Wednesday, November 4, 2026
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वेटरनरी विश्वविद्यालय द्वारा “बीटल नस्ल की बकरियों में सुधार के लिए रूपरेखा” विषय पर विचार-गोष्ठी का आयोजन

लुधियाना, 31 अक्टूबर, 2026 (गुरमीत सिंह तुंग): गुरु अंगद देव वेटरनरी एवं एनिमल साइंसेज विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा “पंजाब में बीटल नस्ल की बकरियों में सुधार के लिए रूपरेखा: संरक्षण से व्यावसायीकरण तक” विषय पर एक विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, उद्योग जगत के प्रतिनिधियों तथा प्रगतिशील बकरी पालकों ने भाग लिया। इसका उद्देश्य पंजाब की स्वदेशी बीटल नस्ल की बकरियों के संरक्षण एवं सुधार के लिए रणनीतियों पर विचार-विमर्श करना था।

इस कार्यक्रम के संरक्षक डॉ. जतिंदर पाल सिंह गिल, वाइस चांसलर थे, जबकि डॉ. रविंदर सिंह ग्रेवाल, निदेशक प्रसार शिक्षा ने विचार-गोष्ठी की अध्यक्षता की। डॉ. गिल ने कहा कि इस विचार-गोष्ठी से अनुसंधान संस्थानों, सरकारी विभागों, किसानों और औद्योगिक भागीदारों के बीच सहयोग को मजबूती मिलेगी। इससे पंजाब में बीटल नस्ल के संरक्षण, आनुवंशिक सुधार तथा व्यावसायीकरण के लिए समन्वित दृष्टिकोण अपनाने का मार्ग प्रशस्त होगा।

मखदूम स्थित ‘सेंट्रल इंस्टीट्यूट फॉर रिसर्च ऑन गोट्स’ के प्रमुख समन्वयक डॉ. एम.के. सिंह ने नस्ल विकास के लक्ष्य को प्राप्त करने में बकरी पालन क्षेत्र के योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने नस्ल संरक्षण, वैज्ञानिक प्रजनन, उत्पादकता में सुधार, बेहतर वीर्य संरक्षण तथा व्यावसायिक प्रोत्साहन के लिए सामूहिक एवं सहयोगात्मक दृष्टिकोण विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

तकनीकी विचार-विमर्श के दौरान बीटल नस्ल की वर्तमान स्थिति, विशेषताओं एवं चुनौतियों; वेटरनरी विश्वविद्यालय में आनुवंशिक सुधार तथा ‘स्टॉल फीडिंग’ (खुरली में चारा खिलाने) की विधियों से प्राप्त अनुभवों; प्रजनन उद्देश्यों एवं चयन मानदंडों तथा किसानों के स्तर पर आनुवंशिक सुधार की रणनीतियों पर चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बकरों के वीर्य संरक्षण, बकरी पालन में रोगों की रोकथाम, जैव सुरक्षा, आर्थिक व्यवहार्यता, विपणन रणनीतियों, बकरी पालन के लिए नीतिगत सहयोग तथा बकरी पालकों के लिए रोजगार के अवसरों पर भी विचार-विमर्श किया।

डॉ. ग्रेवाल ने बताया कि बीटल बकरी नस्ल का संरक्षण एवं आनुवंशिक सुधार पंजाब के पशुधन क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने तथा टिकाऊ ग्रामीण आजीविका को प्रोत्साहित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने किसानोन्मुखी तकनीकों के विकास, बाजार संबंधों को मजबूत करने तथा वैज्ञानिक बकरी पालन पद्धतियों के प्रति जागरूकता पैदा करने के महत्व पर जोर दिया।

समापन सत्र प्रतिभागियों के विचारों, खुले विचार-विमर्श तथा नीतिगत सिफारिशें तैयार करने के लिए समर्पित रहा। इस पहल ने पंजाब में वैज्ञानिक बकरी पालन को बढ़ावा देने, स्वदेशी पशुओं के आनुवंशिक संसाधनों के संरक्षण तथा टिकाऊ पशुधन आधारित आजीविका को प्रोत्साहित करने के प्रति विश्वविद्यालय की प्रतिबद्धता को पुनः पुष्ट किया।

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