आज का मनुष्य रेडिएशन से घिरा हुआ है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर तरह का रेडिएशन खतरनाक है। मोबाइल फोन, मोबाइल टावर, वाई-फाई, बिजली के उपकरण, रेडियो-टेलीविजन सिग्नल और अस्पतालों में इस्तेमाल होने वाले एक्स-रे तथा सीटी स्कैन हमारे रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुके हैं। असली मुद्दा यह है कि किस प्रकार का रेडिएशन, कितनी मात्रा में, कितने समय तक और किस तरीके से शरीर तक पहुंच रहा है।
मोबाइल टावर रेडियोफ्रीक्वेंसी यानी गैर-आयनीकरण विकिरण का इस्तेमाल करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, आम लोगों के लिए उपलब्ध स्थानों पर बेस-स्टेशन से रेडियोफ्रीक्वेंसी की मात्रा आमतौर पर निर्धारित सुरक्षा सीमाओं से काफी नीचे होती है। टावर के एंटीना के बिल्कुल सामने बहुत नजदीक जाने पर प्रतिबंध इसी वजह से महत्वपूर्ण हैं।
भारत में दूरसंचार विभाग ने मोबाइल बेस-स्टेशनों के लिए ईएमएफ एक्सपोजर की सीमाएं निर्धारित की हैं। विभाग के दस्तावेजों के अनुसार, ये सीमाएं आईसीएनआईआरपी की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के एक-दसवें हिस्से पर निर्धारित की गई हैं।
इसलिए हर मोबाइल टावर को कैंसर या अन्य बीमारियों का सीधा कारण बताना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की मौजूदा समीक्षा के अनुसार, निर्धारित अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से नीचे ईएमएफ एक्सपोजर से स्वास्थ्य पर कोई ज्ञात नुकसान साबित नहीं हुआ है।
यहां मोबाइल फोन का इस्तेमाल एक अलग मामला है। टावर की तुलना में मोबाइल फोन शरीर के बहुत करीब होता है। खासकर लंबे समय तक कान से लगाकर बात करने के दौरान सिर के पास रेडियोफ्रीक्वेंसी एक्सपोजर अधिक होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अब तक उपलब्ध समग्र साक्ष्य मोबाइल फोन के इस्तेमाल को मानव स्वास्थ्य के लिए स्पष्ट रूप से हानिकारक साबित नहीं करते हैं।
फिर भी सावधानी बरतने में कोई नुकसान नहीं है। लंबी कॉल के लिए स्पीकर या हैंड्स-फ्री का इस्तेमाल करना, फोन को लगातार शरीर से लगाकर न रखना और कमजोर सिग्नल की स्थिति में अनावश्यक रूप से लंबी कॉल से बचना समझदारी है।
एक्स-रे, सीटी और फ्लोरोस्कोपी आयनीकरण विकिरण का इस्तेमाल करते हैं। इस प्रकार के विकिरण में डीएनए को नुकसान पहुंचाने की क्षमता होती है और बार-बार या अधिक डोज लेने से जीवनकाल में कैंसर के जोखिम में थोड़ी वृद्धि हो सकती है। सीटी स्कैन में आम एक्स-रे की तुलना में रेडिएशन डोज अधिक होती है।
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मरीज जरूरी सीटी या एक्स-रे करवाने से बचें। जब चिकित्सकीय रूप से जांच आवश्यक हो, तो आमतौर पर इसका लाभ संभावित जोखिम से काफी अधिक होता है। अनावश्यक जांचों से बचना और रेडिएशन डोज को “जितना उचित रूप से संभव हो, उतना कम” रखना मुख्य सिद्धांत है।
सबसे बड़ी समस्या यह है कि आम लोग आयनीकरण विकिरण और गैर-आयनीकरण विकिरण के बीच का अंतर नहीं जानते। एक ओर टावर देखकर डर पैदा किया जाता है, वहीं दूसरी ओर जरूरत से अधिक मोबाइल फोन के इस्तेमाल और अनावश्यक मेडिकल जांचों को हल्के में लिया जाता है।
इसलिए भारत में जरूरत रेडिएशन-मुक्त समाज की नहीं, बल्कि रेडिएशन-जागरूक समाज की है। टावरों की नियमित निगरानी, अस्पतालों में रेडिएशन सुरक्षा के प्रोटोकॉल, मरीजों को जांच की आवश्यकता और डोज के बारे में जानकारी तथा लोगों में वैज्ञानिक जागरूकता—यही सही रास्ता है।
रेडिएशन अदृश्य है, लेकिन इससे जुड़े फैसले अंधविश्वास या डर के आधार पर नहीं, बल्कि माप, मानकों, विज्ञान और सावधानी के आधार पर किए जाने चाहिए।
छत्रपाल सिंह





