नई दिल्ली, 28 जुलाई, 2026 (गुरप्रीत सिंह): भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को लेकर भारतीय मनोविज्ञान सोसाइटी ने चिंता जताई है। संस्था ने कहा है कि देश में मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लगभग 80 से 85 प्रतिशत लोगों को समय पर या पर्याप्त मानसिक स्वास्थ्य देखभाल नहीं मिल पाती।
यह मुद्दा दिल्ली के यशोभूमि में आयोजित होने वाले इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी के 77 वें वार्षिक राष्ट्रीय सम्मेलन ए.एन.सी.आई.पी.एस. 2026 के कर्टेन रेजर कार्यक्रम के दौरान सामने आया। संस्था ने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं इलाज योग्य होने के बावजूद बड़ी संख्या में लोग उचित उपचार से वंचित रह जाते हैं।
आई.पी.एस.की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि मानसिक बीमारियों की समय पर पहचान और सही प्रबंधन से मरीजों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के पीछे सामाजिक कलंक, जागरूकता का अभाव और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं का पर्याप्त रूप से शामिल न होना प्रमुख कारण हैं।
उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य केवल चिकित्सा का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और विकास से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान देने की जरूरत है। सम्मेलन की आयोजन समिति के चेयरपर्सन डॉ. निमेष जी. देसाई ने इलाज में देरी के खतरों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि समय पर मनोचिकित्सकीय सहायता न मिलने से बीमारी गंभीर हो सकती है। इससे व्यक्ति की कार्यक्षमता प्रभावित होने के साथ परिवार पर तनाव बढ़ सकता है और आत्म-हानि व आत्महत्या के जोखिम में भी वृद्धि हो सकती है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने देश में बेहतर जागरूकता, शुरुआती पहचान और आसान उपचार सुविधाओं की जरूरत पर जोर दिया है।






