पंजाब की राजनीति एक बार फिर नए मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनावों का समय नजदीक आने के साथ ही प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने अपनी गतिविधियां तेज कर दी हैं। दल-बदल, आंतरिक बगावत, पुराने राजनीतिक गठबंधनों की संभावित वापसी और नए सियासी समीकरणों ने पंजाब के राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया है। इस बार मुकाबला केवल सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और विपक्षी कांग्रेस के बीच नहीं रहने वाला, बल्कि भाजपा की बढ़ती सक्रियता और अकाली दल के विभिन्न गुटों की भविष्य की रणनीति भी चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती है।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने 117 में से 92 सीटें जीतकर ऐतिहासिक बहुमत हासिल किया था। कांग्रेस 18 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही, जबकि शिरोमणि अकाली दल को तीन और भाजपा को दो सीटें मिली थीं। उस समय पंजाब के मतदाताओं ने पारंपरिक पार्टियों को पीछे छोड़कर नई राजनीतिक उम्मीद को मौका दिया था। लेकिन पांच साल के कार्यकाल के बाद अब सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी अपना पुराना जनसमर्थन बरकरार रख पाएगी या विपक्षी दल इस मौके का लाभ उठाएंगे?
आम आदमी पार्टी को तीन विधायकों का झटका
चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी के लिए सबसे ताजा राजनीतिक झटका तीन विधायकों का भाजपा में शामिल होना है। 2 नवंबर 2026 को सनौर से हरमीत सिंह पठानमाजरा, समाना से चेतन सिंह जोड़ामाजरा और अमृतसर उत्तर से कुंवर विजय प्रताप सिंह ने भाजपा का दामन थाम लिया।
यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दल-बदल आम आदमी पार्टी द्वारा 2027 के विधानसभा चुनावों के लिए 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी करने के तुरंत बाद हुआ है। पार्टी ने 31 अक्टूबर को अपनी पहली सूची जारी करते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान को दोबारा धूरी से उम्मीदवार घोषित किया था।
तीनों नेताओं के भाजपा में शामिल होने से संकेत मिला है कि चुनावों से पहले टिकट, पार्टी के भीतर नाराजगी और राजनीतिक भविष्य को लेकर नेताओं में हलचल बढ़ रही है। इन नेताओं ने पंजाब की कानून-व्यवस्था, नशों और सरकार के कामकाज पर भी सवाल उठाए हैं।
हालांकि, विधायक का पार्टी छोड़ना और विधानसभा की सदस्यता छोड़ना कानूनी रूप से अलग-अलग विषय हैं। हरमीत सिंह पठानमाजरा और कुंवर विजय प्रताप सिंह के इस्तीफे स्पीकर द्वारा स्वीकार किए जाने की खबरें सामने आई हैं, जबकि चेतन सिंह जोड़ामाजरा के मामले में दल-बदल विरोधी कानून के तहत कार्रवाई का सवाल भी उठा है।
यह घटनाक्रम भाजपा के लिए संगठनात्मक रूप से फायदेमंद हो सकता है, लेकिन इसे आम आदमी पार्टी की चुनावों में हार का पक्का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।
मानसा का मोर्चा और नशों का राजनीतिक प्रभाव
पंजाब की राजनीति में नशों का मुद्दा पहले भी महत्वपूर्ण रहा है, लेकिन मानसा में नशों के खिलाफ आवाज उठाने वाले परविंदर सिंह झोटा की हत्या के बाद यह मुद्दा और गंभीर हो गया है।
14 अक्टूबर को सामने आई रिपोर्टों के अनुसार, परविंदर सिंह झोटा को मानसा के एक मेडिकल स्टोर पर हुए टकराव के दौरान गोली मार दी गई थी। घटना के समय वह नशीले पदार्थों की कथित बिक्री पर आपत्ति जता रहे थे और सोशल मीडिया पर लाइव भी थे। इस गोलीबारी में उनके चार साथी भी घायल हुए थे।
मुख्य आरोपी के रूप में नामजद केमिस्ट अश्वनी कुमार को पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने की खबर भी सामने आई थी। इस घटना के बाद विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक संगठनों ने मोर्चा लगाया। प्रदर्शनकारियों ने न्याय, पुलिस प्रशासन की जवाबदेही और नशे के कारोबार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की मांग की।
इस मामले ने सरकार के नशा विरोधी दावों को भी राजनीतिक जांच के दायरे में ला दिया है। विपक्षी पार्टियां इस घटना को सरकार की कानून-व्यवस्था से जोड़ रही हैं, जबकि भाजपा इसे पंजाब में अपनी राजनीतिक मुहिम का अहम मुद्दा बना रही है।
लेकिन नशे जैसी गंभीर समस्या का समाधान केवल राजनीतिक बयानबाजी से नहीं हो सकता। इसके लिए नशा तस्करी के नेटवर्क, वित्तीय स्रोतों, सीमा पार से होने वाली तस्करी, नशा मुक्ति केंद्रों और पुनर्वास की व्यवस्था पर ठोस कार्रवाई जरूरी है।
बादल दल के लिए पुराने विवाद और नई चुनौतियां
शिरोमणि अकाली दल बादल की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। वर्ष 2007 से 2017 तक सत्ता में रहने के दौरान हुए विवाद, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी के मामले, बहिबल कलां और कोटकपूरा गोलीकांड जैसी घटनाएं आज भी पार्टी की राजनीतिक विश्वसनीयता से जुड़े सवाल हैं।
2 दिसंबर 2024 को श्री अकाल तख्त साहिब द्वारा सुखबीर सिंह बादल और अन्य अकाली नेताओं को तनखैया घोषित करने तथा बाद में धार्मिक सेवा और अन्य आदेशों ने भी पार्टी के आंतरिक और पंथक माहौल को प्रभावित किया।
इसके अलावा, बहरीन से संबंधित एक महिला द्वारा शिरोमणि कमेटी के सदस्य अमरजीत सिंह चावला के खिलाफ यौन शोषण और अन्य गंभीर आरोप लगाए जाने से नया विवाद खड़ा हुआ। इस मामले में एफआईआर दर्ज होने की खबरें सामने आई हैं। अमरजीत सिंह चावला ने इन आरोपों से इनकार किया है। श्री अकाल तख्त साहिब की ओर से इस मामले में धार्मिक कार्रवाई भी की गई।
इस मामले को सार्वजनिक करने वाली रूप कौर संधू को शिरोमणि अकाली दल ने 29 सितंबर को पार्टी से निष्कासित कर दिया था। उन्होंने दावा किया है कि अन्य महिलाओं ने भी ऐसे मामलों के संबंध में उनसे संपर्क किया है।
इन आरोपों की निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। लेकिन राजनीतिक दृष्टि से ये सभी विवाद बादल दल के लिए नई चुनौती बन रहे हैं। पार्टी को अब केवल चुनावी मैदान में ही नहीं, बल्कि अपनी पंथक विश्वसनीयता दोबारा स्थापित करने के लिए भी प्रयास करने होंगे।
पुनर्जीवित अकाली दल और वापसी की राजनीति
बादल दल से अलग हुए नेताओं की ओर से अकाली राजनीति को पुनर्जीवित और मजबूत करने के प्रयास भी उम्मीद के मुताबिक परिणाम नहीं दे सके हैं। पार्टी के कुछ नेताओं की बादल दल में वापसी की संभावनाओं को लेकर भी चर्चा हो रही है।
प्रोफेसर प्रेम सिंह चंदूमाजरा की वापसी को लेकर भी काफी समय से राजनीतिक अटकलें लगाई जा रही हैं। इसी तरह अन्य नेताओं की भविष्य की रणनीति को लेकर भी स्पष्टता की कमी दिखाई दे रही है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अलग हुए अकाली नेता कोई साझा राजनीतिक मंच तैयार कर पाएंगे या चुनावों से पहले फिर से पुराने संगठन की ओर लौटेंगे?
वारिस पंजाब दे अकाली दल में संगठनात्मक संकट
पंथक राजनीति में नए विकल्प के रूप में उभरने की कोशिश कर रहे अकाली दल वारिस पंजाब दे में भी आंतरिक मतभेद सामने आए हैं।
अक्टूबर के अंतिम दिनों में पार्टी की पांच सदस्यीय प्रिंसिपल ड्राफ्टिंग कमेटी के सदस्यों को निलंबित करने का फैसला विवाद का कारण बना। ये सदस्य पार्टी की 23 जिला इकाइयों के संगठनात्मक ढांचे को भंग करने के फैसले का विरोध कर रहे थे।
कमेटी ने इस कार्रवाई को एकतरफा और गैर-लोकतांत्रिक करार दिया, जबकि पार्टी नेतृत्व ने सदस्यों पर अनुशासनहीनता के आरोप लगाए।
इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया, आंतरिक लोकतंत्र और संगठनात्मक पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े किए हैं। टिकटों की खरीद-फरोख्त संबंधी लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पार्टी को अपनी राजनीतिक पहचान के साथ-साथ संगठनात्मक स्थिरता भी साबित करनी होगी।
भाजपा और अकाली दल बादल के बीच गठबंधन की संभावना
2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संभावनाओं में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल बादल के बीच दोबारा गठबंधन की चर्चा शामिल है।
दोनों पार्टियों का गठबंधन दशकों तक पंजाब की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। 1997 से 2017 तक दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़े और सरकार भी बनाई। लेकिन वर्ष 2020 में केंद्र सरकार के कृषि कानूनों को लेकर किसान आंदोलन के दौरान अकाली दल ने भाजपा से अपना नाता तोड़ लिया था।
अब 2027 के चुनावों से पहले दोबारा गठबंधन की संभावनाएं उभर रही हैं। 29 अक्टूबर को सुखबीर सिंह बादल ने कहा था कि जो पार्टी उनकी पार्टी की विचारधारा और नीतियों को स्वीकार करेगी, उसके साथ गठबंधन पर विचार किया जा सकता है। उन्होंने कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की संभावना को खारिज किया था।
मीडिया रिपोर्टों में भाजपा और बादल दल के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर बातचीत आगे बढ़ने की चर्चा भी है। हालांकि, अभी तक किसी औपचारिक समझौते की घोषणा नहीं हुई है।
इस गठबंधन में सबसे बड़ा सवाल सीटों के बंटवारे का होगा। पहले अकाली दल बड़े साझेदार की भूमिका में रहता था, लेकिन अब भाजपा अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के बाद अधिक सीटों की मांग कर सकती है।
कांग्रेस के लिए अवसर या चुनौती?
कांग्रेस भी पंजाब में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सक्रिय है। पार्टी के भीतर पिछले समय के दौरान रहे मतभेदों के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी में बदलाव के बाद संगठन को दोबारा एकजुट करने की कोशिश की जा रही है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपने नेताओं को एक मंच पर लाना और प्रदेश के लोगों के सामने एक स्पष्ट चुनावी विकल्प पेश करना है। यदि पार्टी आंतरिक गुटबाजी पर नियंत्रण पा लेती है तो मौजूदा राजनीतिक हालात उसके लिए अवसर बन सकते हैं।
असली मुकाबला मुद्दों पर होगा
पंजाब के आगामी विधानसभा चुनावों का फैसला केवल दल-बदल या गठबंधनों से नहीं होगा। प्रदेश के लोगों के सामने कई बुनियादी सवाल हैं—नशों का खात्मा, युवाओं के लिए रोजगार, किसानों का संकट, उद्योगों की स्थिति, प्रदेश पर बढ़ता कर्ज, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं और कानून-व्यवस्था।
इसके अलावा पंजाब की अर्थव्यवस्था, पानी का मुद्दा, सीमा सुरक्षा और प्रदेश के अधिकार भी चुनावों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
आम आदमी पार्टी को अपने पांच साल के कामकाज का हिसाब देना होगा। कांग्रेस को अपने पुराने शासन और मौजूदा नीतियों के बारे में जवाब देना होगा। भाजपा को पंजाब के किसानों, उद्योगों और क्षेत्रीय मुद्दों पर अपनी नीति स्पष्ट करनी होगी। अकाली दल को अपनी पंथक विश्वसनीयता और पिछले शासन से जुड़े सवालों का सामना करना पड़ेगा।
मौजूदा राजनीतिक तस्वीर यह दर्शाती है कि पंजाब में 2027 के चुनावों के लिए मुकाबला बहुकोणीय हो सकता है। आम आदमी पार्टी के पास सत्ता का लाभ है, कांग्रेस के पास विपक्षी दल के रूप में अपनी जगह दोबारा मजबूत करने का अवसर है, भाजपा नए राजनीतिक समीकरण तैयार कर रही है और अकाली दल अपने विभिन्न गुटों को संभालने की चुनौती से जूझ रहा है।
आने वाले महीनों में दल-बदल, उम्मीदवारों के चयन और गठबंधनों को लेकर होने वाले फैसले पंजाब की चुनावी तस्वीर को और स्पष्ट करेंगे।
लेकिन अंतिम फैसला राजनीतिक पार्टियों के कार्यालयों में नहीं, बल्कि पंजाब के मतदाताओं के हाथ में होगा। सवाल यह नहीं है कि कौन-सा नेता किस पार्टी में जाता है; असली सवाल यह है कि कौन-सी पार्टी पंजाब के भविष्य के लिए भरोसेमंद नीति, साफ नीयत और जवाबदेह शासन प्रस्तुत कर सकती है।
2027 के विधानसभा चुनावों में पंजाब का मतदाता किसे मौका देगा, इसका जवाब आने वाला समय ही देगा।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







