Thursday, November 5, 2026
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सत्ता का मर्ज, पंजाब सिर कर्ज

तीन दशकों के वित्तीय प्रदर्शन, कर्ज की वास्तविक तस्वीर और पंजाब के आर्थिक भविष्य पर गंभीर पड़ताल

पंजाब की अर्थव्यवस्था आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां कर्ज का लगातार बढ़ता आंकड़ा केवल सरकारी खजाने का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह राज्य के भविष्य, विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आने वाली पीढ़ियों की आर्थिक स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल बन चुका है। चिंता की बात यह है कि पिछले तीन दशकों के दौरान पंजाब में सरकारें बदलती रहीं, राजनीतिक दलों ने अपने-अपने विकास मॉडल पेश किए और चुनावों में बड़े-बड़े वादे किए, लेकिन राज्य पर बढ़ते कर्ज की रफ्तार को नियंत्रित करने में कोई भी सरकार सफल नहीं हो सकी।

इस मुद्दे को किसी एक सरकार की विफलता बताकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा और सभी सरकारों को समान रूप से जिम्मेदार ठहराना भी तथ्यों के साथ न्याय नहीं होगा। इसलिए जरूरी है कि पंजाब की वित्तीय स्थिति को ऐतिहासिक आंकड़ों, सरकारी दस्तावेजों और आर्थिक वास्तविकताओं के आधार पर समझा जाए।

तीन दशकों की राजनीति और कर्ज का सफर: वर्ष 1997 में अकाली दल-भाजपा गठबंधन की सरकार बनी। उस समय पंजाब की वित्तीय स्थिति पहले से ही कई चुनौतियों से घिरी हुई थी। अशांति के दशक, सरकारी खर्चों और आय के सीमित स्रोतों ने राज्य की अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया हुआ था। उस दौरान केंद्र से मिली वित्तीय राहत और कर्ज के पुनर्गठन से जुड़े फैसलों का भी उल्लेख मिलता है। लेकिन 2002 में जब सरकार बदली, तब तक राज्य पर कर्ज का बोझ पहले की तुलना में काफी बढ़ चुका था।

वर्ष 2002 से 2007 तक कैप्टन अमरिंदर सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार सत्ता में रही। इस अवधि के दौरान भी सरकारी वित्तीय घाटे और कर्ज में वृद्धि का सिलसिला जारी रहा। इसके बाद 2007 से 2017 तक अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने लगातार दो कार्यकाल पूरे किए। इस दशक के दौरान भी पंजाब की देनदारियों में भारी बढ़ोतरी हुई।

वर्ष 2017 से 2022 तक फिर कांग्रेस की सरकार रही। इस कार्यकाल में भी कर्ज का ग्राफ नीचे आने के बजाय लगातार ऊपर की ओर बढ़ता रहा। वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी की सरकार सत्ता में आई तो उसे पहले से ही बड़ी देनदारियों, कर्मचारियों के बकाये, पेंशन और ब्याज के भुगतान के बोझ वाली अर्थव्यवस्था विरासत में मिली।

यहां एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल के दौरान कर्ज में हुई वृद्धि की सही तुलना के लिए हर साल 31 मार्च को दर्ज सरकारी देनदारियों के आंकड़ों को एक ही मापदंड के आधार पर देखना चाहिए। बजट अनुमान, संशोधित अनुमान और वास्तविक आंकड़ों को आपस में मिलाकर पेश करना भ्रामक हो सकता है।

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और पंजाब सरकार के वित्तीय दस्तावेजों पर आधारित अध्ययनों में कर्ज के आंकड़े इससे कहीं अधिक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। उदाहरण के तौर पर, पंजाब का सरकारी सार्वजनिक कर्ज 2001-02 में लगभग 34,063 करोड़ रुपये, 2006-07 में 51,155 करोड़ रुपये, 2011-12 में 83,099 करोड़ रुपये और 2016-17 में 1,82,526 करोड़ रुपये दर्ज किया गया था। वर्ष 2021-22 तक यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 2,81,773 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कर्ज की समस्या किसी एक सरकार के कार्यकाल में पैदा नहीं हुई, बल्कि कई सरकारों के दौरान लगातार गंभीर होती गई।

एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2016-17 में कर्ज में अचानक हुई भारी वृद्धि का एक कारण लगभग 30,584 करोड़ रुपये की अनाज खरीद से संबंधित नकद ऋण सीमा (कैश क्रेडिट लिमिट) की देनदारी को दीर्घकालिक कर्ज में बदलना और उदय (यूडीएवाई) योजना के तहत बिजली क्षेत्र की देनदारियों को अपने ऊपर लेना भी था। इसलिए केवल साल-दर-साल कर्ज में हुई वृद्धि को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह जानना भी जरूरी है कि कर्ज क्यों लिया गया और उसका इस्तेमाल कहां किया गया।

साढ़े चार लाख करोड़ का आंकड़ा: वास्तविक स्थिति क्या है? पंजाब विधानसभा में 8 मार्च 2026 को पेश किए गए 2026-27 के बजट और पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के विश्लेषण के अनुसार, 31 मार्च 2027 तक पंजाब की कुल बकाया देनदारियां लगभग 4,47,754 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यह आंकड़ा लगभग साढ़े चार लाख करोड़ रुपये बनता है। लेकिन यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि यह 4 नवंबर 2026 तक दर्ज अंतिम वास्तविक कर्ज का आंकड़ा नहीं, बल्कि वित्त वर्ष के अंत के लिए लगाया गया बजट अनुमान है।

इसी बजट के अनुसार 2026-27 में पंजाब का सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 9,80,635 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है और कुल बकाया देनदारियां इसका लगभग 45.1 प्रतिशत बनती हैं। यह अनुपात अपने आप में चिंता का विषय है, क्योंकि कर्ज चुकाने के लिए सरकार को हर साल अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा निर्धारित करना पड़ता है।

आय का बड़ा हिस्सा ब्याज, वेतन और पेंशन पर खर्च: पंजाब की आर्थिक समस्या का सबसे गंभीर पहलू यह है कि सरकार की आय का बड़ा हिस्सा पहले से निर्धारित खर्चों में चला जाता है। 2026-27 के बजट अनुमानों के अनुसार, वेतन के लिए 39,115 करोड़ रुपये, पेंशन के लिए 22,465 करोड़ रुपये और कर्ज के ब्याज के भुगतान के लिए 28,755 करोड़ रुपये रखे गए हैं। इन तीनों खर्चों को मिलाकर कुल राशि 90,335 करोड़ रुपये बनती है।

दूसरी ओर, इसी वर्ष सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियां 1,26,190 करोड़ रुपये अनुमानित हैं। इसका मतलब है कि राजस्व प्राप्तियों का लगभग 72 प्रतिशत हिस्सा केवल वेतन, पेंशन और ब्याज के भुगतान पर खर्च हो जाएगा। इसके बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़कों, ग्रामीण विकास, कृषि, उद्योग और अन्य जनकल्याणकारी कार्यों के लिए सरकार के पास सीमित वित्तीय गुंजाइश बचती है।

यहां एक अन्य तथ्य पर ध्यान देना भी जरूरी है। पंजाब की अपनी कर आय 2026-27 के लिए 70,851 करोड़ रुपये अनुमानित की गई है, लेकिन यह राज्य की कुल आय नहीं है। इसके अलावा केंद्रीय करों में हिस्सा, गैर-कर राजस्व और केंद्रीय अनुदान भी राजस्व प्राप्तियों का हिस्सा होते हैं। इसलिए अपनी कर आय को कुल आय बताना राज्य की वित्तीय तस्वीर को अधूरा कर देगा।

इसी तरह बिजली सब्सिडी पंजाब के खजाने पर एक बड़ी जिम्मेदारी है। किसानों, घरेलू उपभोक्ताओं और अन्य वर्गों को दी जाने वाली सब्सिडी का अपना सामाजिक महत्व है। लेकिन सब्सिडी का भुगतान समय पर हो, इसका लाभ वास्तविक पात्र लोगों तक पहुंचे और बिजली वितरण प्रणाली में होने वाले नुकसान को कम किया जाए, यह भी उतना ही जरूरी है। जनकल्याणकारी योजनाएं और वित्तीय अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए।

कर्ज कहां खर्च हो रहा है, यह जानना भी जरूरी: कर्ज लेना अपने आप में गलत नहीं है। दुनिया की सरकारें कर्ज लेती हैं। लेकिन आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, कर्ज का इस्तेमाल और उससे मिलने वाला लाभ सबसे महत्वपूर्ण होता है। यदि कर्ज से नए उद्योग स्थापित हों, रोजगार पैदा हो, सिंचाई व्यवस्था में सुधार आए, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो तथा राज्य की उत्पादन क्षमता बढ़े, तो यह भविष्य में आय का स्रोत बन सकता है।

लेकिन यदि कर्ज का इस्तेमाल मुख्य रूप से रोजमर्रा के सरकारी खर्चों, पुराने कर्ज के ब्याज, चुनावों के दौरान किए गए वादों को पूरा करने और वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए किया जाए, तो यह समस्या को और गहरा कर देता है।

इसी संदर्भ में दो आर्थिक शब्दों को समझना जरूरी है। पहला है राजस्व घाटा (रेवेन्यू डेफिसिट), जिसका अर्थ है कि सरकार की रोजमर्रा की आय उसके रोजमर्रा के खर्चों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। दूसरा है राजकोषीय घाटा (फिस्कल डेफिसिट), जिसका अर्थ है कि सरकार की कुल आय और गैर-कर्ज प्राप्तियों की तुलना में उसका कुल खर्च कितना अधिक है।

पंजाब के 2026-27 के बजट में राजस्व घाटा 21,955 करोड़ रुपये और राजकोषीय घाटा 39,971 करोड़ रुपये अनुमानित किया गया है। राजकोषीय घाटा राज्य के सकल घरेलू उत्पाद का 4.1 प्रतिशत बनता है, जबकि 16वें वित्त आयोग ने 2026 से 2031 की अवधि के लिए राज्यों का वार्षिक राजकोषीय घाटा सामान्य तौर पर 3 प्रतिशत तक रखने की सिफारिश की है। ये आंकड़े सरकार के सामने मौजूद आर्थिक चुनौती को स्पष्ट करते हैं।

क्या पंजाब में वित्तीय आपातकाल लागू हो सकता है? इस मामले में संविधान के अनुच्छेद 360 का हवाला देकर वित्तीय आपातकाल लागू होने की आशंकाएं जताई जा रही हैं। लेकिन इस विषय को राजनीतिक बयानबाजी के बजाय संवैधानिक प्रावधानों की रोशनी में समझना चाहिए।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 360 के अनुसार, यदि राष्ट्रपति इस बात से संतुष्ट हों कि भारत या उसके किसी हिस्से की वित्तीय स्थिरता अथवा साख को खतरा पैदा हो गया है, तो वे वित्तीय आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना अनिवार्य है। ऐसी घोषणा को दो महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों की मंजूरी लेनी होती है।

वित्तीय आपातकाल के दौरान केंद्र सरकार राज्यों को वित्तीय अनुशासन से संबंधित निर्देश दे सकती है। इनमें सरकारी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती करने के निर्देश भी शामिल हो सकते हैं। इसलिए यह कोई सामान्य संवैधानिक प्रावधान नहीं है। हालांकि, केवल पंजाब पर कर्ज का भारी बोझ होने से अनुच्छेद 360 अपने आप लागू नहीं हो जाता। भारत में आज तक वित्तीय आपातकाल लागू नहीं किया गया है।

पंजाब को वित्तीय संकट से बाहर निकालने के लिए क्या करना होगा? सबसे पहले पंजाब सरकार को एक व्यापक और पारदर्शी वित्तीय श्वेत पत्र जारी करना चाहिए, जिसमें पिछले तीन दशकों के दौरान लिए गए कर्ज, उसके इस्तेमाल, ब्याज के भुगतान, सरकारी गारंटियों और विभिन्न विभागों की देनदारियों का पूरा विवरण हो।

दूसरा, राज्य की आय बढ़ाने के लिए कृषि आधारित उद्योगों, छोटे और मध्यम उद्योगों, पर्यटन, सूचना प्रौद्योगिकी और निर्यात को बढ़ावा देना होगा। केवल टैक्स बढ़ाकर या संपत्तियां बेचकर स्थायी आर्थिक खुशहाली नहीं लाई जा सकती।

तीसरा, सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के वित्तीय प्रबंधन का ऑडिट होना चाहिए। घाटे में चल रहे संस्थानों की कार्यप्रणाली में सुधार किया जाए और सरकारी खर्चों में होने वाली अनावश्यक फिजूलखर्ची को रोका जाए।

चौथा, सब्सिडी और जनकल्याणकारी योजनाओं को बंद करने के बजाय उनका पारदर्शी और लक्षित वितरण सुनिश्चित किया जाए। इसके साथ ही नए कर्ज का इस्तेमाल विकासोन्मुखी और आय पैदा करने वाली परियोजनाओं के लिए किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकार को कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (डीए), वेतन, पेंशन और अन्य कानूनी देनदारियों के संबंध में स्पष्ट और समयबद्ध योजना सार्वजनिक करनी चाहिए। इन लोगों के अधिकारों को राज्य की आर्थिक विफलता की कीमत नहीं बनाया जा सकता।

पंजाब का कर्ज किसी एक पार्टी, एक मुख्यमंत्री या एक सरकार की देन नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही वित्तीय लापरवाही, नीतिगत कमजोरियों, आय के सीमित स्रोतों और सरकारी खर्चों में गैर-जिम्मेदाराना रवैये का नतीजा है। इसलिए पिछली सरकारों को भी अपने कार्यकाल का हिसाब देना होगा और मौजूदा सरकार को भी अपने प्रदर्शन के लिए जवाबदेह होना पड़ेगा।

राजनीतिक दलों को भी समझना होगा कि मुफ्त सुविधाएं, रियायतें और चुनावी घोषणापत्रों में किए गए वादे तभी टिकाऊ हो सकते हैं, जब उनके पीछे आय का पक्का स्रोत और मजबूत वित्तीय प्रबंधन मौजूद हो।

पंजाब का युवा रोजगार के लिए विदेशों की ओर जा रहा है, किसान आर्थिक दबाव में हैं, उद्योग दूसरे राज्यों की ओर रुख कर रहे हैं और सरकारी खजाना कर्ज के भुगतान में उलझा हुआ है। ऐसे हालात में राज्य की प्राथमिकता केवल अगले चुनाव जीतना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आर्थिक रूप से मजबूत पंजाब तैयार करना होनी चाहिए।

आज पंजाब के लोग सरकार से केवल यह जवाब नहीं चाहते कि पिछली सरकार कितना कर्ज छोड़कर गई थी। वे यह भी जानना चाहते हैं कि मौजूदा सरकार ने कितना नया कर्ज लिया, उसमें से कितना विकास पर खर्च किया, उससे कितनी आय पैदा हुई और आने वाले पांच वर्षों में कर्ज को नियंत्रित करने के लिए उसकी क्या योजना है।

यहां इस बात को समझना जरूरी है कि कर्ज लेकर सरकार चलाई जा सकती है, लेकिन कर्ज के सहारे किसी राज्य का भविष्य नहीं बनाया जा सकता। पंजाब को कर्ज की नहीं, बल्कि आय, उद्योग, रोजगार, उत्पादन और जवाबदेह शासन की नई दिशा और नए दृष्टिकोण की जरूरत है।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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