पंजाब की धरती ने कभी अपने बेटों को रोजगार की तलाश में विदेश भेजने को सिर्फ पारिवारिक फैसला नहीं माना था। यह धीरे-धीरे एक सामाजिक प्रवृत्ति बन गया और अब कई गांवों की तस्वीर ही बदल चुकी है। जहां कभी सुबह खेतों की ओर जाते युवाओं की चहल-पहल होती थी, वहीं आज कई घरों के दरवाजे बंद हैं और बुजुर्ग माता-पिता अपने बच्चों के इंतजार में जिंदगी बिता रहे हैं।
कनाडा, इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य पश्चिमी देशों की ओर पंजाबी युवाओं का रुख आज आम हो गया है। भारत से कनाडा जाने वाले लोगों की संख्या पिछले दशक में बहुत तेजी से बढ़ी। 2013 में कनाडा जाने वाले भारतीय नागरिकों की संख्या लगभग 32,828 थी, जो 2023 में बढ़कर करीब 1,39,715 हो गई।
सवाल यह है—क्या पंजाब के युवा सिर्फ विदेशों के आकर्षण के कारण जा रहे हैं या पंजाब की आंतरिक विफलताएं उन्हें बाहर जाने के लिए मजबूर कर रही हैं?
रोजगार की कमी, नौकरियों में अस्थिरता, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी, कम वेतन, कृषि संकट, बढ़ती पारिवारिक अपेक्षाएं और विदेशी जीवन की बनाई गई चमक—ये सभी कारण मिलकर युवा मन को प्रभावित करते हैं। पंजाब में विदेश जाना कई जगहों पर सफलता का प्रतीक भी बन गया है। इस कारण कई परिवार अपनी जमीन बेचने, कर्ज लेने या जीवन भर की बचत खर्च करने तक के लिए तैयार हो जाते हैं।
लेकिन प्रवास का दूसरा पहलू भी है। कई युवाओं को विदेश पहुंचने के बाद वैसी जिंदगी नहीं मिलती, जिसकी उन्होंने उम्मीद की थी। हाल ही में मीडिया के माध्यम से पंजाब के 36 युवाओं के एक समूह के विदेश में रोजगार दिलाने के नाम पर फंसने की घटना सामने आई, जहां परिवारों ने लाखों रुपये खर्च किए थे।
कनाडा ने भी विदेशी छात्रों की संख्या कम करने के लिए अपनी नीतियां सख्त की हैं। 2025 में वहां कुल छात्र परमिटों की योजनाबद्ध संख्या 4,37,000 रखी गई, जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 प्रतिशत कम थी। इससे स्पष्ट है कि विदेशी धरती भी अब असीमित अवसरों की गारंटी नहीं है।
सबसे अधिक चिंताजनक प्रभाव पंजाब में पीछे रह गए माता-पिता पर पड़ता है। एक अध्ययन में पंजाब के एक गांव के 30 प्रवासी बच्चों के माता-पिता के साथ गहन बातचीत करके यह समझने का प्रयास किया गया कि बच्चों के दूर चले जाने से उनकी जिंदगी किस तरह बदलती है। ऐसे परिवारों में अकेलापन, भावनात्मक दूरी और रोजमर्रा के जीवन में सहारे की कमी महत्वपूर्ण मुद्दों के रूप में सामने आते हैं।
यह सिर्फ पारिवारिक समस्या नहीं है। यदि गांवों से लगातार युवा बाहर जाते रहे तो कृषि, छोटे कारोबार, सामाजिक संस्थाओं और गांवों की सामूहिक जीवन-व्यवस्था पर भी असर पड़ेगा। बुजुर्ग रह जाएंगे, लेकिन अगली पीढ़ी की भागीदारी लगातार कम होती जाएगी। जमीन की देखभाल के लिए मजदूरों पर निर्भरता बढ़ेगी और कई परिवारों में पीढ़ियों के बीच भावनात्मक दूरी और गहरी हो जाएगी।
क्या पंजाब, पंजाबी संस्कृति, पंजाबी विरासत, भाषा और परिवार व्यवस्था को कमजोर करने के लिए सिर्फ प्रशासन की विफल नीतियां जिम्मेदार हैं? क्या पंजाब में गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी इसका मुख्य कारण है? क्या शिक्षा व्यवस्था युवाओं को स्थानीय अवसरों से जोड़ने में विफल रही है? या फिर यह किसी ऐसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा है, जिसमें पंजाब की युवा शक्ति को धीरे-धीरे बाहर खींचा जा रहा है?
साजिश का आरोप लगाने से पहले सबूत जरूरी हैं। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि अगर युवाओं को अपने ही राज्य में सम्मानजनक रोजगार, उद्योग, शिक्षा, खेल और उद्यमिता के अवसर मिलें तो क्या वे अपना घर-गांव छोड़ने के लिए इतने उत्सुक होंगे?
पंजाब को युवाओं को विदेश जाने से रोकने के अभियान की नहीं, बल्कि उन्हें पंजाब में रहने के लिए मजबूत कारण देने के अभियान की जरूरत है।
क्योंकि विदेश गया एक युवा सिर्फ एक व्यक्ति नहीं जाता—उसके साथ एक घर की रौनक, एक मां की आस, एक पिता का सहारा और कई बार पूरे गांव की भविष्य की ताकत भी दूर चली जाती है।
असल तरक्की वह नहीं है जहां पंजाब के घरों में विदेशों से पैसा आए; असल तरक्की तब होगी जब पंजाब के युवाओं को अपना भविष्य बनाने के लिए पंजाब छोड़ना मजबूरी नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी इच्छा का विकल्प हो।
छत्रपाल सिंह






