भारतीय समाज में आध्यात्मिकता, संत परंपरा और गुरु-शिष्य परंपरा सदियों पुरानी है। लेकिन जब किसी धार्मिक स्थान का प्रमुख खुद को आध्यात्मिक मार्गदर्शक से ऊपर उठाकर लगभग “ईश्वरीय व्यक्तित्व” के रूप में प्रस्तुत करने लगे और उसके अनुयायी उसकी हर बात को ही एकमात्र सत्य मानने लगें, तो आस्था धीरे-धीरे व्यक्ति-पूजा और निजी सत्ता में बदल सकती है।
यही वह मोड़ है, जहां आध्यात्मिक संस्था और निजी साम्राज्य के बीच की सीमा धुंधली होने लगती है और गुरु, संस्था से ऊपर एक “सुपर अथॉरिटी” बन जाता है।
किसी धार्मिक नेता का लोकप्रिय होना अपने आप में अपराध नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब उसके विरोध को धर्म की बेअदबी, सवालों को पाप और कानूनी कार्रवाई को “साजिश” कहा जाने लगे।
ऐसे माहौल में अनुयायियों की स्वतंत्र सोच और तार्किक चेतना कमजोर पड़ सकती है। धार्मिक नेता की तस्वीर, नाम, पहनावा और उपदेश खुद एक ब्रांड बन जाते हैं। डेरा या धार्मिक संस्था फिर केवल आध्यात्मिक केंद्र नहीं रहती, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और कई बार राजनीतिक प्रभाव का केंद्र भी बन सकती है।
यह कहना सही नहीं है कि हर धार्मिक ट्रस्ट या संस्था करों से मुक्त होती है। भारतीय कानून के तहत धर्मार्थ या धार्मिक ट्रस्टों को कुछ शर्तें पूरी करने पर आयकर में छूट मिलती है। उनके लिए लेखा-जोखा, पंजीकरण और अन्य कानूनी शर्तें भी लागू होती हैं।
इसलिए असली मुद्दा यह नहीं है कि किसी धार्मिक संस्था के पास पैसा जमा हो रहा है, बल्कि सवाल यह है कि वह पैसा कहां से आया, कहां खर्च हुआ और क्या उसका हिसाब पारदर्शी है?
1920 का चैरिटेबल एंड रिलीजियस ट्रस्ट्स एक्ट भी कुछ परिस्थितियों में ट्रस्ट के प्रबंधन, आय और खातों की न्यायिक जांच की व्यवस्था करता है।
भारत के कुछ बड़े मामले दिखाते हैं कि किसी धार्मिक व्यक्ति के हाथों में अत्यधिक धार्मिक सत्ता कितनी गंभीर परिस्थितियां पैदा कर सकती है।
उदाहरण के तौर पर, सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में आसाराम मामले में पॉक्सो और अन्य गंभीर अपराधों में 2018 में उसकी सजा दर्ज है। अदालत के रिकॉर्ड में गवाहों पर हमले और धमकियों से संबंधित मामले भी दर्ज हुए हैं।
इसी तरह, 2017 में डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम सिंह की सजा के बाद पंचकूला और अन्य क्षेत्रों में हिंसा, आगजनी तथा सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने से संबंधित कई मामले दर्ज हुए। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के रिकॉर्ड में इन मामलों का उल्लेख मिलता है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी संस्था के सभी अनुयायी अपराधी नहीं होते। लेकिन जब किसी नेता के प्रति वफादारी को कानून, तथ्यों और न्याय से ऊपर रखा जाने लगे, तो संकीर्ण मानसिकता खतरनाक रूप ले सकती है। और सबसे बड़ा खतरा केवल अंधविश्वास नहीं, बल्कि जवाबदेही का अभाव बन जाता है।
यहां असली समस्या किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान नहीं, बल्कि बेलगाम सत्ता है।
जहां सवाल पूछना मना हो, पैसों का हिसाब अस्पष्ट हो, संस्था का प्रबंधन कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित हो, नेता को विरोध से ऊपर माना जाए और अनुयायी कानूनी जांच को भी धर्म-विरोधी समझने लगें, वहां समाज को सावधान होने की जरूरत है। आस्था निजी हो सकती है, लेकिन कोई भी व्यक्ति कानून से ऊपर नहीं हो सकता।
सच्ची आंतरिक साधना इंसान को समझदारी, विनम्रता और मर्यादा की ओर ले जाती है। यदि किसी “गुरु” के नाम पर सवाल पूछने की स्वतंत्रता खत्म हो जाए और देहधारी व्यक्ति की प्रशंसा को ही धर्म का मूल बना दिया जाए, तो समाज को गुरु की नहीं, बल्कि अपनी सोच की स्वतंत्रता की रक्षा करने की आवश्यकता होती है।
छत्रपाल सिंह






