इंसान अपनी पूरी जिंदगी खुशी की तलाश में गुजार देता है। बचपन में वह खिलौनों में खुशी ढूँढ़ता है, जवानी में सपनों और कामयाबी में, और उम्र बढ़ने के साथ धन, सम्मान, सुरक्षा तथा सुख-सुविधाओं में। वह हर पल, हर काम, हर एहसास और हर विचार में खुशी का कोई नया ठिकाना तलाशने की कोशिश करता रहता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि खुशी मिल जाने के बाद भी उसकी तलाश खत्म नहीं होती।
एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरी जन्म ले लेती है। एक मंजिल हासिल होती है, तो नजरें अगली मंजिल की ओर टिक जाती हैं। इंसान कई बार खुशी के बीच बैठा हुआ भी उससे बड़ी किसी दूसरी खुशी का इंतजार कर रहा होता है। इस तरह जिंदगी का बड़ा हिस्सा ‘खुश होने’ की तैयारी में ही बीत जाता है, जबकि हर जीवन की अपनी एक सीमा होती है।
असली बदलाव तब आता है, जब इंसान खुशी तलाशने की दिशा बदल देता है। यदि वह सिर्फ अपने लिए खुशियाँ इकट्ठा करने के बजाय किसी दूसरे के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करे, किसी दुखी व्यक्ति को हौसला दे, किसी जरूरतमंद की मदद करे या किसी अकेले इंसान को अपनापन महसूस कराए, तो उसे खुशी का ऐसा रूप मिलता है, जिसे कभी खरीदा नहीं जा सकता।
दूसरों की खुशी में अपनी खुशी तलाशने से इंसान की आंतरिक दुनिया भी बदलने लगती है। ईर्ष्या की जगह प्रसन्नता, बदले की जगह माफी, गुस्से की जगह संतुलन, भ्रम की जगह वास्तविकता, धोखे की जगह सच्चाई और दुश्मनी की जगह अपनापन जन्म लेने लगता है। इंसान समझने लगता है कि दूसरे की तरक्की उसकी हार नहीं है और किसी दूसरे की मुस्कान उसकी अपनी खुशी को कम नहीं करती।
ईर्ष्या और दुश्मनी इंसान के मन में पैदा होने वाला ऐसा जहर हैं, जिसका सबसे पहला नुकसान अक्सर उसी व्यक्ति को होता है, जो इसे अपने भीतर पालकर रखता है। बाहर से दुश्मनी किसी दूसरे व्यक्ति की ओर होती है, लेकिन भीतर ही भीतर वह अपनी ही शांति को खत्म कर रही होती है। गुस्सा, बदला, साजिश और वैर इंसान की मानसिक ऊर्जा को उसी तरह खर्च करते हैं, जैसे लगातार खुला हुआ नल पानी बहाता रहता है।
इसके विपरीत, प्यार, लगाव, सच्चाई और आपसी साझेदारी इंसान के मन को हल्का करते हैं। किसी की मदद करने के बाद मिलने वाली आंतरिक संतुष्टि का कोई मोल नहीं होता। यह ऐसी खुशी है, जो किसी वस्तु का मालिक बनने से नहीं, बल्कि किसी के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने से मिलती है।
खुशी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे बाँटने से यह कम नहीं होती, बल्कि बढ़ती है। एक मुस्कान दूसरे चेहरे पर भी मुस्कान ला सकती है। एक अच्छा शब्द किसी टूटे हुए मन को संभाल सकता है। एक छोटी-सी मदद किसी की जिंदगी में बड़ा हौसला पैदा कर सकती है।
आखिरकार, इंसान को यह समझना पड़ता है कि जीवन की आखिरी सांस तक खुशी की तलाश करते रहना और जीवनभर खुशियाँ बाँटते रहना, जीवन को देखने के दो अलग-अलग तरीके हैं। पहले तरीके में तलाश कभी खत्म नहीं होती, जबकि दूसरे तरीके में हर पल अपने आप में एक मंजिल बन जाता है।
एक समझदार इंसान की असली खुशी इस बात में नहीं है कि “मुझे कितनी खुशी मिली?” बल्कि इस बात में है कि “मेरी वजह से कितने चेहरों पर खुशी आई?”
जिस दिन इंसान इस सवाल का जवाब ढूँढ़ लेता है, उस दिन खुशी उससे दूर नहीं रहती, बल्कि उसके स्वभाव का हिस्सा बन जाती है।
छत्रपाल सिंह





