Wednesday, November 4, 2026
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“मीठा ज़हर” — कौन कसूरवार, खुद प्रशासन या खुद दुकानदार?

जब मिठाइयों में मिलावट होती है, तो त्योहारों की खुशियां सेहत के लिए खतरा बन जाती हैं।

भारत त्योहारों, परंपराओं और आपसी भाईचारे का देश है। यहां मिठाई केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि प्यार, सम्मान और खुशी का प्रतीक है। दिवाली हो, गुरुपर्व हो, शादी-विवाह हो या कोई अन्य शुभ अवसर, मिठाइयां बांटकर खुशियां साझा करना हमारी सांस्कृतिक विरासत का अहम हिस्सा है। लेकिन जब इसी मिठास में मुनाफाखोरी का जहर घुलने लगे, तो सवाल केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का नहीं रह जाता, बल्कि यह मानवीय विवेक, प्रशासनिक जवाबदेही और लोगों की सेहत से जुड़ा गंभीर मुद्दा बन जाता है।

त्योहारों के दिनों में मिठाइयों की मांग अचानक बढ़ जाती है। इस मांग को पूरा करने के लिए कुछ कारोबारी उत्पादन बढ़ाते हैं, लेकिन कुछ बेईमान लोग अधिक मुनाफा कमाने के लालच में मिठाइयों की गुणवत्ता से समझौता करते हैं। महंगे दूध, खोये और शुद्ध घी की जगह सस्ते पदार्थों का इस्तेमाल करना, एक्सपायरी हो चुकी वस्तुओं को दोबारा बेचना और प्रतिबंधित रंगों का उपयोग करना उनकी खतरनाक मानसिकता को उजागर करता है।

मिलावट के इस कारोबार के पीछे कमजोर निगरानी, नियमों का उल्लंघन और दोषियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई न होना जैसे कारण भी जिम्मेदार हैं। जब किसी कारोबारी को यह भरोसा हो जाता है कि मामूली जुर्माना देकर गंभीर उल्लंघन से बचा जा सकता है, तो कानून का डर कमजोर पड़ने लगता है।

खोये और दूध से बनी वस्तुओं में स्टार्च, आटा या अन्य सस्ते पदार्थ मिलाने की शिकायतें सामने आती रहती हैं। घी की जगह सस्ते वनस्पति तेलों का इस्तेमाल करना और मिठाइयों को आकर्षक बनाने के लिए गैर-अनुमोदित रंग डालना भी खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। इसी तरह, मिठाइयों पर चांदी की परत के स्थान पर एल्युमिनियम का इस्तेमाल करना भी उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी का एक रूप है।

रोडामाइन-बी और मेटानिल येलो जैसे गैर-अनुमोदित रंगों का खाद्य पदार्थों में इस्तेमाल गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे पदार्थों के संपर्क में आने से स्वास्थ्य को नुकसान पहुंच सकता है। दूषित या खराब मिठाइयां खाने से उल्टी, दस्त और फूड पॉइजनिंग जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कुछ हानिकारक रसायनों के लंबे समय तक संपर्क में रहने से शरीर के महत्वपूर्ण अंगों, जैसे लिवर और किडनी, पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि, हर रंगीन या चमकदार मिठाई मिलावटी नहीं होती और केवल उसके रंग-रूप के आधार पर मिलावट की पुष्टि नहीं की जा सकती। इसके लिए वैज्ञानिक जांच और प्रमाणिक साक्ष्य जरूरी हैं।

सबसे पहले, उपभोक्ताओं को खरीदारी के समय सतर्क रहना चाहिए। मिठाइयों की गंध, रंग, बनावट और ताजगी पर ध्यान दें। असामान्य रूप से तेज रंग, दुर्गंध, खराब होने के संकेत या अनुचित तरीके से रखी गई मिठाइयों से परहेज करें। पैकेट में मिलने वाली मिठाइयों पर निर्माण तिथि, उपयोग की अंतिम तिथि, सामग्री और अन्य अनिवार्य जानकारियां पढ़ें। भरोसेमंद दुकानदारों से खरीदारी करें और उनकी खाद्य सुरक्षा संबंधी पंजीकरण या लाइसेंस की जानकारी भी प्राप्त करें।

यदि मिलावट का संदेह हो, तो मिठाई का नमूना सुरक्षित रखें और खरीद की रसीद के साथ संबंधित खाद्य सुरक्षा अधिकारी या भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के आधिकारिक शिकायत माध्यम के जरिए सूचना दें। किसी पदार्थ को चखकर या घरेलू नुस्खों के जरिए उसकी सुरक्षा जांचने की कोशिश न करें। सूखे मेवों से बनी मिठाइयां या घर पर तैयार पकवान त्योहारों के लिए अच्छे विकल्प हो सकते हैं, लेकिन उनकी स्वच्छता, ताजगी और सामग्री की शुद्धता का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।

खाद्य सुरक्षा केवल नागरिकों की सावधानी से सुनिश्चित नहीं की जा सकती। खाद्य सुरक्षा विभाग को त्योहारों से पहले और उनके दौरान जोखिम के आधार पर जांच बढ़ानी चाहिए। संदिग्ध नमूनों की प्रयोगशालाओं में जांच, मिलावट करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई और जांच के नतीजों की पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक करना जरूरी है।

केवल छापेमारी करके मिलावटी मिठाइयों को नष्ट कर देना पर्याप्त नहीं है। यह भी सामने आना चाहिए कि मिलावट कहां हुई, इसके लिए कौन जिम्मेदार था और उसके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जब तक दोषियों की जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर प्रभावी रोक लगाना मुश्किल रहेगा।

त्योहारों की असली खुशी महंगी मिठाइयों में नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन और सामूहिक खुशहाली में बसती है। जो कारोबारी लोगों की सेहत के साथ खिलवाड़ करता है, वह केवल कानून का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि समाज के भरोसे को भी तोड़ता है।

जरूरत है कि उपभोक्ता जागरूक हों, व्यापारी ईमानदारी से काम करें और प्रशासन अपनी जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाए। क्योंकि मिठाइयों में मिलावट केवल खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का मामला नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी में गिरावट का भी संकेत है।

त्योहारों की मिठास बरकरार रखनी है, तो मुनाफे के लालच पर ईमानदारी की जीत सुनिश्चित करनी होगी।

छत्रपाल सिंह

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