Monday, September 28, 2026
HomeLifestyleएल्गोरिद्म–डी.एन.ए. के रहस्य, न्याय को देंगे दिशा

एल्गोरिद्म–डी.एन.ए. के रहस्य, न्याय को देंगे दिशा

आनुवंशिक रहस्य और ‘बौद्धिक विनम्रता’—डिजिटल युग के दो अनदेखे संकट

एक समय था जब मनुष्य की पहचान उसके नाम, चेहरे और हस्ताक्षर से होती थी। फिर तकनीक उंगलियों के निशान, आवाज़ और चेहरे की पहचान तक पहुँची। अब विज्ञान मनुष्य की पहचान के सबसे भीतर के दरवाज़े—डीएनए—तक पहुँच चुका है।

इसके साथ ही एक और अदृश्य बदलाव के तहत हमारी सूचना की दुनिया भी ऐसे एल्गोरिद्म के हवाले होती जा रही है, जो हमें वही सामग्री बार-बार दिखाते हैं, जिससे हम पहले से सहमत होते हैं। नतीजा यह है कि मनुष्य केवल यह नहीं भूल रहा कि दूसरा व्यक्ति अलग सोच सकता है, बल्कि धीरे-धीरे वह यह क्षमता भी खो सकता है कि “शायद मैं गलत हूँ।”

ये दोनों संकट अलग दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर से एक ही सवाल पूछते हैं—आधुनिक तकनीक की ताकत के सामने आम इंसान की स्वायत्तता कहाँ खड़ी है?

वंशावली जानने के लिए लोग व्यावसायिक आनुवंशिक परीक्षण करवाते हैं। किसी को अपने पूर्वजों की धरती का पता चलता है, किसी को बिछड़े रिश्तेदार मिल जाते हैं और किसी को अपने पारिवारिक इतिहास के बारे में नई जानकारी मिलती है।

इसमें ऐसी जानकारी होती है, जिससे किसी व्यक्ति की पहचान, जैविक रिश्तों और कुछ परिस्थितियों में स्वास्थ्य या वंश से जुड़ी संवेदनशील जानकारी के बारे में अनुमान लगाए जा सकते हैं। भारत के सुप्रीम कोर्ट ने के.एस. पुट्टस्वामी मामले में निजता को संवैधानिक अधिकार मानते हुए डीएनए प्रोफाइल की उस विशेषता को भी दर्ज किया, जिसके माध्यम से आनुवंशिक रिश्तों के बारे में जानकारी निकाली जा सकती है।

यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपकी आनुवंशिक जानकारी के बारे में फैसला हमेशा आप स्वयं नहीं करते।

यदि आपका कोई रिश्तेदार अपना डीएनए किसी वंशावली डेटाबेस में डाल देता है, तो उससे आपके साथ जुड़े पारिवारिक आनुवंशिक संबंधों के बारे में भी संकेत मिल सकते हैं। वैज्ञानिकों ने दिखाया है कि दूर के रिश्तेदारों—अर्थात तीसरे या चौथे कज़िन तक—के मिलान के माध्यम से पारिवारिक वंश-वृक्ष तैयार करके किसी अज्ञात व्यक्ति तक पहुँचना संभव हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि रिश्तेदार ने आपका “पूरा डीएनए” किसी को दे दिया। साझा आनुवंशिक हिस्सों और पारिवारिक वंशावली से पहचान योग्य संकेत बन सकते हैं।

2018 में अमेरिका के गोल्डन स्टेट किलर मामले ने इस तकनीक की वास्तविक ताकत सामने रख दी। जांचकर्ताओं ने अपराध स्थल से मिले डीएनए को एक आनुवंशिक वंशावली डेटाबेस से मिलाया। दूर के रिश्तेदारों के संकेतों से पारिवारिक वंश-वृक्ष तैयार किया गया और आखिरकार जांच एक संदिग्ध व्यक्ति तक पहुँची।

अमेरिका के न्याय विभाग ने इस तकनीक को फॉरेंसिक जेनेटिक जेनेलॉजी के रूप में परिभाषित करते हुए 2019 में इसके उपयोग के लिए नीति जारी की और निजता तथा नागरिक स्वतंत्रताओं के साथ संतुलन की आवश्यकता पर जोर दिया।

यह तकनीक हत्याओं, अज्ञात शवों और पुराने अपराधों की जांच में बेहद उपयोगी हो सकती है। लेकिन यहीं कानून के सामने सबसे कठिन सवाल आता है—यदि “मैंने अपना डीएनए पुलिस को नहीं दिया, लेकिन मेरे किसी रिश्तेदार ने वंशावली के लिए दे दिया, तो मेरी आनुवंशिक पहचान पर मेरा अधिकार कितना बचा?”

क्योंकि एक ओर अपराध पीड़ितों को न्याय दिलाने का राज्य का वैध हित है, वहीं दूसरी ओर आनुवंशिक डेटा ऐसा डेटा है जिसे एक बार बड़े पैमाने पर एकत्र कर लिया जाए तो उसकी भविष्य में होने वाली सभी संभावित उपयोगिताओं का पहले से अनुमान लगाना कठिन है।

इसलिए भविष्य में ‘जेनेटिक बिल ऑफ राइट्स’ जैसे सिद्धांतों पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता है। इसमें स्पष्ट सहमति, उपयोग की सीमा, डेटा मिटाने का अधिकार, सरकारी पहुंच के लिए कानूनी मानदंड और व्यावसायिक उपयोग में पारदर्शिता शामिल हो सकती है।

भारत में निजता का संवैधानिक ढाँचा पहले से मौजूद है, लेकिन आनुवंशिक डेटा की विशिष्ट प्रकृति ऐसे विशेष सुरक्षा मानकों की आवश्यकता को लेकर गंभीर नीति-चर्चा को जन्म देती है।

दूसरा संकट: जब एल्गोरिद्म हमें केवल अपनी ही आवाज़ सुनाने लगें

डीएनए हमारे शरीर का नक्शा है, जबकि एल्गोरिद्म धीरे-धीरे हमारे सूचना-पर्यावरण का नक्शा तैयार कर रहे हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यह अनुमान लगाते हैं कि हम क्या देखना पसंद करेंगे। जिस पोस्ट पर हम रुकते हैं, जिस पर टिप्पणी करते हैं या जिसके साथ अधिक समय बिताते हैं, उसी तरह की और सामग्री हमारे सामने आ सकती है।

यह प्रक्रिया केवल हमारी जानकारी को नहीं बदलती; यह हमारी धारणा के माहौल को भी बदल सकती है।

2023 में नेचर में प्रकाशित फेसबुक और इंस्टाग्राम से जुड़े बड़े अध्ययनों की समीक्षा में बताया गया कि प्लेटफॉर्म की फीड में विचारधारा की दृष्टि से समान स्रोतों की बढ़ी हुई मौजूदगी एक वास्तविक घटना है। लेकिन उसी शोध ने यह भी दिखाया कि केवल एल्गोरिद्म बदल देने से राजनीतिक ध्रुवीकरण अपने आप समाप्त नहीं हो जाता।

2026 के एक बड़े प्रयोग में 2,000 लोगों को अलग-अलग फीड-रैंकिंग प्रणालियों का उपयोग कराया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि सामग्री को अलग-अलग तरीके से रैंक करने से राजनीतिक सामाजिक धारणाओं और ध्रुवीकरण वाली सामग्री के संपर्क में बदलाव आ सकता है।

2026 के एक अन्य प्रयोग में एक्स के ‘फॉर यू’ एल्गोरिद्मिक फीड का अमेरिकी उपयोगकर्ताओं की कुछ राजनीतिक धारणाओं में बदलाव के साथ संबंध पाया गया। हालांकि, अध्ययन में यह भी सामने आया कि हर प्रकार का ध्रुवीकरण इससे प्रभावित नहीं हुआ।

इसलिए यह कहना कि “एल्गोरिद्म ही हमें बांट रहे हैं”, बहुत सरल निष्कर्ष होगा। वास्तविक समस्या इससे कहीं अधिक गहरी है।

इस समय की सबसे मूल्यवान बौद्धिक क्षमता शायद केवल जानकारी इकट्ठा करना नहीं, बल्कि ज्ञान-संबंधी विनम्रता है।

इसका अर्थ है:

“मैं गलत हो सकता हूँ।”
“मेरे पास पूरे तथ्य नहीं हैं।”
“दूसरे व्यक्ति के पास मुझसे बेहतर सबूत हो सकता है।”
“मुझे इस विषय में और पढ़ना चाहिए।”

यह कमजोरी नहीं है। यह वैज्ञानिक सोच की बुनियाद है।

वैज्ञानिक अपनी धारणा को सबूत के सामने बदल सकता है। अच्छा पत्रकार अपनी पहली जानकारी को दूसरे स्रोत से जांचता है। अच्छा न्यायाधीश दोनों पक्षों को सुनता है। और एक जिम्मेदार नागरिक यह स्वीकार कर सकता है कि उसकी अपनी राय भी अधूरी हो सकती है।

लेकिन सोशल मीडिया का तेज़ रफ्तार वाला माहौल अक्सर इसके विपरीत काम करता है—पहले प्रतिक्रिया, बाद में तथ्य।

एक शीर्षक पढ़ा, राय बन गई।
एक वीडियो देखा, फैसला हो गया।
एक वायरल पोस्ट मिली, विरोधी को झूठा घोषित कर दिया।

यही वह जगह है जहाँ लोकतंत्र के लिए वास्तविक चुनौती पैदा होती है। लोकतंत्र केवल वोट डालने का नाम नहीं है; यह असहमति के बावजूद एक साथ रहने की क्षमता भी है।

शिक्षा का अगला पाठ: जवाब नहीं, सवाल

यदि स्कूल बच्चे को केवल सही उत्तर याद करना सिखाता है, तो वह परीक्षा पास कर सकता है। लेकिन यदि उसे यह नहीं सिखाया जाता कि उत्तर सही है या नहीं—इसे कैसे जांचना है—तो डिजिटल युग में वह हर चमकदार झूठ का आसान शिकार बन सकता है।

इसलिए शिक्षा में ‘क्रिटिकल थिंकिंग’ कोई अलग विषय नहीं होना चाहिए। इसे हर विषय की बुनियादी पद्धति बनाया जाना चाहिए।

शिक्षार्थियों के लिए सवाल होने चाहिए:

  • इस दावे का स्रोत क्या है?
  • इसका सबूत क्या है?
  • क्या कोई विरोधी सबूत भी है?
  • आंकड़ा किस संदर्भ में है?
  • यह तथ्य है या राय?
  • यदि मैं गलत हूँ, तो कौन-सी जानकारी मेरी राय बदल सकती है?

यूनेस्को की मीडिया एंड इन्फॉर्मेशन लिटरेसी की अवधारणा भी इसी दिशा में जाती है। इसका उद्देश्य लोगों को जानकारी तक पहुँचने, उसका विश्लेषण करने, उसकी विश्वसनीयता परखने और उसका जिम्मेदारी से उपयोग करने की क्षमता देना है। यूनेस्को इसे डिजिटल युग में आलोचनात्मक सोच, नागरिक भागीदारी और सूचना की विश्वसनीयता से जोड़ता है।

डीएनए डेटाबेस हमें हमारे अतीत से जोड़ सकते हैं, लेकिन वे किसी व्यक्ति की निजता का भविष्य भी तय कर सकते हैं।

एल्गोरिद्म हमें असीमित जानकारी तक पहुँच दे सकते हैं, लेकिन वे यह तय करने में भी भूमिका निभा सकते हैं कि हम कौन-सी जानकारी देखते ही नहीं।

इसलिए अगली पीढ़ी का सबसे महत्वपूर्ण अधिकार शायद केवल ‘डेटा प्राइवेसी’ नहीं होगा। इसमें आनुवंशिक स्वायत्तता, सूचना की स्वायत्तता और बौद्धिक स्वायत्तता—तीनों शामिल होंगे।

हमें ऐसा समाज नहीं चाहिए जहाँ कंपनियाँ हमारे जीन को जानती हों, एल्गोरिद्म हमारी पसंद को जानते हों और फिर दोनों मिलकर हमें यह बताएं कि हम कौन हैं, क्या सोचना है और किस पर विश्वास करना है।

वास्तविक स्वतंत्रता यह है कि हमें यह अधिकार बना रहे कि अपना डीएनए किसे देना है, अपनी जानकारी किससे लेनी है और अपनी राय बदलनी है या नहीं—इन फैसलों पर हमारा अपना नियंत्रण हो।

क्योंकि भविष्य की सबसे बड़ी लड़ाई शायद केवल जमीन, पानी या पैसे के लिए नहीं होगी।

यह लड़ाई मनुष्य के अपने शरीर, अपने डेटा और अपने विचारों पर अधिकार के लिए होगी।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments