Wednesday, August 26, 2026
HomeLifestyleउत्तराखंड का झोड़ा लोकनृत्य

उत्तराखंड का झोड़ा लोकनृत्य

12 अगस्त,2026 (दीपक दत्ता): उत्तराखंड की पहचान सिर्फ बर्फ से ढकी पहाड़ियों, हरे-भरे जंगलों और प्राचीन मंदिरों से नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध लोकपरंपराएं भी इसकी सांस्कृतिक विरासत को खास बनाती हैं। इन्हीं परंपराओं में शामिल है कुमाऊं का प्रसिद्ध झोड़ा लोकनृत्य, जो संगीत, आस्था और सामुदायिक एकता का अनोखा संगम माना जाता है। झोड़ा मुख्य रूप से उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में प्रचलित सामूहिक नृत्य है। अल्मोड़ा, रानीखेत, द्वाराहाट और सोमेश्वर जैसे क्षेत्रों में इसकी खास पहचान है।

त्योहारों से लेकर शादियों तक रंग जमाता है झोड़ा

वसंत के आगमन, स्थानीय पर्व-त्योहारों और विवाह जैसे शुभ अवसरों पर झोड़ा आयोजित करने की परंपरा रही है। गांवों में सुबह और शाम इसके आयोजन का माहौल लोकगीतों और वाद्ययंत्रों की धुन से जीवंत हो उठता है। खास बात यह है कि इसमें समाज के अलग-अलग वर्गों के लोग मिलकर हिस्सा लेते हैं, जिससे यह लोकनृत्य सामाजिक समरसता और भाईचारे का संदेश भी देता है। कुमाऊं में झोड़ा मुख्य रूप से दो शैलियों में देखा जाता है मुक्तक और प्रबंधात्मक,प्रबंधात्मक झोड़ा इसका पारंपरिक रूप माना जाता है। इसमें स्थानीय देवी-देवताओं, धार्मिक प्रसंगों और वीर पुरुषों की कथाओं को गीतों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। मुक्तक शैली में छोटे-छोटे लोकगीतों के जरिए भावनाओं और सामाजिक जीवन की झलक दिखाई जाती है।

गोल घेरे में कदम मिलाते हैं कलाकार

झोड़ा की सबसे खास पहचान इसकी सामूहिक प्रस्तुति है। इसमें प्रतिभागी गोलाकार घेरे में खड़े होकर एक-दूसरे का हाथ थामते हैं। हुड़का जैसे पारंपरिक वाद्य की ताल के साथ सभी एक निर्धारित लय में कदम आगे बढ़ाते और शरीर को हल्का झुकाते हैं। बाएं और दाएं पैरों की तालबद्ध गति के साथ पूरा समूह एक साथ आगे बढ़ता है और फिर अपनी स्थिति में लौट आता है।

इस नृत्य में महिलाओं और पुरुषों की सामूहिक भागीदारी इसे और खास बनाती है। छोटे आयोजनों से लेकर बड़े सामुदायिक कार्यक्रमों तक इसमें कई लोग एक साथ शामिल हो सकते हैं।

कथाएं गीतों में होती हैं जीवंत

झोड़ा के लोकगीतों में धार्मिक भावनाओं की भी गहरी छाप दिखाई देती है। भगवान शिव और माता पार्वती, जिन्हें स्थानीय परंपरा में गौरा-महेश के नाम से भी संबोधित किया जाता है, से जुड़े प्रसंग इसके गीतों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन कथाओं और लीलाओं के जरिए लोकजीवन में आस्था और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़ जाती हैं।

आज झोड़ा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि उत्तराखंड की लोकस्मृति और सांस्कृतिक पहचान को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाने वाली परंपरा है। बदलते दौर में भी सामूहिकता, आस्था और लोकसंगीत से जुड़ा यह नृत्य पहाड़ी समाज की जड़ों को मजबूत बनाए हुए है।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments