पंजाब के कृषि इतिहास में 17 सितंबर 2026 को एक ऐसा अध्याय जुड़ा है, जिसका असर आने वाले वर्षों में खेतों की संरचना से लेकर किसान की आय तक दिखाई देगा। पहली बार पंजाब और हरियाणा के 2,550 छोटे किसानों को मिट्टी में कार्बन बढ़ाने और खेती से ग्रीनहाउस गैसों को घटाने वाले तरीकों के लिए ₹2.9 करोड़ से अधिक का सीधा भुगतान किया गया है। यह भुगतान पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी, लुधियाना में आयोजित कार्यक्रम के दौरान डीबीटी (प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण) के माध्यम से किया गया।
यह केवल किसान को मिलने वाली एक और राशि नहीं है। यह इस बात का संकेत है कि आने वाले समय में खेती का मूल्य केवल गेहूं, धान या अन्य फसलों के उत्पादन से ही नहीं, बल्कि मिट्टी के स्वास्थ्य, पानी की बचत और कार्बन को संचित (स्टोर) करने की क्षमता से भी मापा जा सकता है।
सरल भाषा में समझें तो यदि कोई कृषि पद्धति वातावरण में जाने वाली ग्रीनहाउस गैसों को कम करती है या मिट्टी में कार्बन संचय को बढ़ाती है, तो उस पर्यावरणीय लाभ को मापकर कार्बन क्रेडिट बनाए जा सकते हैं। लेकिन क्रेडिट केवल दावा करने से नहीं बनते, बल्कि कमी या कार्बन संचय की विधि, निगरानी और स्वतंत्र सत्यापन जरूरी होता है। वर्तमान पंजाब-हरियाणा कार्यक्रम में भी कार्बन और ग्रीनहाउस गैसों से जुड़े परिणामों को मापने और स्वतंत्र रूप से सत्यापित करने के बाद क्रेडिट जारी किए गए।
‘आदी’ किसान कार्बन कार्यक्रम के तहत किसानों ने 2019 से 2022 के दौरान डायरेक्ट सीडेड राइस (डीएसआर), कम जुताई (मिनिमम टिल्लेज) और फसल अवशेषों (पराली) के बेहतर प्रबंधन जैसी तकनीकें अपनाईं। ये तरीके पानी का उपयोग घटाने, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार करने और खेती से जुड़ी कुछ ग्रीनहाउस गैसों को कम करने में मदद करते हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार, डीएसआर तकनीक से प्रति हेक्टेयर 14 लाख लीटर तक पानी की बचत हो सकती है। यह आंकड़ा हर खेत और स्थिति के लिए एक जैसा नहीं माना जा सकता, लेकिन पंजाब जैसे जल-संकट वाले राज्य में इस तकनीक का महत्व जरूर समझ आता है।
वास्तव में किसान अपनी मिट्टी नहीं बेच रहा है। वह अपनी कृषि प्रणाली में ऐसे बदलाव कर रहा है, जिनसे पर्यावरणीय लाभ पैदा होता है और उस लाभ का बाजार मूल्य बन सकता है। इस अंतर को समझना बेहद जरूरी है।
कार्बन क्रेडिट किसान के लिए अतिरिक्त आय बन सकता है, लेकिन यह फसल की आय का विकल्प नहीं है। वर्तमान कार्यक्रम में भुगतानों की राशि किसान और प्रोजेक्ट के अनुसार भिन्न हो सकती है। कुछ रिपोर्टों में पहला भुगतान लगभग ₹3,000 से ₹15,000 प्रति किसान के बीच बताया गया है।
इसलिए कार्बन क्रेडिट को ‘किसान को अमीर बनाने की गारंटी’ के रूप में पेश करना भी ठीक नहीं होगा। यह एक उभरता हुआ अतिरिक्त आय मॉडल है, जिसकी वास्तविक सफलता क्रेडिट की कीमत, प्रोजेक्ट की लागत, सत्यापन की विश्वसनीयता और किसान को मिलने वाले वास्तविक हिस्से पर निर्भर करेगी।
पंजाब के लिए सबसे बड़ा लाभ पैसा नहीं—पानी और मिट्टी है:
पंजाब की खेती का सबसे बड़ा संकट केवल किसान की आय नहीं है। भूजल का गिरता स्तर, मिट्टी के स्वास्थ्य में गिरावट, धान-गेहूं के चक्र पर अत्यधिक निर्भरता और पराली प्रबंधन जैसी समस्याएं भी उतनी ही गंभीर हैं।
यदि कार्बन क्रेडिट किसान को डीएसआर, कम जुताई, फसल अवशेषों के सही प्रबंधन और मिट्टी के स्वास्थ्य को सुधारने वाली पद्धतियों की ओर ले जाने में आर्थिक प्रोत्साहन दे, तो इसका पर्यावरणीय लाभ कार्बन क्रेडिट से कहीं बड़ा हो सकता है।
वास्तव में कितना कार्बन मिट्टी में गया? कितनी गैसें कम हुईं? इसे कैसे मापा गया? डेटा किसके पास है? क्रेडिट किस कीमत पर बेचा गया? बिचौलियों या प्रोजेक्ट कंपनियों का हिस्सा कितना है? किसान को कितना मिला? यदि किसान कुछ वर्षों बाद अपनी खेती की पद्धति बदल दे तो क्या होगा?
ये सभी सवाल सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होने चाहिए। विशेष रूप से छोटे किसानों के लिए एक पारदर्शी समझौता, सरल भाषा में जानकारी और भुगतान की पूरी जानकारी बेहद जरूरी है।
वर्तमान ‘आदी’ कार्यक्रम केवल 2,550 किसानों तक सीमित नहीं है। रिपोर्टों के अनुसार इसका बड़ा नेटवर्क सात राज्यों में 1 लाख से अधिक किसानों और 20 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र तक फैला हुआ है और इसमें वेरा VM0042 कार्यप्रणाली के तहत एग्रीकल्चरल कार्बन क्रेडिट जारी किए गए हैं।
इसका अर्थ है कि भारतीय कृषि धीरे-धीरे एक ऐसे मॉडल की ओर बढ़ रही है जिसमें किसान केवल अनाज का उत्पादक नहीं रहेगा। वह पानी बचाने वाला, मिट्टी सुधारने वाला और कार्बन संचित करने वाला ‘पर्यावरणीय सेवा प्रदाता’ भी बन सकता है।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि कार्बन बाजार किसान की जानकारी की कमी का फायदा न उठाए। किसान को पता होना चाहिए कि वह किसके साथ समझौता कर रहा है, कितने वर्षों के लिए कर रहा है, उसके डेटा का स्वामित्व किसके पास रहेगा और कार्बन क्रेडिट बेचने से होने वाली आय में उसका हिस्सा कितना है।
भारत की कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग स्कीम (CCTS) पहले ही एक व्यापक कार्बन-क्रेडिट फ्रेमवर्क तैयार कर चुकी है, जिसका उद्देश्य उत्सर्जन को कम करने या टालने के लिए कार्बन-क्रेडिट सर्टिफिकेट ट्रेडिंग की व्यवस्था बनाना है।
इसलिए कृषि को इस नए बाजार में लाते समय “किसान पहले, कार्बन बाद में” वाली सोच बेहद जरूरी है।
पंजाब ने हरित क्रांति के माध्यम से देश का अन्न भंडार भरने में बड़ी भूमिका निभाई। अब समय एक और बदलाव का है—ऐसी खेती का, जो अनाज के साथ-साथ मिट्टी, पानी और पर्यावरण को भी बचाए।
कार्बन क्रेडिट इस बदलाव का एक साधन बन सकता है, लेकिन समाधान अपने आप में नहीं है। यदि इसमें वैज्ञानिक माप, पारदर्शी बाजार, किसान की सहमति और उचित भुगतान शामिल होता है, तो यह पंजाब की खेती के लिए एक नया आर्थिक द्वार खोलेगा।
आज तक किसान अपनी जमीन से फसल निकालता था।
कल वह उसी जमीन से फसल के साथ-साथ पानी की बचत, मिट्टी के स्वास्थ्य और कार्बन संचय का आर्थिक मूल्य भी कमा सकता है।
यह पंजाब की खेती के लिए केवल नया बाजार नहीं है—यदि सही ढंग से लागू किया गया, तो यह “उत्पादन-केंद्रित खेती” से “संसाधन-संरक्षण और पर्यावरणीय मूल्य वाली खेती” की ओर एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित होगा।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







