पटियाला, 10 अगस्त,2026 (जगदेव सिंह जग्गी): आज पंजाबी साहित्य सभा, पटियाला की ओर से प्रसिद्ध पंजाबी लेखक गुरबाज़ सिंह की पुस्तक ‘हुण ओह गल्लां कित्थे’ का लोकार्पण भाषा विभाग, पंजाब, शेरांवाला गेट, पटियाला के लेक्चर हॉल में किया गया।
समागम के आरंभ में सभा के अध्यक्ष डॉ. दर्शन सिंह आशट ने कहा कि वर्ष 1957 में अस्तित्व में आई पंजाबी साहित्य सभा, पटियाला लगभग एक सदी की अपनी मूल्यवान विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते हुए मातृभाषा के खजाने को अनमोल साहित्यिक रत्नों से समृद्ध कर रही है। देश-विदेश में इस सभा के ऐतिहासिक योगदान की चर्चा होते रहना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है, जिस पर इसके सभी सदस्यों को गर्व है। समागम के मुख्य अतिथि के रूप में चंडीगढ़ से विशेष रूप से पहुंचे पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के पंजाबी अध्ययन स्कूल के प्रोफेसर तथा पंजाब आर्ट्स काउंसिल, चंडीगढ़ के उपाध्यक्ष डॉ. योगराज ने गुरबाज़ सिंह की पुस्तक के संदर्भ में वर्तमान पंजाबी कविता और साहित्य के प्रयोजन तथा आलोचनात्मक पक्षों पर गंभीर चर्चा की। उन्होंने कहा कि लेखक का समाज के प्रति रचनात्मक और सकारात्मक दृष्टिकोण होना चाहिए।

समागम की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध साहित्यिक पत्रकार एवं प्रोफेसर ऑफ जर्नलिज्म डॉ. हरजिंदर पाल सिंह वालिया ने पुस्तक पर गहन चर्चा करते हुए कहा कि आज के भौतिकवादी युग और धन कमाने की लालसा ने खून के रिश्तों को तार-तार कर दिया है। आज का मनुष्य अपनी समृद्ध पिछली विरासत और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए तरस रहा है।
विशेष अतिथि के रूप में पूर्व निदेशक, भाषा विभाग, पंजाब डॉ. मदन लाल हसीजा ने कहा कि गुरबाज़ सिंह की यह पुस्तक पंजाब, पंजाबी और पंजाबीपन की साझा परंपरा एवं विरासत को लेकर समाज के सामने गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
प्रसिद्ध कहानीकार मुख्तियार सिंह (खन्ना) का मत था कि साहित्य और समाज एक-दूसरे के पूरक हैं, जबकि शुभ करमन फाउंडेशन, पटियाला की अध्यक्ष एवं शिक्षिका गुरप्रीत कौर ने कहा कि ऐसे सार्थक आयोजन नई पीढ़ी के मन में मातृभाषा और साहित्यिक रुचियों के प्रति चेतना पैदा करते हैं।
इस अवसर पर लेखक गुरबाज़ सिंह ने अपनी पुस्तक की रचना-प्रक्रिया पर प्रकाश डाला और इसके लिखे जाने के कारणों के बारे में रोचक ढंग से चर्चा की।
पुस्तक पर चर्चा में महासचिव दविंदर पटियालवी के अलावा वरिष्ठ लेखक डॉ. जी.एस. आनंद, बलबीर सिंह दिलदार, नवदीप सिंह मुंडी, समरजीत सिंह मान (सिरसा) और गुरप्रीत सिंह सिद्धू (सिरसा) ने भी भाग लिया।
समागम के दूसरे भाग में संगरूर से विशेष रूप से पहुंचे प्रसिद्ध शायरों करम सिंह ज़ख्मी, राजिंदर सिंह राजन, बहादुर सिंह धौला और सुरजीत सिंह मौजी के अलावा खुशवीर सिंह तूर, डॉ. अशोक कुमार खुराना, जरनैल सिंह, जोगा सिंह धनौला, मनसीरत कौर, सागर सूद संजय, वरिंदर सिंह, हरदीप सभरवाल, त्रिलोक सिंह ढिल्लों, नायब सिंह बदेशा, एडवोकेट गुरदर्शन सिंह गुसील, अमर गर्ग कलमदान (धूरी), गुरप्रीत सिंह, जसपाल, त्रिलोक ढिल्लों, सुरिंदर कौर बाड़ा, सतीश विद्रोही, बचन सिंह गुरम, गुरदीप महौण, परमजीत सभरवाल, कृपाल सिंह मूनक, विजय कुमार, पवन कुमार होशी, गुरप्रीत सिंह ढिल्लों, राजेश्वर कुमार, हरविंदर सिंह, जगसीर सिंह कलाला आदि ने भी अपनी विभिन्न प्रकार की रचनाएं साझा कीं, जिन पर चर्चा भी होती रही।
इस समागम में प्रसिद्ध कवियों एवं विद्वानों में प्रो. जे.के. मिगलानी, डॉ. हरनेक सिंह ढोट, पूर्व डी.डी.पी.ओ. सुखपाल सिंह, कुलविंदर सिंह मानूपुरी, गुरमुख सिंह जागी, जसबीर सिंह, कुलदीप पटियालवी, एस.एन. चौधरी, जग्गा रंगूवाल, राजेश कोटिया, मुकेश और ओम भी शामिल हुए।






