चंडीगढ़, 21 सितंबर, 2026 (चौधरी प्रभजीत सिंह): पंजाब सरकार ने किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना में पंजाब को शामिल नहीं किए जाने के मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी तेज कर दी है। सरकार की ओर से अदालत में दाखिल की जाने वाली याचिका के मसौदे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। 15 सितंबर को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली ने किशाऊ परियोजना को आगे बढ़ाने के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इस समझौते में पंजाब को शामिल नहीं किया गया। पंजाब सरकार का कहना है कि यमुना बेसिन से जुड़े इस महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाने से पहले पंजाब को विश्वास में नहीं लिया गया।
जल संसाधन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के मुताबिक, एडवोकेट जनरल कार्यालय को सुप्रीम कोर्ट में दाखिल होने वाली याचिका के मसौदे को मंजूरी देने के लिए पत्र भेजे गए हैं। बताया गया है कि याचिका के प्रारूप की समीक्षा पहले ही पूर्व एडवोकेट जनरल और एक वरिष्ठ वकील द्वारा की जा चुकी है।
यमुना के पानी पर पंजाब का दावा: मुख्यमंत्री भगवंत मान पहले भी केंद्र की अध्यक्षता में हुई पंजाब-हरियाणा संबंधी बैठकों में यमुना के पानी में पंजाब के अधिकार का मुद्दा उठा चुके हैं। इस संबंध में मुख्यमंत्री की ओर से प्रधानमंत्री और केंद्र सरकार को पांच पत्र भी भेजे जा चुके हैं।
पंजाब सरकार की प्रस्तावित याचिका में मुख्य तर्क यह होगा कि यमुना जल बंटवारे से संबंधित 1994 के समझौते के आधार पर किशाऊ परियोजना को अंतिम रूप नहीं दिया जा सकता, क्योंकि पंजाब उस समझौते का पक्षकार नहीं था।
12 मई 1994 को हरियाणा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश के बीच यमुना जल बंटवारे को लेकर समझौता हुआ था। पंजाब सरकार का दावा है कि इस व्यवस्था में पंजाब के हितों को शामिल नहीं किया गया।
422 मेगावाट बिजली और 97 हजार हेक्टेयर सिंचाई: किशाऊ परियोजना यमुना की सहायक नदी टौंस पर प्रस्तावित है। परियोजना से करीब 422 मेगावाट बिजली उत्पादन और लगभग 97 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई का लक्ष्य है। इसमें करीब 1,562 मिलियन घन मीटर पानी संग्रहित करने की क्षमता होगी।
पंजाब सरकार का कहना है कि परियोजना से मिलने वाले लाभों को केवल छह राज्यों के बीच बांटना पंजाब के जल अधिकारों के संदर्भ में उचित नहीं है।
1954 के समझौते का भी दिया जाएगा हवाला: पंजाब सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपने पक्ष के समर्थन में 12 मार्च 1954 को तत्कालीन पंजाब और उत्तर प्रदेश के बीच हुए समझौते का उल्लेख कर सकती है। पंजाब का दावा है कि उस समझौते के तहत तत्कालीन पंजाब को यमुना के पानी में दो-तिहाई हिस्सा प्राप्त था।
राज्य सरकार के अनुसार 1972 की सिंचाई आयोग की रिपोर्ट में भी पंजाब को यमुना बेसिन से संबंधित बताया गया है। पंजाब वर्ष 1992 से केंद्र के समक्ष मांग करता रहा है कि यमुना जल बंटवारे से संबंधित चर्चाओं में उसे भी शामिल किया जाए।
2025 के बाद समीक्षा का प्रावधान: पंजाब सरकार यह तर्क भी रख सकती है कि 1994 का यमुना जल समझौता पूरी तरह अंतिम नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसकी धारा 8 में 2025 के बाद समीक्षा का प्रावधान है। पंजाब चाहता है कि इस समीक्षा प्रक्रिया में उसके दावे पर भी विचार किया जाए।
राज्य सरकार का यह भी कहना है कि 1966 में पंजाब के पुनर्गठन से पहले पुराने पंजाब का यमुना के पानी में हिस्सा था। इसी आधार पर पंजाब का तर्क है कि यदि हरियाणा को उत्तराधिकारी राज्य के तौर पर रावी-ब्यास के पानी से संबंधित अधिकार मिल सकते हैं, तो यमुना के मामले में पंजाब के उत्तराधिकार के दावे पर भी विचार होना चाहिए।






