धूरी, 18 अगस्त,2026 (प्रभजोत सिंह): पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के निदेशक प्रसार शिक्षा के दिशा-निर्देशों के तहत किसानों को तकनीकी जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए जागरूकता कैंपों की श्रृंखला को जारी रखते हुए पी.ए.यू.-फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर की ओर से गांव घनौर कलां में धान और बासमती की फसलों में कीटों एवं बीमारियों की रोकथाम संबंधी किसान जागरूकता कैंप लगाया गया।
कैंप के दौरान केंद्र के प्रभारी डॉ. अशोक कुमार गर्ग, वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक ने किसानों को धान और बासमती में आने वाले प्रमुख कीटों, जैसे तना छेदक और पत्ता लपेट सुंडी, की पहचान तथा प्रभावी रोकथाम के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि कीटनाशकों का छिड़काव केवल उस समय किया जाए, जब कीटों की संख्या आर्थिक नुकसान स्तर से अधिक हो। इससे अनावश्यक कीटनाशकों के इस्तेमाल, खर्च और पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम किया जा सकता है।
पत्ता लपेट सुंडी की रोकथाम के लिए उन्होंने बताया कि फसल के निसरने से पहले, यदि इस कीट का हमला दिखाई दे तो 20–30 मीटर लंबी नारियल या मुंज की रस्सी को फसल के ऊपरी हिस्से पर दो बार फेरना एक प्रभावी और सस्ता तरीका है। हालांकि, रस्सी फेरते समय खेत में पानी खड़ा होना जरूरी है। अधिक प्रकोप की स्थिति में पी.ए.यू. द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बीमारियों से बचाव के लिए किसानों को यूरिया के अनावश्यक और अधिक इस्तेमाल से बचने की सलाह दी गई। उन्होंने धान के बौनेपन वाले विषाणु रोग के बारे में भी किसानों को जागरूक किया, जो सफेद पीठ वाले तिड़े के माध्यम से फैलता है। इसके लिए खेतों की नियमित निगरानी करने और कीट की मौजूदगी का पता चलने पर पी.ए.यू. द्वारा अनुशंसित कीटनाशकों, जैसे पैक्सालॉन, चेस और उलाला आदि के इस्तेमाल संबंधी जानकारी दी गई।
डॉ. गर्ग ने धान में फोक की समस्या को कम करने के लिए पोटाशियम नाइट्रेट के इस्तेमाल के बारे में भी विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि आवश्यकता के अनुसार गोभ पर 1.5 प्रतिशत पोटाशियम नाइट्रेट का छिड़काव किया जा सकता है।
झंडा रोग के बारे में जानकारी देते हुए उन्होंने बताया कि यह फफूंद से होने वाली बीमारी है, जिससे प्रभावित पौधे पीले पड़ जाते हैं और नीचे से ऊपर की ओर मुरझाकर सूखने लगते हैं। रोगग्रस्त पौधे सामान्य पौधों की तुलना में अधिक ऊंचे होते हैं और जमीन से ऊपर वाली पोरियों से जड़ें भी बना लेते हैं। उन्होंने सलाह दी कि ऐसे पौधों को पनीरी और मुख्य फसल में से उखाड़कर नष्ट कर देना चाहिए, ताकि बीमारी के फैलाव को रोका जा सके।
इस अवसर पर किसानों को सितंबर महीने में पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से लगाए जा रहे किसान मेलों के बारे में भी जानकारी दी गई और इन मेलों में अधिक से अधिक संख्या में शामिल होने की अपील की गई। इसके अलावा ग्रामीण बच्चों के लिए विश्वविद्यालय की ओर से चलाए जा रहे विभिन्न पाठ्यक्रमों के बारे में भी जानकारी साझा की गई।
कैंप के आयोजन में गांव के अमरीक सिंह, मुख्तियार सिंह, गुरमीत सिंह, परदीप सिंह और अन्य किसानों ने विशेष सहयोग दिया। कैंप के दौरान किसानों के लिए पशुओं के लिए खनिज मिश्रण तथा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के कृषि साहित्य की बिक्री भी की गई।






