Wednesday, November 4, 2026
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कुर्सी की तलब, वादों के गड़े

जब जनसेवा का दावा सत्ता की लालसा के नीचे दब जाए, तो मतदाता की सूझ-बूझ ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ढाल बनती है।

लोकतंत्र में चुनाव केवल प्रतिनिधियों को चुनने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के अपने भविष्य का फैसला करने का एक महत्वपूर्ण अवसर होते हैं। लेकिन जब राजनीति का उद्देश्य जनसेवा के बजाय सत्ता हासिल करना बन जाए, तो मतदाताओं की उम्मीदों, मजबूरियों और भावनाओं को चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की प्रवृत्तियाँ भी सामने आने लगती हैं। ऐसे माहौल में सवाल केवल यह नहीं रह जाता कि कौन चुनाव जीतेगा, बल्कि मुद्दा यह बन जाता है कि जनता अपने फैसले की ताकत किसके हाथों में सौंप रही है।

चुनाव नजदीक आते ही कई उम्मीदवारों के वादों में अचानक तेजी आ जाती है। कोई नौकरियाँ देने की बात करता है, कोई महँगाई कम करने का दावा करता है, कोई सड़कों के विकास का भरोसा देता है, तो कोई कुछ ही महीनों में नशे खत्म करने तथा अस्पतालों और स्कूलों की तस्वीर बदलने का आश्वासन देता है। जनकल्याणकारी योजनाओं की घोषणा करना गलत नहीं है, लेकिन बिना बजट, समय-सीमा और ठोस कार्ययोजना के किए गए वादे जनता को गुमराह करते हैं।

मतदाताओं को सवाल पूछना चाहिए कि यह वादा कैसे पूरा होगा, इसके लिए पैसा कहाँ से आएगा, काम कितने समय में पूरा होगा और पहले किए गए वादों का क्या हुआ? लोकतंत्र में किसी वादे की असली कीमत तभी तय होती है, जब उसे अमल की कसौटी पर परखा जाता है।

कुछ राजनीतिक दल लोगों को साझा मुद्दों पर एकजुट करने के बजाय जाति, धर्म, संप्रदाय, क्षेत्र या भाषा के आधार पर बाँटने की कोशिश करते हैं। कभी किसी समुदाय को खतरे का एहसास कराया जाता है, कभी दूसरे वर्ग के प्रति नफरत पैदा की जाती है और कभी ऐतिहासिक घटनाओं को चुनावी लाभ के लिए चुनिंदा तरीके से प्रस्तुत किया जाता है।

ऐसी राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, नशे, भ्रष्टाचार और विकास जैसे वास्तविक मुद्दे पीछे छूट जाते हैं। जनता को समझना चाहिए कि किसी भी धर्म, जाति या समुदाय का सम्मान करना जरूरी है, लेकिन उसकी भावनाओं का राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की पड़ताल करना भी उतना ही आवश्यक है।

चुनावों के दौरान नकदी, उपहार, शराब या अन्य लाभ देकर मतदाताओं को प्रभावित करने की कोशिश लोकतंत्र की नींव को कमजोर करती है। इसी तरह किसी वास्तविक कल्याणकारी योजना को राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाना और सरकारी संसाधनों का निजी राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

मतदाताओं को याद रखना चाहिए कि एक दिन का लालच पाँच साल के फैसले पर भारी नहीं पड़ना चाहिए। अपने वोट को निजी सौदे की वस्तु बना देना अपने ही अधिकारों का मूल्य घटाने के बराबर है।

आज चुनावी प्रचार का एक बड़ा हिस्सा मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के माध्यम से चलाया जाता है। काट-छाँटकर तैयार किए गए वीडियो, बिना सबूत के आरोप, पुरानी तस्वीरों को नए संदर्भ में पेश करना, झूठी खबरें और बढ़ा-चढ़ाकर किए गए दावे मतदाताओं की सोच को प्रभावित कर सकते हैं। किसी संदेश का बार-बार सामने आना उसे सच नहीं बना देता।

एक जागरूक नागरिक को खबर के स्रोत, तारीख, सबूत और उसकी विश्वसनीयता की पड़ताल जरूर करनी चाहिए। बिना पुष्टि वाली सामग्री को आगे भेजने से परहेज करना भी लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र में नेता जनता के मालिक नहीं, बल्कि जनता के चुने हुए प्रतिनिधि होते हैं। उनकी जवाबदेही चुनाव के दिन से नहीं, बल्कि चुनाव जीतने के अगले दिन से शुरू हो जाती है। इसलिए उम्मीदवार की पिछली कार्यशैली, ईमानदारी, सार्वजनिक व्यवहार, कानून के प्रति सम्मान और लोगों के साथ उसके वास्तविक संबंधों को परखना जरूरी है।

वोट केवल उंगली पर लगने वाली स्याही नहीं, बल्कि जनता के भविष्य पर लगने वाली मुहर है। इसका इस्तेमाल नारों, लालच, डर या नफरत के आधार पर करने के बजाय तथ्यों, विवेक और जवाबदेही को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

कुर्सी की दौड़ में उम्मीदवार बदल सकते हैं, पार्टियाँ बदल सकती हैं और नारे भी बदल सकते हैं, लेकिन यदि मतदाता अपनी सूझ-बूझ खो बैठें, तो उनकी समस्याएँ जस की तस बनी रह सकती हैं।

इसलिए जागरूक मतदाता बनें, सवाल पूछें, सबूत माँगें और सोच-समझकर फैसला करें। क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत कुर्सी पर बैठे व्यक्ति में नहीं, बल्कि उसे चुनने वाली जनता की जागरूकता में होती है।

छत्रपाल सिंह

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