मानवीय जीवन की सबसे अजीब त्रासदियों में से एक यह है कि जब ज्ञान और अज्ञान आमने-सामने खड़े होते हैं, तो कई बार बहस अज्ञान जीत जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि अज्ञान ज्ञान से अधिक शक्तिशाली है; असल बात यह है कि दोनों के खेलने के नियम अलग-अलग हैं।
ज्ञान बंधा हुआ है। समाज प्रमाण मांगता है, तर्क मांगता है, तथ्यों की जांच करता है और अंत में बहुत जद्दोजहद और प्रयासों के बाद अपनी बात को सही साबित करता है। अज्ञान को इनमें से किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती। वह अपनी धारणा को ही सत्य मान लेता है। ज्ञान कहता है, “मुझे प्रमाण दीजिए।” अज्ञान कहता है, “मुझे प्रमाण की क्या जरूरत है? मैं सब जानता हूं।”
मनोवैज्ञानिक शोध में जिस व्यवहार को डनिंग–क्रूगर प्रभाव कहा जाता है, उसमें कम क्षमता या कम ज्ञान वाले व्यक्ति कई बार अपनी वास्तविक क्षमता को अधिक आंक बैठते हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि ज्ञान की कमी ही कई बार इंसान को अपनी गलती पहचानने से रोकती है। अर्थात, व्यक्ति केवल अनजान नहीं रहता, बल्कि उसे यह भी पता नहीं होता कि वह अनजान है।
इसलिए जब ज्ञान किसी जाहिल व्यक्ति से बहस करता है, तो समस्या यह नहीं कि ज्ञान कमजोर है। समस्या यह है कि ज्ञान तर्क के मैदान में खड़ा होता है, जबकि अज्ञान हवा में बातें करके मैदान ही बदल देता है।
आप तथ्य देंगे, वह व्यक्तिगत हमला करेगा।
आप प्रमाण देंगे, वह अफवाह लेकर आएगा।
आप तर्क देंगे, वह शोर पैदा करेगा।
आप संयम रखेंगे, वह आपके संयम को कमजोरी समझेगा।
और सबसे खतरनाक बात यह है कि कुछ लोग बहस में सत्य खोजने के लिए नहीं उतरते; वे केवल अपनी पहले से बनी धारणा को बचाने के लिए उतरते हैं।
यहां सुकरात की बौद्धिक विनम्रता हमें एक महत्वपूर्ण सबक देती है। सुकराती विचारधारा में अपने ज्ञान की सीमाओं को पहचानना ज्ञान की कमजोरी नहीं, बल्कि ज्ञान की शुरुआत है।
इसलिए हर बहस जीतना ज्ञानवान व्यक्ति का उद्देश्य नहीं होना चाहिए। अक्सर चुप रहना ज्ञान की हार नहीं, बल्कि ज्ञान का सम्मान होता है।
यदि सामने वाला सुनने के लिए तैयार नहीं, सवाल पूछने के लिए तैयार नहीं, अपने विश्वास की जांच करने के लिए तैयार नहीं और प्रमाण को स्वीकार करने की क्षमता नहीं रखता, तो वहां ज्ञान बांटना दीवार से बात करने जैसा है।
ज्ञान वहां देना चाहिए जहां सवाल हों, जिज्ञासा हो और सत्य को स्वीकार करने की ईमानदारी हो, क्योंकि ज्ञान का उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि अंधकार को कम करना है।
इसीलिए कई बार अपनी बात साबित करने के बजाय वहां से चुपचाप हट जाना बेहतर होता है, जहां सत्य की कोई मांग ही नहीं होती। तब वह पुरानी तीखी पंक्ति याद आती है—
“जाहिल को जब जहालत का इनाम मिले,
वक्त के इस हादसे को क्या नाम मिले?
शराबखाने की तौहीन है, रिंदों की हतक है—
किसी हरामी के हाथों में जब जाम मिले।”
लेकिन इस पूरे विचार का सबसे गहरा सार शायद यह है:
जहालत से लड़ने के लिए अपना ज्ञान बर्बाद मत करो। अपना ज्ञान वहां बोओ, जहां समझ की मिट्टी हो। क्योंकि बीज कितना भी कीमती हो, पत्थर पर बोया जाए तो फसल नहीं बनती।
ज्ञान की असली जीत यह नहीं कि किसी जाहिल को चुप करा दिया जाए। ज्ञान की असली जीत यह है कि कोई एक इंसान सोचना सीख ले।
छत्रपाल सिंह






