Tuesday, September 29, 2026
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खबर का सच बनाम कोठे चढ़कर नच

कभी पंजाब की पत्रकारिता का मतलब सिर्फ खबर छापना नहीं था। पत्रकार गांव की न्यायी से लेकर सरकारी दफ्तरों की फाइलों तक जाता था। किसान की फसल, विद्यार्थी की फीस, बेरोजगार युवा की बेचैनी, अस्पताल की स्थिति, स्कूलों में शिक्षकों की कमी और सरकारी योजनाओं की जमीनी हकीकत आदि—ये सभी पत्रकारिता के केंद्र में होते थे।

आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा एक नई प्रतिस्पर्धा में प्रवेश कर चुका है। वह है किसी भी तरीके से “ध्यान हासिल करने की प्रतियोगिता”।

खबर अब सिर्फ पाठक या दर्शक के लिए नहीं बन रही, बल्कि एल्गोरिदम के लिए भी बनाई जा रही है। शीर्षक कितना तीखा है? थंबनेल कितना उत्तेजक है? वीडियो कितनी देर तक देखा गया? कितने लोगों ने टिप्पणी की? कितने लोगों ने उसे साझा किया?

इस बदलाव ने पत्रकारिता की अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि समाज में होने वाली चर्चा की दिशा को भी बदल दिया है।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट कीडिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट 2025 के मुताबिक, भारत में ऑनलाइन खबरें लेने वाले सर्वेक्षण-नमूने में यूट्यूब के माध्यम से खबरें लेने वालों की हिस्सेदारी 55% और व्हाट्सऐप की 46% थी। रिपोर्ट खुद चेतावनी देती है कि यह मुख्य रूप से अंग्रेजी-भाषी ऑनलाइन उपयोगकर्ताओं का नमूना है और पूरे भारत का प्रतिनिधित्व नहीं करता। फिर भी यह बदलाव की दिशा जरूर दिखाता है। अब खबर का दरवाजा सिर्फ अखबार का पहला पन्ना नहीं रहा।

प्रिंट मीडिया में संपादक तय करता था कि दिन की सबसे महत्वपूर्ण खबर क्या है। डिजिटल दुनिया में यह फैसला आंशिक रूप से एल्गोरिदमिक प्रणालियों से भी प्रभावित होता है।

एल्गोरिदम का मूल उद्देश्य पत्रकारिता की गुणवत्ता मापना नहीं होता। वह उपयोगकर्ता की दिलचस्पी, रुझान, देखने का समय, प्रतिक्रिया और साझा करने जैसे संकेतों के आधार पर सामग्री की पहुंच बढ़ा सकता है। इस कारण ऐसी सामग्री, जो गुस्सा, डर, हैरानी, टकराव या पहचान आधारित भावनाएं पैदा करती है, कई बार शांत और जटिल विश्लेषण की तुलना में अधिक तत्काल सनसनी पैदा कर सकती है।

सनसनी → अधिक क्लिक → अधिक पहुंच → अधिक दर्शक → अधिक आय/प्रभाव → और अधिक सनसनी।

रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की 2025 की रिपोर्ट यह भी बताती है कि वैश्विक स्तर पर सोशल वीडियो की खपत 2020 के 52% से बढ़कर 2025 में 65% हो गई और वीडियो के माध्यम से खबरों की खपत 75% तक पहुंच गई। रिपोर्ट के अनुसार, इसके साथ खबरों का क्षेत्र व्यक्तिगत प्रस्तुतकर्ताओं, यूट्यूबर्स और अन्य ‘पर्सनैलिटी-लेड’ मॉडल की ओर बढ़ रहा है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर डिजिटल पत्रकार या हर YouTube चैनल सनसनीखेज है। बिल्कुल नहीं। डिजिटल मीडिया ने कई स्वतंत्र पत्रकारों को वह मंच दिया है, जो पारंपरिक मीडिया में उनके पास नहीं था। मुद्दा माध्यम नहीं, बल्कि माध्यम की प्रेरणा और संपादकीय अनुशासन है।

मुद्दा यह है कि पंजाब की सबसे बड़ी समस्याएं क्या हैं—

क्या वे हर दिन का नया बयान हैं?

क्या वे किसी की तीखी टिप्पणी हैं?

क्या वे किसी छोटी घटना को सामुदायिक टकराव के फ्रेम में पेश करना हैं?

या फिर वह युवा है, जो डिग्री हाथ में लेकर रोजगार तलाश रहा है?

सरकारी PLFS आंकड़ों में 2024 की दूसरी तिमाही के दौरान पंजाब के शहरी 15–29 वर्ष के युवाओं की बेरोजगारी दर 21.8% दर्ज की गई थी। यह एक खास तिमाही और एक खास आयु-समूह का आंकड़ा है। इसे पूरे पंजाब की कुल बेरोजगारी नहीं माना जा सकता। लेकिन यह युवा रोजगार के सवाल की गंभीरता की ओर जरूर संकेत करता है।

इसी तरह शिक्षा की गुणवत्ता का सवाल सिर्फ परीक्षा परिणामों के साथ खत्म नहीं होता। ASER जैसे मूल्यांकन बच्चों की बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमता को मापने के लिए उम्र या कक्षा से आगे जाकर सीधे लर्निंग आउटकम को देखते हैं। ये वे खबरें हैं, जिनके लिए पत्रकार को एक दिन नहीं, बल्कि कई सप्ताह लग सकते हैं।

एक सरकारी स्कूल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए सिर्फ कैमरा लेकर पहुंच जाना पर्याप्त नहीं है। शिक्षकों से बात करनी होगी, विद्यार्थियों की पढ़ने की क्षमता देखनी होगी, उपस्थिति के आंकड़े लेने होंगे, बजट और सरकारी रिकॉर्ड पढ़ने होंगे और फिर उस पूरी जानकारी को संदर्भ के साथ लोगों के सामने रखना होगा।

लेकिन यह खबर शायद 30 सेकंड में ‘वायरल’ न हो।

एक उत्तेजक शीर्षक के जरिए समाज को गुस्से में रखना सबसे आसान संपादकीय तकनीक है

सामाजिक पहचानें जैसे धर्म, भाषा, क्षेत्र, जाति और समुदाय मानव जीवन का हिस्सा हैं। इनसे जुड़े वास्तविक मुद्दों पर पत्रकारिता होनी चाहिए।

लेकिन जब हर छोटी घटना को ‘हम बनाम वे’ के फ्रेम में पेश किया जाने लगे, तो खबर जानकारी से ज्यादा भावनात्मक उत्पाद बन जाती है।

यहीं ‘एल्गोरिथमिक आउटरेज’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। इसका मतलब है ऐसा डिजिटल माहौल, जिसमें तीखी भावनात्मक प्रतिक्रिया सामग्री को अधिक तवज्जो दिला सकती है।

भारत के बारे में रॉयटर्स इंस्टीट्यूट की रिपोर्ट में भी तथ्यहीन जानकारी को लेकर चिंता सामने आती है। 2025 के सर्वेक्षण में भारतीय उत्तरदाताओं में 53% ने WhatsApp को झूठी या भ्रामक जानकारी के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया।

इसलिए मामला सिर्फ ‘फेक न्यूज’ का नहीं है। मामला यह भी है कि सच्ची खबर में से कौन-सा हिस्सा दिखाया जाता है और कौन-सा हिस्सा गायब कर दिया जाता है।

कई बार जानकारी को झूठा बनाने के लिए झूठ बोलने की जरूरत नहीं होती, विषय का संदर्भ हटा देना ही काफी होता है।

पंजाब को आज ऐसी पत्रकारिता की जरूरत है, जो सरकार से सवाल करे, लेकिन सिर्फ सरकार से नहीं, बल्कि विपक्ष से भी सवाल करे और खबर को संतुलित रखे।

जो किसी धार्मिक समुदाय की भावनाओं को समझे, लेकिन भावना को तथ्य का विकल्प न बनाए।

जो किसान की पीड़ा दिखाए, लेकिन आंकड़ों की जांच भी करे।

जो युवा बेरोजगारी को सिर्फ ‘विदेश जाने की लहर’ कहकर खत्म न करे, बल्कि पूछे कि स्थानीय अर्थव्यवस्था कितनी नौकरियां पैदा कर रही है।

जो स्कूल की इमारत की तस्वीर से आगे बढ़कर पूछे कि बच्चे वास्तव में सीख क्या रहे हैं?

और जो हर घटना को ‘ब्रेकिंग’ बनाने के बजाय कभी-कभी यह भी कहे—“यह खबर आज नहीं, लेकिन पूरी जांच के बाद बताएंगे।”

यही पत्रकारिता की असली ताकत है।

पारंपरिक प्रिंट मीडिया में भी पक्षपात, व्यावसायिक दबाव और गलतियां रही हैं। इसलिए पुराने मॉडल को अपने आप में संपूर्ण मानना भी उचित नहीं है।

दूसरी ओर, डिजिटल मीडिया ने खबरों को लोगों के हाथों तक पहुंचाया है। एक छोटे शहर का पत्रकार अब अपने मोबाइल के जरिए हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। यह लोकतांत्रिक संभावना बेहद महत्वपूर्ण है।

असल विवाद प्रिंट बनाम डिजिटल का नहीं है।

असल लड़ाई है—

पत्रकारिता बनाम सनसनी।
तथ्य बनाम अफवाह।
संदर्भ बनाम क्लिप।
पड़ताल बनाम प्रतिक्रिया।
जनहित बनाम सिर्फ व्यस्तता।

अगर क्षेत्रीय मीडिया अपनी विश्वसनीयता बचाना चाहता है, तो उसे फिर से जमीन की ओर जाना पड़ेगा।

गांवों में जाना पड़ेगा।

स्कूलों में जाना पड़ेगा।

अस्पतालों में जाना पड़ेगा।

रोजगार कार्यालयों में जाना पड़ेगा।

अदालती रिकॉर्ड पढ़ने पड़ेंगे।

सरकारी आंकड़ों की जांच करनी होगी।

और सबसे ज्यादा लोगों की बात सुननी होगी।

क्योंकि किसी समाज को लगातार गुस्से में रखना आसान है, लेकिन उसे लगातार सोचने के लिए मजबूर करना मुश्किल है।

पंजाब की पत्रकारिता का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि किस चैनल के कितने व्यूज हैं।

यह इस बात से तय होगा कि कितने लोगों को सही सवाल पूछने की हिम्मत मिली।

आज पंजाब को अधिक शोर की नहीं, बल्कि अधिक सच्ची रिपोर्टिंग की जरूरत है।

क्योंकि जब मीडिया लोगों को हर दिन किसी नए विवाद में उलझा दे, तो सबसे खतरनाक खबर वह नहीं होती जो झूठी है।

सबसे खतरनाक खबर वह होती है, जो सच्चे सवाल को लोगों की नजरों से ही गायब कर दे।

गुरमीत सिंह तुंग

ब्यूरो चीफ (98552 21193)

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