मूनक, 14 सितंबर, 2026 (छत्रपाल सिंह): पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर द्वारा मूनक तहसील के गांव हमीरगढ़ और भाठूआं में धान की पराली के उचित प्रबंधन संबंधी आयोजित पांच दिवसीय प्रशिक्षण पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुए। इन प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में किसानों को धान की पराली को आग लगाने के बजाय खेत में ही उसका प्रबंधन करने के लाभों तथा इस संबंध में कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर द्वारा उपलब्ध करवाई जा रही तकनीकी जानकारी और कृषि मशीनरी के बारे में जानकारी दी गई।
डॉ. मनदीप सिंह, प्रभारी, पीएयू-कृषि विज्ञान केंद्र, संगरूर ने खेत में ही धान की पराली के प्रबंधन के फायदों के बारे में बताते हुए कहा कि इससे मिट्टी में जैविक कार्बन और पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ती है, मिट्टी के भौतिक स्वास्थ्य में सुधार होता है तथा पर्यावरण प्रदूषण को कम करने में मदद मिलती है। उन्होंने किसानों को केवीके द्वारा पराली को खेत में ही संभालने के लिए उपलब्ध करवाई जा रही कृषि मशीनरी और तकनीकी जानकारी का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया।
इसके अलावा उन्होंने किसानों को पराली जलाने से पैदा होने वाली हानिकारक गैसों और धुएं से पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में भी जागरूक किया। उन्होंने किसानों को रबी की फसलों की कुशल योजना के बारे में भी जानकारी दी। उन्होंने गेहूं की नई किस्म पीबीडब्ल्यू 887 तथा राया सरसों की नई किस्मों पंजाब राया कैनोला सरसों-7 और पीबीआर-813 के बारे में भी जानकारी दी।
डॉ. सुनील कुमार, सहायक प्रोफेसर (फार्म पावर मशीनरी) ने धान की पराली के खेत में ही प्रबंधन के लिए इस्तेमाल की जाने वाली कृषि मशीनरी, जैसे हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, सरफेस सीडर, स्मार्ट सीडर, पैडी स्ट्रॉ चॉपर-कम-श्रेडर और मल्चिंग मशीनरी के उचित इस्तेमाल तथा खेत की तैयारी संबंधी जानकारी साझा की। उन्होंने किसानों को मशीनरी का उचित उपयोग करके पराली प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाने के लिए प्रेरित किया और किसानों के मन में इस तकनीक को लेकर मौजूद सभी शंकाओं और आशंकाओं को दूर किया।
डॉ. रुकिंदरप्रीत सिंह धालीवाल, सहायक प्रोफेसर (फसल विज्ञान) ने पराली के खेत में प्रबंधन के बाद गेहूं की बुवाई के समय अपनाई जाने वाली उन्नत कृषि तकनीकों, खरपतवार नियंत्रण और उर्वरकों के इस्तेमाल संबंधी विस्तारपूर्वक जानकारी दी। इसके अलावा उन्होंने धान में आने वाली समस्याओं जैसे बौना रोग, भूरा पीठ वाला फुदका, हल्दी रोग और झंडा रोग की पहचान तथा रोकथाम के बारे में किसानों को जागरूक किया। उन्होंने धान में पोटाशियम नाइट्रेट के छिड़काव के महत्व और इसकी सिफारिशों के अनुसार उपयोग संबंधी जानकारी भी साझा की।

डॉ. रविंदर कौर, एसोसिएट प्रोफेसर (बागवानी) ने पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा सिफारिश की गई मटर, प्याज, गाजर, खरबूजा और तरबूज की किस्मों के बारे में जानकारी साझा की। उन्होंने बागवानी फसलों में धान की पराली को मल्च के रूप में इस्तेमाल करने के तरीकों और इसके फायदों के बारे में भी बताया। उन्होंने कहा कि पराली के उचित इस्तेमाल से बागों में खरपतवार नियंत्रण, मिट्टी में नमी का संरक्षण और अच्छी गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन किया जा सकता है।
श्रीमती अमरप्रीत कौर, लैब टेक्नीशियन (मिट्टी एवं पानी परीक्षण प्रयोगशाला) ने किसानों को मिट्टी और पानी की जांच के महत्व, मिट्टी और पानी के नमूने सही तरीके से लेने तथा जांच के लिए प्रयोगशाला में जमा करवाने के बारे में जानकारी दी।
इस अवसर पर कृषि एवं किसान कल्याण विभाग, संगरूर द्वारा चलाई जा रही विभिन्न किसान कल्याण योजनाओं के बारे में भी जानकारी दी गई। किसानों को सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए आवश्यक पात्रता, आवेदन प्रक्रिया और उपलब्ध सहायता के बारे में अवगत करवाया गया तथा संबंधित विभाग से संपर्क करके इन योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया गया।
प्रशिक्षणार्थियों को कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से फसल अवशेष प्रबंधन संबंधी साहित्य और सब्जियों के बीजों की किटें भी वितरित की गईं। दोनों गांवों के किसानों ने धान की पराली को खेत में ही प्रबंधित करने का संकल्प लिया।






