आज शहर तेज़ी से फैल रहे हैं। ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें, नई कॉलोनियां, रोज़गार के नए अवसर और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं शहरीकरण की तस्वीर का एक चमकता हुआ पक्ष हैं। लेकिन इस विकास के दूसरे पहलू में एक ऐसा सवाल खड़ा हो रहा है, जिसे हम अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। जब युवा पीढ़ी काम और रोज़गार की तलाश में शहरों या विदेशों की ओर चली जाती है, तो पीछे रह गए बुज़ुर्गों की देखभाल कौन करेगा?
यह सिर्फ़ पारिवारिक मुद्दा नहीं रह गया है। यह अब स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, शहरी नियोजन, आवास, परिवहन, अर्थव्यवस्था और मानवीय गरिमा से जुड़ा एक बड़ा सामाजिक मुद्दा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया में 60 वर्ष या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 2020 में लगभग 1 अरब थी और 2050 तक इसके 2.1 अरब तक पहुंचने की उम्मीद है। इसी समय, 2050 तक दुनिया की लगभग 68 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों में रह सकती है। यानी बुज़ुर्गों की बढ़ती संख्या और शहरीकरण—दोनों बदलाव एक साथ हो रहे हैं।
भारत को अभी भी युवा देश कहा जाता है, लेकिन बुज़ुर्ग आबादी तेज़ी से बढ़ रही है। यूएनएफपीए के 2023 के आंकड़ों के अनुसार, 2050 तक भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की संख्या कुल आबादी का लगभग 20 प्रतिशत से अधिक हो सकती है। 80 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी भी तेज़ी से बढ़ रही है और इस आयु वर्ग में विधवा महिलाओं तथा अधिक निर्भर बुज़ुर्गों की संख्या एक महत्वपूर्ण चुनौती बन रही है।
इस बदलाव का मतलब सिर्फ़ यह नहीं है कि बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ेगी। इसका मतलब यह भी है कि देखभाल की आवश्यकता वाले लोगों की संख्या बढ़ेगी।
भारतीय समाज में बुज़ुर्गों की देखभाल की ज़िम्मेदारी पारंपरिक रूप से परिवार निभाता रहा है। दादा-दादी, नाना-नानी, माता-पिता और बच्चे एक ही घर या आसपास रहते थे। लेकिन शहरीकरण, पलायन, रोज़गार की बदलती प्रकृति, महंगा आवास और छोटे परिवारों ने इस व्यवस्था को बदल दिया है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के भारत संबंधी आंकड़े भी बताते हैं कि बुज़ुर्गों में बच्चों के साथ रहने का चलन अभी भी बड़ा है, लेकिन केवल जीवनसाथी के साथ रहने वाले बुज़ुर्गों की हिस्सेदारी बढ़ी है। यह संकेत है कि बुज़ुर्गों के रहने की व्यवस्था बदल रही है।
यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—एक ही घर में रहना और बुज़ुर्ग की वास्तविक देखभाल करना एक ही बात नहीं है।
बुज़ुर्गों की सबसे बड़ी समस्या हमेशा दवा या अस्पताल नहीं होती। कई बार सबसे बड़ी ज़रूरत होती है—किसी का उनकी बात सुनना।
बच्चे सुबह नौकरी के लिए निकलते हैं और शाम को थककर लौटते हैं। पोते-पोतियां मोबाइल और डिजिटल दुनिया में व्यस्त रहते हैं। ऐसे में कई बुज़ुर्ग पूरा दिन घर में अकेले रह जाते हैं।
इस अकेलेपन से उदासी, चिंता, सामाजिक अलगाव और जीवन की गुणवत्ता में कमी आ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन मानता है कि बुज़ुर्गों के स्वास्थ्य पर उनका घर, पड़ोस, परिवहन और सामाजिक वातावरण महत्वपूर्ण प्रभाव डालते हैं।
बुज़ुर्ग महिलाओं की जरूरतों को अलग से देखने की आवश्यकता है। बढ़ती उम्र में विधवापन, आय की कमी, संपत्ति पर निर्भरता, स्वास्थ्य समस्याएं और सामाजिक अकेलापन उनकी संवेदनशीलता बढ़ा देते हैं। यूएनएफपीए ने भी बहुत अधिक उम्र की विधवा और निर्भर महिलाओं को विशेष ध्यान की आवश्यकता वाले वर्ग के रूप में रेखांकित किया है।
इसलिए बुज़ुर्गों की नीति में लैंगिक पहलू को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
भारतीय परिवारों में बुज़ुर्गों की देखभाल का बड़ा हिस्सा अक्सर घर की महिलाओं—बहुओं, बेटियों या पत्नियों—पर आ जाता है। यदि वे स्वयं नौकरी कर रही हों तो उन पर दोहरा बोझ पड़ता है—रोज़गार भी और बुज़ुर्गों की देखभाल भी।
इसलिए भविष्य की बुज़ुर्ग-देखभाल नीति सिर्फ़ “बुज़ुर्गों के लिए सेवा” तक सीमित नहीं होनी चाहिए; इसमें देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों को भी सहायता मिलनी चाहिए।
एक बुज़ुर्ग के लिए शहर का अर्थ केवल अस्पताल का पास होना नहीं है, बल्कि यह भी है—
- क्या फुटपाथ पर आसानी से चला जा सकता है?
- क्या सड़क पार करने के लिए पर्याप्त समय मिलता है?
- क्या बस में चढ़ना आसान है?
- क्या हर इमारत में लिफ्ट है?
- क्या पार्क में बैठने के लिए बेंच है?
- क्या सरकारी कार्यालय बुज़ुर्गों के लिए सुगम हैं?
विश्व स्वास्थ्य संगठन के उम्र-अनुकूल शहरों के मॉडल में सुरक्षित परिवहन, बाधा-मुक्त इमारतें, बैठने की जगहें, सार्वजनिक सुविधाएं, सामाजिक जुड़ाव और अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों तक पहुंच को महत्व दिया गया है।
शहरीकरण के साथ बुज़ुर्गों के लिए कई नई आवासीय सेवाएं—डे-केयर, असिस्टेड लिविंग, नर्सिंग केयर और रेज़िडेंशियल केयर—विकसित हो सकती हैं। लेकिन हर बुज़ुर्ग को परिवार से अलग करके किसी संस्था में भेज देना समाधान नहीं है।
यूएनएफपीए ने “इन-सीटू एजिंग” यानी जहां संभव हो, अपने घर और समुदाय में रहकर बुढ़ापा बिताने की सोच को महत्व दिया है। इसके साथ दिन के समय देखभाल और थोड़े समय के लिए देखभाल जैसी सुविधाएं परिवारों का बोझ कम कर सकती हैं।
वास्तविक मॉडल होना चाहिए—घर + परिवार + समुदाय + स्वास्थ्य प्रणाली + आवश्यकता के अनुसार पेशेवर देखभाल।
बुज़ुर्गों की स्वतंत्रता के लिए आय की सुरक्षा बहुत महत्वपूर्ण है। यदि किसी व्यक्ति के पास अपनी दवा, परिवहन या निजी जरूरतों के लिए अपना पैसा नहीं है, तो वह परिवार पर बहुत अधिक निर्भर हो जाता है।
यूएनएफपीए की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 40 प्रतिशत से अधिक बुज़ुर्ग सबसे गरीब आर्थिक वर्ग में आते हैं और लगभग 18.7 प्रतिशत के पास कोई आय नहीं थी। इसलिए पेंशन, सामाजिक सुरक्षा, सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं और दवाओं तक पहुंच बुज़ुर्गों की गरिमा और आत्मनिर्भरता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
बुढ़ापा केवल उम्र का बढ़ना नहीं है। इसके साथ मधुमेह, ब्लड प्रेशर, हृदय रोग, दृष्टि संबंधी कमजोरी, सुनने की समस्या, हड्डियों की कमजोरी, याददाश्त और चलने-फिरने की समस्याएं बढ़ सकती हैं।
इसलिए बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य प्रणाली में केवल बीमारी का इलाज ही नहीं, बल्कि नियमित जांच, पुनर्वास, मानसिक स्वास्थ्य, घर-आधारित देखभाल और दीर्घकालिक देखभाल भी शामिल होनी चाहिए। भारत में बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य देखभाल का राष्ट्रीय कार्यक्रम और आयुष्मान भारत के स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्र जैसे ढांचे इस दिशा में पहले से मौजूद हैं।
सरकार की ज़िम्मेदारी, लेकिन केवल सरकार की नहीं
भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल एवं कल्याण अधिनियम, 2007 सहित बुज़ुर्गों के लिए कानूनी और नीतिगत ढांचे मौजूद हैं। लेकिन कानून बन जाने से समस्या समाप्त नहीं होती।
ज़रूरत है कि शहरी स्थानीय संस्थाएं:
- बुज़ुर्गों के लिए सुरक्षित फुटपाथ और परिवहन की व्यवस्था करें,
- हर वार्ड में मिलने-जुलने की जगहें विकसित करें,
- घर-आधारित स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करें,
- अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों की पहचान और नियमित संपर्क की व्यवस्था बनाएं,
- डिजिटल सेवाओं के इस्तेमाल के लिए बुज़ुर्गों को प्रशिक्षण दें,
- और बुज़ुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, धोखाधड़ी तथा आर्थिक शोषण से सुरक्षा सुनिश्चित करें।
शहरीकरण को रोकना संभव नहीं है। सवाल यह है कि क्या हम ऐसे शहर बना सकते हैं, जहां आधुनिकता और बुज़ुर्गों की देखभाल तथा सम्मान साथ-साथ चलें?
बुज़ुर्गों को “परिवार की ज़िम्मेदारी” कहकर सरकार को पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता और सरकार को सारी ज़िम्मेदारी देकर परिवार भी अपना फर्ज़ नहीं भूल सकता। बुज़ुर्गों की देखभाल एक साझा सामाजिक ज़िम्मेदारी है।
आज आवश्यकता है कि हम बुज़ुर्गों को केवल देखभाल पाने वाले लोगों के रूप में न देखें। उनके पास अनुभव, ज्ञान, पारिवारिक यादें, सामाजिक समझ और अगली पीढ़ी को देने के लिए अनमोल पूंजी है।
शहर की ऊंचाई उसकी इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि वहां बुज़ुर्ग कितनी सुरक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मान के साथ जीवन जी सकते हैं।
सरकार भी बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं सुनिश्चित करना चाहती है और बुज़ुर्गों की सेवा न करने वालों तथा उन्हें घर से निकालने वालों के खिलाफ कानून में सख्ती लाने की आवश्यकता है।
तेज़ी से बदलते शहरों में सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ यह नहीं है कि हमने कितना विकास किया है। असली मुद्दा यह है कि इस विकास में हमारे बुज़ुर्ग कहां खड़े हैं?
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







