पटियाला, 29 सितंबर, 2026 (हर्षलीन सिंह): श्री अकाल तख्त साहिब के जत्थेदार सिंह साहिब ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज, तख्त श्री दमदमा साहिब के जत्थेदार सिंह साहिब ज्ञानी टेक सिंह और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) के अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने केंद्रीय जेल पटियाला में फांसी की सजा का सामना कर रहे भाई बलवंत सिंह राजोआणा से मुलाकात कर उनकी सेहत और हालात की जानकारी ली। इस मौके पर एसजीपीसी के अंतिरंग सदस्य सुरजीत सिंह गढ़ी भी मौजूद थे।
मुलाकात के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि सिख इतिहास में शासकों द्वारा जान बख्शी के लिए रखी गई शर्तों के आगे सिखों ने कभी समझौता नहीं किया, बल्कि शहादत को स्वीकार किया है। उन्होंने कहा कि भाई बलवंत सिंह राजोआणा भी इसी सिख परंपरा पर कायम रहते हुए स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि उन्हें जान बख्शी की भीख नहीं चाहिए।
उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश गुरुपर्व के अवसर पर वर्ष 2019 में भाई राजोआणा के संबंध में किए गए अपने ऐलान को अभी तक लागू नहीं किया है। छह साल से अधिक समय बीत जाने और सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से संबंधित 41 तारीखें पड़ने के बावजूद सरकार द्वारा कोई अंतिम फैसला न लिया जाना गंभीर मामला है। उन्होंने कहा कि 32 वर्षों से हिरासत में रह रहे भाई राजोआणा के मामले को और लंबित करने की बजाय सरकार को तुरंत निर्णय लेना चाहिए।
जत्थेदार गड़गज्ज ने कहा कि भाई राजोआणा पूरी चढ़दी कला में हैं और गुरु से जुड़े हुए हैं। भाई राजोआणा ने जत्थेदार भाई जगतार सिंह हवारा के मौलिक अधिकारों को लेकर भी चिंता व्यक्त की, जिन्हें अपनी बुजुर्ग और बीमार माता से मिलने के लिए पैरोल तक नहीं दी जा रही। उन्होंने कहा कि यह सरकारों द्वारा सिखों के साथ बड़ा अन्याय है।
उन्होंने कहा कि यदि सरकार ने भाई राजोआणा के मामले में समय रहते फैसला नहीं किया तो पांच सिंह साहिबान की बैठक बुलाकर अगली कार्रवाई के लिए रास्ता खोला जाएगा और भाई राजोआणा की भावनाओं के अनुसार विचार किया जाएगा।
2 अक्टूबर को बंदी सिंहों की रिहाई के लिए किए जा रहे मार्च के बारे में उन्होंने कहा कि जिस प्रकार शिरोमणि कमेटी ने कौमी इंसाफ मोर्चा का समर्थन किया है, उसी प्रकार श्री अकाल तख्त साहिब भी इसका पूर्ण समर्थन करता है। उन्होंने मीडिया से भी अपील की कि बंदी सिंहों के मानवाधिकारों से जुड़े मामलों को खुलकर उठाया जाए।
जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज्ज ने कहा कि जिस धरती पर नौवें पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर साहिब ने धार्मिक स्वतंत्रता के लिए शहादत दी, उसी देश में सिख बंदियों को अपने परिवारों और माताओं से मिलने के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सरकारों को बंदी सिंहों के मामलों में बिना देरी के न्यायसंगत और मानवीय पहलू को ध्यान में रखते हुए फैसले करने चाहिए।
इस दौरान मीडिया को संबोधित करते हुए एसजीपीसी अध्यक्ष एडवोकेट हरजिंदर सिंह धामी ने बताया कि भाई बलवंत सिंह राजोआणा पिछले करीब 32 वर्षों से जेल में बंद हैं और उन्हें फांसी की चक्की में बैठे हुए भी 19 साल से अधिक समय हो चुका है। उन्होंने कहा कि एसजीपीसी द्वारा दायर की गई याचिका के जल्द निपटारे के लिए भाई साहिब ने विशेष रूप से कहा है।
उन्होंने कहा कि भाई राजोआणा का कहना है कि उन्होंने जो भी कौमी सेवा की है, वह बिल्कुल सही की है और इसके लिए वे किसी भी प्रकार की माफी की मांग नहीं कर रहे हैं।
एडवोकेट धामी ने कहा कि शहादत सिख पंथ की जान है। इंसान जन्म लेता है और एक दिन अकाल चलाना करता है, लेकिन कौम के लिए मर-मिटना ही सिखी का असली मार्ग है। उन्होंने बताया कि भाई राजोआणा के साथ पूरी स्थिति को लेकर विस्तारपूर्वक विचार-विमर्श हुआ है और इस संबंध में बहुत जल्द कोई ठोस फैसला लिया जाएगा।
देश के कानूनी और प्रशासनिक ढांचे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि यह सीधे तौर पर मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। जिस देश में एक बेटे को अपनी बुजुर्ग मां से मिलने के लिए भी पैरोल नहीं दी जाती, वहां इंसाफ की उम्मीद कैसे की जा सकती है? यह बेहद अफसोसजनक और गलत हो रहा है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक व्यक्तिगत मामला नहीं, बल्कि एक ‘कौमी मसला’ है। भाई राजोआणा और भाई जगतार सिंह हवारा सहित सभी बंदी सिंहों की रिहाई के लिए शिरोमणि कमेटी पूरी दृढ़ता के साथ खड़ी है। इसी कड़ी के तहत बंदी सिंहों की रिहाई के लिए 2 अक्टूबर को निकाले जा रहे मार्च का शिरोमणि कमेटी की ओर से पूर्ण समर्थन किया जाता है।
उन्होंने कहा कि भाई राजोआणा चढ़दी कला में हैं और कौम की भलाई तथा उज्ज्वल भविष्य के लिए आशावान हैं। एडवोकेट धामी ने कहा कि अब पूरे मामले और आगे की रणनीति के संबंध में अंतिम फैसला पांच सिंह साहिबान द्वारा लिया जाएगा, जो समूची कौम के लिए मार्गदर्शन होगा।






