22 सितंबर, 2026 (चौधरी प्रभजीत सिंह): नेपाल में हाल ही में आई हिमालयी तबाही के बाद पर्यावरण परिवर्तन और कार्बन गैसों के उत्सर्जन को लेकर एक बार फिर वैश्विक बहस छिड़ गई है। नेपाली मंत्री द्वारा प्राकृतिक आपदाओं के लिए चीन, अमेरिका और भारत को जिम्मेदार ठहराते हुए मुआवजे की मांग की गई थी, लेकिन वैज्ञानिक आंकड़े और पर्यावरण विशेषज्ञ इस दावे के अलग-अलग पहलू सामने रखते हैं।
प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन में भारत पश्चिमी देशों से काफी पीछे
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की एक कॉन्फ्रेंस के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखे गए पक्ष के अनुसार, पर्यावरण संरक्षण और कार्बन उत्सर्जन कम करने के मामले में भारत का प्रदर्शन धनी और विकसित देशों की तुलना में बेहतर है। आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी भारत में रहती है, जबकि कुल वैश्विक कार्बन उत्सर्जन में भारत की हिस्सेदारी मात्र 8 प्रतिशत है।
इसके विपरीत, अमेरिका की आबादी दुनिया की कुल आबादी का केवल 4 प्रतिशत है, लेकिन वह 12 प्रतिशत कार्बन गैसों का उत्सर्जन करता है। इसका मतलब है कि एक औसत अमेरिकी नागरिक भारतीय नागरिक की तुलना में लगभग 6 गुना अधिक कार्बन प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है। इसी तरह, यूरोप का प्रति व्यक्ति औसत उत्सर्जन भारत की तुलना में ढाई गुना और चीन का तीन गुना अधिक है।
नवीकरणीय ऊर्जा की दिशा में सफल कदम
भारत ने कार्बन गैसों में वृद्धि की दर को अंतरराष्ट्रीय लक्ष्यों की तुलना में एक-तिहाई तक कम करने में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। देश में नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए किए जा रहे प्रयासों के परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक तापमान वृद्धि (Global Warming) का सामना करने के लिए केवल विकासशील देशों को दोषी ठहराने के बजाय पश्चिमी देशों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। इसके साथ ही, आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित और बेहतर भविष्य के लिए नागरिकों को भी जीवाश्म ईंधनों के अनावश्यक उपयोग से बचने की आवश्यकता है।






