लुधियाना, 16 सितंबर 2026, (चौधरी प्रभजीत सिंह): जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में पंजाब और हरियाणा के उन
किसानों को सम्मानित किया गया, जो प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण पर आधारित कृषि पद्धतियों को अपना रहे हैं। यह कार्यक्रम “अपने किसानों का सम्मान” विषय के अंतर्गत आयोजित किया गया। इस अवसर पर कार्बन क्रेडिट को एक उभरते हुए आर्थिक लाभ के रूप में रेखांकित किया गया। यह लाभ उन कृषि पद्धतियों को अपनाने से प्राप्त होता है जो मिट्टी एवं जल संसाधनों का संरक्षण करते हुए हानिकारक गैसों के उत्सर्जन को कम करती हैं। किसानों का सम्मान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट, उप महानिदेशक डॉ. राजबीर सिंह तथा ग्रोइंडिगो की कार्यकारी निदेशक डॉ. ऊषा बरवाले ज़ेहर की उपस्थिति में किया गया। कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिकारी, वैज्ञानिक, कृषि प्रसार कर्मी, कृषि संस्थानों के प्रतिनिधि तथा किसान समुदाय बड़ी संख्या में उपस्थित थे। इसका उद्देश्य कृषि विज्ञान, जलवायु संरक्षण प्रयासों और नए आर्थिक अवसरों के बढ़ते समन्वय को रेखांकित करना था। डॉ. एम. एल. जाट ने आगामी महीनों में धान की पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए पंजाब के कृषि विज्ञान केंद्रों के अधिकारियों के साथ कार्ययोजना पर भी चर्चा की। गुरु अंगद देव वेटरनरी एंड एनिमल साइंसेज यूनिवर्सिटी के उप-कुलपति डॉ. जतिंदर पाल सिंह गिल ने पर्यावरण-अनुकूल कृषि पद्धतियों को अपनाने की वकालत की। यह पहल उत्तर-पश्चिम भारत में चल रहे उस परिवर्तन पर आधारित है जिसके अंतर्गत फसल अवशेषों को जलाने के बजाय खेतों में ही उनका प्रबंधन, धान की सीधी बुवाई, न्यूनतम जुताई, फसल विविधीकरण तथा मिट्टी के स्वास्थ्य की बहाली को प्रोत्साहित किया जा रहा है। संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ ये उपाय ऐसे पर्यावरणीय लाभ उत्पन्न कर सकते हैं जिन्हें वैज्ञानिक रूप से मापकर और सत्यापित करके कार्बन क्रेडिट में परिवर्तित किया जा सकता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के तकनीकी मार्गदर्शन में वर्ष 2019 में ग्रोइंडिगो द्वारा शुरू किए गए इस कार्बन क्रेडिट कार्यक्रम ने इन कृषि पद्धतियों को वित्तीय लाभों से जोड़ने का एक व्यावहारिक मार्ग प्रदान किया है। यह पहल पंजाब के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ आईसीएआर, कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों, राज्य विभागों और किसान समुदायों के समन्वित प्रयासों ने खेतों में आग लगने की घटनाओं को उल्लेखनीय रूप से कम करने में योगदान दिया है। वर्ष 2020 में जहाँ ऐसी घटनाएँ 83,000 से अधिक थीं, वहीं वर्ष 2025 में इनकी संख्या घटकर 5,000 से भी कम रह गई। यह अनुभव तकनीक अपनाने, बेहतर फसल अवशेष प्रबंधन, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार, जल संरक्षण और जलवायु अनुकूलन क्षमता को एकीकृत करने वाली समग्र रणनीति की संभावनाओं को दर्शाता है। अटारी, लुधियाना तथा ग्रोइंडिगो के बीच हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन (एमओयू) इस क्षेत्र में संस्थागत सहयोग को और अधिक मजबूत करेगा। यह पहल कृषि विज्ञान तथा पुनर्योजी (रेजेनेरेटिव) कृषि के क्षेत्र में भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय भागीदारी के अनुरूप भी है। सितंबर 2026 में अपनाए गए ब्रिक्स (BRICS) नई दिल्ली घोषणा-पत्र ने जलवायु अनुकूलन क्षमता और उत्पादकता बढ़ाने के लिए कृषि पारिस्थितिकी तथा पुनर्योजी कृषि के अनुभवों को साझा करने हेतु एक व्यापक मंच प्रदान किया है। लुधियाना में आयोजित यह कार्यक्रम इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है कि कृषि क्षेत्र में जलवायु संबंधी प्रयासों को किसानों के लिए ठोस आर्थिक अवसरों के साथ किस प्रकार जोड़ा जा सकता है।






