यरुशलम, 27 अक्टूबर, 2026 (छत्रपाल सिंह): इजरायल में मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को संसदीय चुनाव के लिए मतदान हो रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के लिए यह चुनाव राजनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है। वर्ष 2023 में हमास के हमले के बाद देश की सुरक्षा व्यवस्था, गाजा में युद्ध, ईरान के साथ संघर्ष और सरकार की नीतियों को लेकर उठे सवालों के बीच मतदाता नई संसद का चुनाव करेंगे। इस चुनाव में नेतन्याहू की दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी और उसके सहयोगियों का मुकाबला पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन से है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट भी चुनावी मुकाबले में अहम भूमिका निभा रहे हैं। चुनाव के नतीजे न केवल नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य, बल्कि इजरायल की आगामी सुरक्षा और विदेश नीति की दिशा को भी प्रभावित कर सकते हैं।
7 अक्टूबर के हमले के बाद पहली बार चुनाव
7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में हुए हमले के बाद इजरायल ने गाजा में सैन्य अभियान शुरू किया था। इसके बाद क्षेत्रीय संघर्ष का विस्तार हुआ और लेबनान तथा ईरान के साथ भी तनाव और सैन्य टकराव बढ़े। इन घटनाओं ने इजरायल की सुरक्षा नीति और सरकार की जवाबदेही को चुनावी बहस के प्रमुख मुद्दों में शामिल कर दिया है। नेतन्याहू के आलोचक अक्टूबर 2023 के हमले से पहले और उसके दौरान हुई सुरक्षा संबंधी विफलताओं की स्वतंत्र जांच की मांग कर रहे हैं। वहीं, प्रधानमंत्री के समर्थक उनके युद्धकालीन नेतृत्व और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर उनके रुख का समर्थन करते हैं।
गादी आइजेनकोट और नफ्ताली बेनेट की चुनौती
पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइजेनकोट नेतन्याहू के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी के रूप में उभरे हैं। उन्होंने अक्टूबर 2023 की सुरक्षा विफलताओं की जवाबदेही तय करने और देश की सुरक्षा नीति की समीक्षा करने की मांग उठाई है। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट के नेतृत्व वाला राजनीतिक धड़ा भी सरकार गठन के समीकरणों में महत्वपूर्ण हो सकता है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में लिकुड और विपक्षी दलों के बीच कड़ा मुकाबला दिखाई दिया है। हालांकि, किसी भी गठबंधन को 120 सदस्यीय संसद में सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों का स्पष्ट बहुमत मिलता दिखाई नहीं दे रहा।
सैन्य सेवा और आर्थिक मुद्दे भी अहम
चुनाव में अनिवार्य सैन्य सेवा, अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के युवाओं को सैन्य सेवा से छूट, बढ़ती महंगाई और सरकार की न्यायिक नीतियां भी चर्चा के केंद्र में हैं। नेतन्याहू के गठबंधन में शामिल कुछ धार्मिक दलों की सैन्य सेवा संबंधी मांगों को लेकर देश में मतभेद रहे हैं।
इजरायल की आनुपातिक प्रतिनिधित्व वाली चुनाव प्रणाली में मतदाता पार्टियों को वोट देते हैं और सीटों का बंटवारा उनके मतों के अनुपात में होता है। ऐसे में सबसे अधिक सीटें जीतने वाली पार्टी के लिए भी अपने दम पर सरकार बनाना जरूरी नहीं है; सरकार गठन के लिए संसदीय समर्थन जुटाना अहम होगा।
त्रिशंकु संसद की संभावना
चुनाव के बाद यदि कोई गठबंधन 61 सीटों का समर्थन जुटाने में सफल नहीं होता, तो सरकार गठन को लेकर बातचीत लंबी खिंच सकती है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक गतिरोध और नए चुनाव की संभावना भी बनी रह सकती है। इसलिए इस चुनाव का परिणाम केवल नेतन्याहू की लिकुड पार्टी की सीटों से नहीं, बल्कि छोटे दलों और संभावित गठबंधन सहयोगियों की भूमिका से भी तय होगा।
इजरायल के इस चुनाव पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भी नजर है, क्योंकि नई सरकार के फैसलों का असर गाजा, ईरान, लेबनान और अमेरिका के साथ संबंधों पर पड़ सकता है।






