, बल्कि समय पर डॉक्टर तक पहुंच से भी जुड़ा है। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश के बड़े हिस्सों से लेकर पंजाब और हरियाणा के कई ग्रामीण क्षेत्रों में मरीजों को गंभीर इलाज के लिए जिला मुख्यालयों या लखनऊ, दिल्ली, चंडीगढ़ जैसे बड़े स्वास्थ्य केंद्रों की ओर जाना पड़ता है। यह दूरी केवल भौगोलिक नहीं है; कई बार यह जिंदगी और मौत के बीच का अंतर बन जाती है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी—सबसे बड़ी कमजोरी

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के ग्रामीण स्वास्थ्य आंकड़ों के अनुसार, 31 मार्च 2022 को देश के ग्रामीण सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में आवश्यक 21,920 विशेषज्ञ डॉक्टरों की तुलना में केवल 4,485 विशेषज्ञ उपलब्ध थे। यानी आवश्यकता के मुकाबले बहुत बड़ी कमी थी।

उत्तर भारत के कई राज्यों में स्थिति और भी चिंताजनक थी। पंजाब में 449, हरियाणा में 483, बिहार में 754, मध्य प्रदेश में 1,262, राजस्थान में 1,939 और उत्तर प्रदेश में 2,398 विशेषज्ञों की कमी दर्ज की गई। ये आंकड़े केवल खाली पदों को नहीं दर्शाते। इनका सीधा अर्थ है कि गांव में प्रसव, बच्चों की गंभीर बीमारी, दुर्घटना, दिल का दौरा या किसी अन्य आपात स्थिति के समय मरीज को अक्सर अगले स्तर के अस्पताल में रेफर करना पड़ता है।

इलाज की दूरी से बढ़ता आर्थिक बोझ

ग्रामीण परिवार के लिए अस्पताल तक पहुंचना केवल स्वास्थ्य का नहीं, बल्कि आर्थिक मुद्दा भी है। परिवहन, जांच, दवाइयां, रहने-खाने और काम से छुट्टी—इन सभी खर्चों का बोझ एक साथ मरीज के परिवार पर पड़ता है।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के आंकड़ों में ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल से बाहर होने वाले इलाज पर भी लोगों द्वारा अपनी जेब से खर्च किए जाने की बात सामने आती है। इसलिए “मुफ्त इलाज” की उपलब्धता और “वास्तव में मुफ्त इलाज तक पहुंच” दो अलग-अलग बातें हैं।

छोटे शहरों को केवल रेफरल केंद्र न बनाया जाए

टियर-2 और टियर-3 शहरों में अस्पतालों का विस्तार हो रहा है, लेकिन बड़ी चुनौती गुणवत्तापूर्ण विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं की है। यदि छोटे शहर का अस्पताल केवल मरीजों को बड़े शहरों में भेजने का केंद्र बन जाए, तो बुनियादी ढांचा होने के बावजूद स्वास्थ्य सुरक्षा की वास्तविक खाई बनी रहेगी।

नीति आयोग ने भी भारत में अस्पताल सेवाओं और बिस्तरों की शहरी क्षेत्रों में अधिक केंद्रित उपलब्धता तथा ग्रामीण आबादी की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच से जुड़ी समस्याओं को रेखांकित किया है।

टेलीमेडिसिन अवसर है, पूर्ण समाधान नहीं

डिजिटल स्वास्थ्य और दूरस्थ चिकित्सा परामर्श ग्रामीण भारत के लिए एक बड़ा अवसर है। लेकिन जहां बिजली, इंटरनेट, जांच सुविधाएं और प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी ही कम हैं, वहां केवल दूर से डॉक्टर की सलाह मिलने से गंभीर बीमारी का पूर्ण उपचार संभव नहीं है।

इसलिए डिजिटल स्वास्थ्य को स्थानीय जांच केंद्रों, दवाइयों की उपलब्धता, एंबुलेंस सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों से जोड़ना होगा। सरकार ने भी ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर करने और कमजोर इंटरनेट वाले क्षेत्रों में डिजिटल स्वास्थ्य प्रणालियों को संचालित करने के लिए कई कदम उठाने की जानकारी दी है।

अब नीति नहीं, परिणाम चाहिए

उत्तर भारत की स्वास्थ्य समस्या का समाधान केवल नए अस्पताल बनाना नहीं है। आवश्यकता है कि हर स्तर पर डॉक्टर, नर्स, तकनीकी कर्मचारी, जांच सुविधाएं, जरूरी दवाइयां, एंबुलेंस और आपातकालीन व्यवस्थाएं एक साथ उपलब्ध हों।

गांव के मरीज के सामने यह विकल्प नहीं होना चाहिए कि वह इलाज करवाए या इलाज तक पहुंचने का खर्च उठाए। स्वास्थ्य का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब गुणवत्तापूर्ण इलाज केवल बड़े शहरों की सुविधा बनकर न रह जाए।

उत्तर भारत की वास्तविक स्वास्थ्य क्रांति उस दिन मानी जाएगी, जब गंभीर बीमारी की स्थिति में गांव का मरीज पहले यह न सोचे कि “मुझे किस बड़े शहर जाना पड़ेगा?”, बल्कि उसे यह भरोसा हो कि “मेरे पास ही समय पर इलाज मिल जाएगा।”

छत्रपाल सिंह

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments