भवानीगढ़/संगरूर, 8 सितंबर, 2026 (छत्रपाल सिंह): पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना के फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर द्वारा किसानों तक कृषि की नई और वैज्ञानिक तकनीकों को पहुंचाने के लिए चलाई जा रही जागरूकता मुहिम के तहत गांव मट्टरा (भवानीगढ़ के नजदीक) में विशेष जागरूकता कैंप लगाया गया। कैंप में 30 से अधिक प्रगतिशील किसानों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। कैंप के दौरान धान और बासमती में अधिक पैदावार लेने, पराली को बिना जलाए खेत में ही संभालने, फोक (खाली दानों) की समस्या कम करने, मिट्टी की सेहत सुधारने और घरेलू बगीचे को बढ़ावा देने संबंधी विस्तृत जानकारी दी गई।
कैंप को संबोधित करते हुए डॉ. अशोक कुमार गर्ग, वरिष्ठ प्रसार वैज्ञानिक (मृदा विज्ञान) एवं प्रभारी, पीएयू-फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, संगरूर ने किसानों से अपील की कि धान की पराली को आग लगाकर बहुमूल्य पोषक तत्वों और जैविक पदार्थ को नष्ट करने के बजाय इसे खेत की खाद तथा मिट्टी की सेहत सुधारने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाए। उन्होंने बताया कि पराली प्रबंधन के लिए हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, पीएयू स्मार्ट सीडर और सरफेस सीडिंग-कम-मल्चिंग जैसी तकनीकों के माध्यम से गेहूं की सीधी बिजाई की जा सकती है। उन्होंने किसानों को इन तकनीकों का सही ढंग से और समय पर इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित किया।

डॉ. गर्ग ने बताया कि एक टन धान की पराली जलाने से लगभग 400 किलोग्राम जैविक कार्बन, 5.5 किलोग्राम नाइट्रोजन, 2.3 किलोग्राम फास्फोरस, 25 किलोग्राम पोटाश और 1.2 किलोग्राम सल्फर का नुकसान होता है। इसलिए पराली को आग लगाने के बजाय खेत में ही मिलाने या उचित मशीनरी के माध्यम से इसका प्रबंधन करने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति और जैविक स्वास्थ्य में सुधार किया जा सकता है।
कैंप के दौरान धान में फोक की समस्या के बारे में भी किसानों को वैज्ञानिक जानकारी दी गई। डॉ. गर्ग ने बताया कि जब धान गोभ अवस्था में हो, तो फोक कम करने के लिए 1.5 प्रतिशत पोटैशियम नाइट्रेट (13:0:45) का छिड़काव किया जा सकता है। इसके लिए 3 किलोग्राम पोटैशियम नाइट्रेट को 200 लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ छिड़काव करने की सलाह दी गई।
उन्होंने किसानों को धान और बासमती में पत्ती लपेट सुंडी, शीथ ब्लाइट और ब्लास्ट सहित प्रमुख कीटों एवं बीमारियों की पहचान, निगरानी तथा पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की सिफारिशों के अनुसार इनके प्रबंधन के बारे में भी जानकारी दी।
डॉ. गर्ग ने किसानों को खरीफ फसल की कटाई के बाद मिट्टी की जांच करवाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने मिट्टी का नमूना लेने की सही विधि के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए कहा कि मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का इस्तेमाल करने से अनावश्यक खाद के प्रयोग को कम करने, खेती की लागत बचाने और मिट्टी की सेहत बनाए रखने में मदद मिलती है।
उन्होंने आगामी रबी की गेहूं फसल के लिए जैविक टीकों (कंसोर्टियम) के इस्तेमाल के लाभों के बारे में भी बताया तथा मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और मिट्टी के जैविक स्वास्थ्य में सुधार के विभिन्न तरीकों पर किसानों के साथ विचार-विमर्श किया। किसानों को रबी में बोई जाने वाली पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की अनुशंसित गेहूं की किस्मों, विशेष रूप से पीबीडब्ल्यू 887 तथा शुगर के लिए अनुशंसित किस्म पीबीडब्ल्यूआरएस 1 आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई।
घरेलू बगीचे के महत्व को ध्यान में रखते हुए किसानों को सर्दी के मौसम की ताजी और पौष्टिक सब्जियां घर में ही उगाने के लिए प्रेरित किया गया। इस अवसर पर पीएयू द्वारा तैयार की गई सर्दी के मौसम की सब्जियों की किटों के बारे में जानकारी दी गई और इन्हें बिक्री के लिए भी उपलब्ध करवाया गया। इसके साथ ही पीएयू साहित्य की प्रदर्शनी और बिक्री भी की गई।
कैंप के दौरान किसानों को पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना द्वारा आगामी रबी सीजन के संबंध में आयोजित किए जा रहे किसान मेलों के बारे में भी जानकारी दी गई। कैंप के सफल आयोजन में श्री गुरतेज सिंह और श्री जसपाल सिंह (सरपंच) ने पूर्ण सहयोग दिया।
कैंप के अंत में किसानों ने गेहूं की नई किस्मों के बीज, नैनो-यूरिया, मिट्टी और पानी के नमूने लेने की विधि, जैविक पदार्थ बढ़ाने, पराली प्रबंधन और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन से संबंधित सवाल पूछे, जिनका डॉ. गर्ग ने वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीके से जवाब दिया।





