भारतीय कृषि केवल अनाज पैदा करने वाला क्षेत्र नहीं है, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका, गांवों और शहरों की अर्थव्यवस्था तथा देश की खाद्य सुरक्षा का मूल आधार है। लेकिन इस बुनियादी आधार की नींव आज बढ़ते कर्ज, महंगी खेती, अस्थिर बाजार भाव, मौसमी जोखिमों और घटती आय की चुनौतियों से हिल चुकी है। खास तौर पर छोटे और सीमांत किसानों के लिए खेती अब केवल उत्पादन का माध्यम नहीं रही, बल्कि कर्ज चुकाने और अगली फसल के लिए फिर से पैसा जुटाने का चक्र बनती जा रही है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019 में किए गए “सिचुएशन असेसमेंट सर्वे ऑफ एग्रीकल्चरल हाउसहोल्ड्स” से जुड़े आंकड़ों के अनुसार देश के लगभग 65 प्रतिशत किसान परिवार कर्ज के बोझ तले थे। इसी संबंध में सरकार द्वारा पेश किए गए आंकड़ों में लगभग 52 प्रतिशत कृषि परिवारों के कर्जदार होने का उल्लेख भी मिलता है। दोनों आंकड़ों की परिभाषा और सर्वेक्षण इकाई अलग होने के कारण इन्हें एक ही मापदंड नहीं माना जाना चाहिए।
इस समस्या की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि भारत में कृषि परिवारों की औसत भूमि जोत लगातार घट रही है—2003 में 0.725 हेक्टेयर से घटकर 2013 में 0.592 और 2019 में केवल 0.512 हेक्टेयर रह गई। छोटी जोत का अर्थ है कि किसान के पास मशीनरी, बीज, खाद, सिंचाई और अन्य खर्चों का बोझ उठाने के लिए कम पैमाना होता है।
पंजाब इस संकट का एक महत्वपूर्ण उदाहरण है। यहां कृषि उत्पादकता देश के कई हिस्सों की तुलना में अधिक है, लेकिन इसके साथ जमीन का किराया, डीजल, खाद, कीटनाशक, मजदूरी, मशीनरी और पानी की लागत भी काफी अधिक है।
पंजाब में किसान क्रेडिट कार्ड के तहत बकाया कर्ज मार्च 2021 के लगभग ₹54,526 करोड़ से बढ़कर मार्च 2025 में ₹57,536 करोड़ हो गया। इसी अवधि में सक्रिय खातों की संख्या में कमी आई। इसका मतलब यह नहीं है कि हर किसान की स्थिति एक जैसी है, लेकिन यह जरूर दर्शाता है कि कर्ज लेने वाले किसानों पर औसत कर्ज का बोझ बढ़ा है।
इससे भी बड़ी चिंता यह है कि किसान वर्ग का कर्ज बढ़ना अपने आप में खुशहाली का प्रमाण नहीं है। यदि कर्ज का इस्तेमाल उपज से होने वाली आय को दोबारा निवेश करने के बजाय पुराने कर्ज को चुकाने, घरेलू खर्चों या फसल के नुकसान अथवा अन्य जरूरतों को पूरा करने में किया जाए, तो यह आय पैदा करने के बजाय कर्ज के चक्र को लंबा करता है।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। सरकारी आंकड़ों में कृषि और संबद्ध क्षेत्रों की नाममात्र वृद्धि दर 2024-25 में 10.4 प्रतिशत रही। लेकिन कृषि की कुल आर्थिक वृद्धि दर और एक किसान परिवार के हाथ में बचने वाली आय एक ही चीज नहीं हैं।
किसान की वास्तविक आर्थिक स्थिति जानने के लिए फसल की कीमत में वृद्धि की तुलना उत्पादन लागत, कर्ज के ब्याज, जमीन के किराए और परिवार के खर्चों से करनी पड़ती है।
इसीलिए सरकार का आर्थिक सर्वेक्षण भी मानता है कि छोटे और सीमांत किसानों में मौसमी तथा बाजार के झटकों को सहने की क्षमता कम होती है और उनकी मोलभाव करने की ताकत भी कमजोर होती है।
केंद्र सरकार 22 फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित करती है और 2018-19 से लागत के निर्धारित मानक पर न्यूनतम 50 प्रतिशत रिटर्न का सिद्धांत लागू करने की बात करती है।
लेकिन न्यूनतम समर्थन मूल्य की घोषणा और हर किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अपनी फसल बेचने का अवसर मिलना दो अलग-अलग बातें हैं। जहां सरकारी खरीद मजबूत है, वहां किसान को अधिक सुरक्षा मिलती है; जहां खरीद व्यवस्था कमजोर है, वहां घोषित MSP किसान के लिए पूरी आय-सुरक्षा नहीं बन पाता।
इसीलिए किसान नीति में केवल MSP बढ़ाने के बजाय खरीद, भंडारण, प्रसंस्करण, बाजार तक पहुंच और फसल बीमा को एक साथ देखना जरूरी है।
कर्ज केवल बैंक की पासबुक में दर्ज रकम नहीं होता। जब किसी किसान को हर फसल से पहले यह सोचना पड़े कि बीज, खाद और डीजल का पैसा कहां से आएगा, प्रकृति मेहरबान होगी या कहर बरपाएगी और फसल बेचने के बाद पुराने कर्ज का भुगतान कैसे किया जाएगा, तो इसका प्रभाव पूरे परिवार और पूरे किसान वर्ग पर पड़ता है।
चिंता, नींद की समस्या, पारिवारिक तनाव, बच्चों की पढ़ाई पर असर और सामाजिक दबाव इस संकट के अनदेखे पहलू हैं। इसलिए किसान संकट को केवल “कर्ज माफी” के नजरिए से देखना अधूरा है।
2024 में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार पंजाब में कृषि से जुड़े 90 लोगों, जिनमें 84 किसान और 6 कृषि मजदूर शामिल थे, की आत्महत्याएं दर्ज हुईं, जबकि देश स्तर पर किसानों और कृषि मजदूरों की आत्महत्याओं की संख्या 10,546 रही। इन आंकड़ों को देखते हुए यह भी याद रखना चाहिए कि आत्महत्या के कारण बहुआयामी होते हैं और केवल कर्ज को इसका एकमात्र कारण मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है।
कर्ज माफी संकट के समय राहत दे सकती है, लेकिन यह स्थायी इलाज नहीं है। यदि किसान की आय और खेती की लागत के बीच का अंतर बना रहता है, तो कुछ वर्षों बाद नया कर्ज फिर खड़ा हो जाता है।
किसान की खुशहाली के दीर्घकालिक समाधान के लिए पांच मोर्चों पर काम करना जरूरी है:
पहला—आय की स्थिरता। न्यूनतम समर्थन मूल्य, सरकारी खरीद, कीमत में कमी की भरपाई और फसल बीमा को प्रभावी बनाना।
दूसरा—कर्ज सुधार। छोटे किसानों को समय पर, कम ब्याज दर पर और लचीले भुगतान विकल्पों वाला संस्थागत कर्ज उपलब्ध कराया जाए। सरकारी आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार 2025 में किसान क्रेडिट कार्ड के 7.72 करोड़ सक्रिय खातों में लगभग ₹10.20 लाख करोड़ बकाया था और गैर-संस्थागत कर्ज का हिस्सा 2021-22 तक घटकर 23.4 प्रतिशत रह गया था।
तीसरा—फसल विविधीकरण। पंजाब जैसे राज्यों में केवल गेहूं-धान पर निर्भरता कम करके दालों, तिलहन, मक्का, सब्जियों, फलों, पशुपालन और अन्य मूल्यवर्धित गतिविधियों को मजबूत किया जाए।
चौथा—किसान को उत्पादक से उद्यमी बनाना। किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), भंडारण, कोल्ड चेन, प्रसंस्करण और सीधे बाजार तक पहुंच के माध्यम से किसान को केवल कच्चा माल बेचने वाला न रहने दिया जाए।
पांचवां—मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा। गांव स्तर पर काउंसलिंग, कर्ज सलाह केंद्र और संकटग्रस्त परिवारों के लिए तत्काल सहायता प्रणाली विकसित की जाए।
भारतीय कृषि को अब केवल “उत्पादन बढ़ाने” वाली नीति से आगे ले जाना होगा।
उत्पादन + लाभकारी कीमत + कम जोखिम + सस्ता कर्ज + बाजार तक पहुंच + सामाजिक सुरक्षा।
इन सभी तत्वों के एक साथ होने पर ही किसान की खेती टिकाऊ बन सकती है।
किसान को बार-बार कर्ज देकर बचाना कोई स्थायी समाधान नहीं है, बल्कि खेती को ऐसी अर्थव्यवस्था बनाना ही समाधान है जिसमें किसान की आय उसकी लागत, मेहनत और जोखिम के अनुरूप हो।
आज का सवाल है—“क्या किसान की खेती उसके कर्ज को चुकाने के लिए पर्याप्त आय पैदा कर रही है?”
अगर जवाब नहीं में है, तो यह सिर्फ किसान का संकट नहीं है—यह पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और फिर देश की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर चेतावनी है।
“नो फार्मर, नो फूड”
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







