तरक्की की चमक के नीचे बने सामाजिक दबाव, घरेलू विरोधाभास और संस्थागत कमजोरियों की पड़ताल
भारत को दुनिया की तेजी से बदलती अर्थव्यवस्थाओं में गिना जाता है। डिजिटल भुगतान, अंतरिक्ष तकनीक, नई औद्योगिक क्षमता, स्टार्टअप और विशाल युवा आबादी—ये सभी भारत की तरक्की की तस्वीर पेश करते हैं। लेकिन हर चमकते चेहरे के पीछे कुछ ऐसे सवाल भी हैं, जिन पर हम कम बात करते हैं।
ये सवाल सिर्फ सरकारों या संस्थाओं से जुड़े नहीं हैं, बल्कि घर, परिवार, विवाह, शिक्षा, रोजगार और रोजमर्रा के सामाजिक व्यवहार से भी जुड़े हैं।
एक ओर हम भविष्य की अर्थव्यवस्था बनाने की बात करते हैं, तो दूसरी ओर लाखों युवाओं के लिए जीवन का अर्थ अभी भी एक परीक्षा, सरकारी नौकरी, विवाह और समाज की स्वीकृति तक सीमित हो जाता है। यह विरोधाभास भारत के आधुनिक चेहरे की सबसे दिलचस्प कहानियों में से एक है।
‘जुगाड़’ भारतीय समाज की रचनात्मक क्षमता का प्रतीक भी है। कम संसाधनों में काम चलाना, उपलब्ध साधनों का नए तरीके से इस्तेमाल करना और तत्काल समस्या का समाधान निकालना—ये कौशल भारत के छोटे कारोबारियों और आम लोगों में व्यापक रूप से दिखाई देते हैं।
विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत के अनुसंधान एवं विकास पर खर्च में वृद्धि हुई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2020-21 में देश का कुल अनुसंधान एवं विकास खर्च लगभग ₹1.27 लाख करोड़ था, लेकिन GDP के मुकाबले इसकी हिस्सेदारी 0.64 प्रतिशत रही।
इसलिए वास्तविक चुनौती केवल ‘जुगाड़’ को छोड़ने की नहीं, बल्कि जुगाड़ की रचनात्मकता को गहन शोध, मानकीकरण, औद्योगिक प्रक्रियाओं और दीर्घकालिक तकनीक में बदलने की है।
अगर जुगाड़ समस्या से तत्काल बचा सकता है, तो शोध और मजबूत व्यवस्था उस समस्या को दोबारा पैदा होने से रोक सकती है।
भारतीय समाज में युवा पुरुष पर एक मौन सामाजिक अपेक्षा रहती है। वह कमाए, घर संभाले, अपनी सामाजिक हैसियत बनाए और परिवार की उम्मीदों को पूरा करे।
यह दबाव हर व्यक्ति पर एक जैसा नहीं होता, लेकिन प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार की अनिश्चितता इसे और गंभीर बना सकती है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की भारत रोजगार रिपोर्ट 2024 ने भारत में युवाओं के रोजगार, शिक्षा और कौशल से जुड़ी चुनौतियों का विस्तार से अध्ययन किया है।
जब किसी युवा की पहचान उसकी नौकरी, वेतन या परीक्षा के परिणाम से जोड़ दी जाती है, तो असफलता सिर्फ आर्थिक घटना नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक शर्म का बड़ा रूप भी ले सकती है।
‘चार लोग क्या कहेंगे?’—भारतीय घर का अदृश्य जज
“चार लोग क्या कहेंगे?” भारतीय पारिवारिक जीवन में शायद सबसे छोटा, लेकिन सबसे प्रभावशाली वाक्य है।
नौकरी बदलनी हो—चार लोग।
विवाह करना हो—चार लोग।
कपड़े पहनने हों—चार लोग।
कारोबार में नुकसान हो जाए—चार लोग।
बच्चा अपनी पसंद का करियर चुने—फिर भी चार लोग।
ये ‘चार लोग’ वास्तव में कोई चार व्यक्ति नहीं हैं। यह सामाजिक निगरानी, पारिवारिक प्रतिष्ठा, वर्ग-चेतना और स्वीकृति की मिली-जुली धारणा है।
समस्या तब पैदा होती है, जब समाज की संभावित राय व्यक्ति की वास्तविक खुशी से ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारतीय विवाह व्यवस्था में आधुनिकता और परंपरा साथ-साथ चलती हैं। ऑनलाइन वैवाहिक प्लेटफॉर्मों ने विकल्पों का दायरा बढ़ाया है, लेकिन जीवनसाथी के चयन में जाति, क्षेत्र, शिक्षा, पेशा, आय और रंग जैसे मानदंड अभी भी महत्वपूर्ण हैं।
ऑक्सफोर्ड अकादमिक में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारतीय विवाह विज्ञापनों में जाति अक्सर एक महत्वपूर्ण पहचान संबंधी मानदंड रही है।
रंगभेद पर 2026 में प्रकाशित एक अध्ययन ने 2010 से 2024 तक 30 अखबारों में प्रकाशित विवाह विज्ञापनों का पाठ-विश्लेषण किया और ‘फेयर’ या गोरे रंग को प्राथमिकता देने की लगातार मौजूदगी दर्ज की।
इससे पहले के अध्ययनों ने भी विवाह विज्ञापनों में पुरुष की आर्थिक स्थिरता और महिला की शारीरिक सुंदरता के बीच एक सामाजिक लेन-देन जैसे पैटर्न की ओर संकेत किया था।
इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भारत कितना आधुनिक हुआ है। सवाल यह भी है कि आधुनिकता ने हमारे विकल्प बदले हैं या सिर्फ पुराने मानदंडों को डिजिटल बना दिया है?
घर का अदृश्य श्रम
भारतीय मध्यमवर्गीय परिवार की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ऐसे श्रम पर टिका है, जिसकी बाजार में कीमत नहीं लगती।
खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा और घर का प्रबंधन—इन सभी कार्यों को अक्सर ‘घरेलू जिम्मेदारी’ कहकर आर्थिक गणना से बाहर कर दिया जाता है।
भारत के टाइम यूज सर्वे 2024 के अनुसार घरेलू सदस्यों के लिए बिना वेतन वाले घरेलू कार्यों में 81.5 प्रतिशत महिलाएं हिस्सा लेती थीं, जबकि पुरुषों की भागीदारी 27.1 प्रतिशत थी। इन कार्यों में शामिल महिलाओं ने औसतन 289 मिनट प्रतिदिन और पुरुषों ने 88 मिनट प्रतिदिन लगाए। बिना वेतन वाले देखभाल संबंधी कार्यों में भी महिलाओं का समय पुरुषों की तुलना में अधिक था।
अर्थात घर की ‘मुफ्त’ सेवा वास्तव में मुफ्त नहीं है, बल्कि किसी न किसी की जिंदगी का समय इसकी कीमत चुकाता है।
सार्वजनिक जगह और नागरिक जिम्मेदारी
भारत की एक और अनकही समस्या सार्वजनिक स्थानों के साथ हमारा संबंध है। सड़क, बस, रेलवे स्टेशन, पार्क, फुटपाथ और सरकारी इमारतें—ये सभी साझा संसाधन हैं। लेकिन हम अक्सर ‘मेरा अधिकार’ तो याद रखते हैं, ‘दूसरे का अधिकार’ भूल जाते हैं।
सड़क पर कूड़ा फेंकना, फुटपाथ घेरना, गलत पार्किंग करना, कतार तोड़ना या सार्वजनिक संपत्ति को निजी इस्तेमाल में लेना सिर्फ व्यक्तिगत अनुशासनहीनता नहीं है। यह साझा नागरिकता की कमजोरी का संकेत भी है।
जिस समाज में सार्वजनिक स्थान को ‘किसी और की जिम्मेदारी’ माना जाता है, वहां केवल बुनियादी ढांचा बनाना पर्याप्त नहीं है। उसके साझा और जिम्मेदार इस्तेमाल की संस्कृति भी विकसित करनी पड़ती है।
कोटा की कोचिंग संस्कृति और शिक्षा का दबाव
राजस्थान का कोटा शहर भारत की शिक्षा व्यवस्था के एक बड़े विरोधाभास को सामने लाता है।
2023 में प्रकाशित एक अध्ययन में कोटा के कोचिंग और गैर-कोचिंग छात्रों की जांच की गई। अध्ययन में 44.45 प्रतिशत कोचिंग छात्रों में उच्च स्तर का अकादमिक तनाव पाया गया, जबकि गैर-कोचिंग समूह में यह आंकड़ा 3.33 प्रतिशत था। यह सीमित नमूने वाला अध्ययन था, इसलिए इसे पूरे भारत के विद्यार्थियों पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
अगर बच्चों के सबसे रचनात्मक वर्ष लगातार टेस्ट, रैंक, बैच और प्रतियोगिता में बीत जाएं, तो हम शायद एक परीक्षार्थी तैयार कर लें, लेकिन क्या हम एक शोधकर्ता, कलाकार, उद्यमी या स्वतंत्र विचारक भी तैयार कर रहे हैं?
2025-26 में प्रकाशित मनोचिकित्सकीय साहित्य ने कोचिंग केंद्रों, खासकर कोटा, में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य को सामाजिक और संस्थागत स्तर पर देखने की जरूरत पर जोर दिया है।
परीक्षा प्रणाली और भरोसे का सवाल
जहां लाखों उम्मीदवार वर्षों की तैयारी, पैसा और समय लगाते हैं, वहां प्रश्नपत्र लीक होना पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को प्रभावित करता है।
इसी पृष्ठभूमि में केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाएँ (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 लागू किया। कानून में प्रश्नपत्र या उत्तर-कुंजी की अनधिकृत पहुंच या लीक, कंप्यूटर संसाधनों से छेड़छाड़, फर्जी परीक्षा और पैसे के लिए धोखाधड़ी जैसी गतिविधियों को ‘अनुचित साधनों’ में शामिल किया गया है।
लेकिन कानून बनाना और परीक्षा प्रणाली में भरोसा पैदा करना दो अलग-अलग चीजें हैं।
विविधता और भेदभाव
भारत की विविधता उसकी ताकत है, लेकिन यही विविधता कई बार भेदभाव का आधार भी बन जाती है।
उत्तर-पूर्वी भारत से दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई और अन्य महानगरों में आने वाले लोगों के साथ रूप-रंग, भाषा, खान-पान और संस्कृति के आधार पर भेदभाव के संबंध में संस्थागत शोध और सरकारी दस्तावेज मौजूद हैं।
केंद्रीय गृह मंत्रालय ने भी उत्तर-पूर्व के लोगों के खिलाफ नस्ली भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की निगरानी के लिए समिति और नोडल अधिकारियों जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख किया है। 2026 में सरकार ने यह भी कहा कि ऐसी घटनाओं का केंद्रीय स्तर पर अलग से आंकड़ा एकत्र नहीं किया जाता।
यहां असली सवाल यह है कि भारतीय होने के लिए क्या एक जैसा दिखना, बोलना या खाना जरूरी है?
भारत की एकता का अर्थ एकरूपता नहीं, बल्कि अलग-अलग होकर भी बराबर होना है।
जुगाड़ को शोध में बदला जा सकता है।
प्रतिस्पर्धा को कौशल में बदला जा सकता है।
विवाह को जाति और रंग की सूची से मानवीय साझेदारी में बदला जा सकता है।
घरेलू श्रम को अदृश्य समझने के बजाय उसकी आर्थिक और सामाजिक कीमत को स्वीकार किया जा सकता है।
कोचिंग को सिर्फ अंकों की मशीन बनाने के बजाय विद्यार्थी के मानसिक विकास से जोड़ा जा सकता है।
परीक्षा को विश्वसनीय बनाने के लिए तकनीक के साथ जवाबदेही भी बढ़ाई जा सकती है।
और ‘चार लोग क्या कहेंगे’ की जगह यह सवाल पूछा जा सकता है—“जो फैसला मैं कर रहा हूं, क्या वह न्यायसंगत, जिम्मेदार और मेरे जीवन के लिए अर्थपूर्ण है?”
किसी समाज की प्रगति इस बात से भी मापी जाएगी कि एक युवा असफल होने के बाद कितनी गरिमा के साथ दोबारा खड़ा हो सकता है। एक महिला के घरेलू काम को कितनी कद्र मिलती है। एक विद्यार्थी को रैंक के अलावा अपनी पहचान बनाने की कितनी आजादी है। एक उत्तर-पूर्वी भारतीय को अपने ही देश में ‘बाहरी’ महसूस न करना पड़े और एक आम नागरिक सार्वजनिक स्थान को अपनी निजी संपत्ति नहीं, बल्कि साझा जिम्मेदारी समझे।
क्योंकि किसी भी देश की सबसे बड़ी तरक्की उस समय शुरू होती है, जब समाज अपनी कमजोरियों को छिपाना छोड़कर उन्हें समझना शुरू करता है।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







