29 सितंबर 1914 का बज बज घाट कांड भारतीय इतिहास, पंजाबी प्रवासी इतिहास और सिख संघर्ष की एक दर्दनाक घटना है। इसकी जड़ें कामागाटा मारू की यात्रा में थीं। बाबा गुरदित सिंह ने 1914 में जापानी जहाज कामागाटा मारू के जरिए भारतीय यात्रियों को कनाडा ले जाने का प्रयास किया। जहाज 23 मई को वैंकूवर पहुंचा था, जिसमें कुल 376 यात्री सवार थे—340 सिख, 24 मुसलमान और 12 हिंदू।
उस समय कनाडा में एशियाई, विशेष रूप से भारतीय प्रवास को रोकने के लिए नस्ल आधारित कानून लागू थे। 1908 की पाबंदियों में “निरंतर यात्रा” की शर्त रखी गई थी, जिसके कारण भारत से कनाडा जाना व्यावहारिक रूप से लगभग असंभव बना दिया गया था। कामागाटा मारू के यात्रियों को करीब दो महीने तक जहाज पर ही रोके रखा गया और उन्हें कनाडा में उतरने की अनुमति नहीं दी गई।
स्थानीय दक्षिण एशियाई समुदाय ने यात्रियों के पक्ष में कानूनी लड़ाई लड़ी, धन जुटाया और वकील किया, लेकिन अदालत में किए गए प्रयास सफल नहीं हुए। आखिरकार 23 जुलाई 1914 को जहाज को भारत वापस भेज दिया गया।
29 सितंबर को कामागाटा मारू कलकत्ता के निकट बज बज घाट पहुंचा। ब्रिटिश सरकार यात्रियों को पंजाब भेजने के लिए विशेष रेलगाड़ी के जरिए ले जाना चाहती थी। सरकारी नजरिए में कुछ यात्रियों पर गदर आंदोलन या विद्रोही गतिविधियों से जुड़े होने का संदेह था।
इस दौरान यात्रियों और पुलिस-फौज के बीच टकराव हुआ। भारत सरकार द्वारा स्वतंत्रता की स्मृति में आयोजित राष्ट्रीय समारोह के ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, यात्रियों ने गुरु ग्रंथ साहिब जी की अगुवाई में शोभायात्रा निकाली और टकराव में 18 सिख मारे गए तथा 25 घायल हुए।
केनैडा के पार्क्स कनाडा के ऐतिहासिक रिकॉर्ड में मृतकों की संख्या 20 बताई गई है तथा कई अन्य लोगों के घायल होने और 200 से अधिक लोगों को बिना मुकदमे के कैद किए जाने का उल्लेख है। अलग-अलग स्रोतों में आंकड़ों के इस अंतर को दर्ज करना ऐतिहासिक सावधानी के लिए जरूरी है।
बज बज घाट कांड को केवल एक पुलिस गोलीकांड के रूप में देखना इसके व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को सीमित कर देगा। इसके पीछे उपनिवेशवाद, नस्लीय भेदभाव, प्रवासी अधिकार, ब्रिटिश साम्राज्य की राजनीति और भारतीयों में उभर रही स्वतंत्रता की चेतना एक साथ काम कर रही थीं।
कामागाटा मारू के यात्रियों ने विदेशी धरती पर नस्लीय पाबंदियों को चुनौती दी; वहीं बज बज घाट पर उन्हें औपनिवेशिक संदेह और दमन का सामना करना पड़ा। इसी कारण यह घटना पंजाबी प्रवासी इतिहास के साथ-साथ भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से भी गहराई से जुड़ी हुई है।
कामागाटा मारू और बज बज घाट की गाथा आज भी यह सवाल खड़ा करती है कि नागरिकता, मानव गरिमा और प्रवासी अधिकारों को नस्ल और साम्राज्यवादी ताकत किस हद तक प्रभावित कर सकती है?
केनैडा ने 2016 में कामागाटा मारू घटना को राष्ट्रीय ऐतिहासिक महत्व की घटना के रूप में मान्यता दी और उसी वर्ष प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने संसद में सरकार की भूमिका के लिए औपचारिक माफी भी मांगी।
बज बज घाट की घटना को हमेशा याद रखा जाना चाहिए। यह उस इतिहास की याद है, जिसमें प्रवासी अधिकार, नस्लीय समानता, उपनिवेशवाद विरोध और पंजाबियों की अडिगता एक ही घटना में टकराते हुए दिखाई देते हैं।
छत्रपाल सिंह






