वृद्धावस्था अब पारिवारिक रहमो-करम का विषय नहीं, बल्कि कानून की जिम्मेदारी।
भारत में बुजुर्गों की देखभाल, सुरक्षा और सम्मान का मुद्दा लंबे समय से पारिवारिक जिम्मेदारी और सामाजिक परंपराओं तक सीमित रहा है। लेकिन बदलते पारिवारिक ढांचे, अकेले रह रहे बुजुर्गों की बढ़ती संख्या, बच्चों का रोजगार के लिए विदेशों और दूसरे शहरों की ओर पलायन, संपत्ति विवादों तथा बुजुर्गों के साथ हो रहे शारीरिक, मानसिक और आर्थिक शोषण ने इस मामले को एक गंभीर सामाजिक चुनौती बना दिया है। ऐसे हालात में केरल विधानसभा द्वारा 26 अक्टूबर 2026 को सर्वसम्मति से पारित किया गया ‘केरलम सीनियर सिटीजन्स (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल, 2026’ देश की बुजुर्ग कल्याण नीति में एक महत्वपूर्ण कानूनी पहल के रूप में सामने आया है।
इस बिल की विशेषता यह है कि यह बुजुर्गों की देखभाल को केवल परिवार की दया या सरकारी सहायता तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उनके जीवन, स्वास्थ्य, निजता, संपत्ति, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा के लिए एक व्यापक कानूनी ढांचा तैयार करने का प्रयास करता है। मुख्यमंत्री वी.डी. सतीशन द्वारा विधानसभा में पेश किए गए इस बिल को विषय समिति की जांच और संशोधनों के बाद सत्तापक्ष तथा विपक्ष के सदस्यों की सहमति से पारित किया गया। हालांकि विधानसभा से पारित होना और राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद कानून बनना दो अलग-अलग चरण हैं। 6 नवंबर तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह बिल राज्यपाल की मंजूरी की प्रतीक्षा में है।
बुजुर्गों की बढ़ती संख्या ने खड़ी की नई चुनौती: केरल ने यह कानूनी कदम किसी एक घटना के आधार पर नहीं उठाया, बल्कि राज्य की बदलती जनसांख्यिकी इसके पीछे एक बड़ा कारण है। उपलब्ध जनसंख्या आंकड़ों के अनुसार, 2011 में केरल की आबादी में 60 वर्ष या इससे अधिक आयु के लोगों की हिस्सेदारी लगभग 12.7 प्रतिशत थी, जो 2021 में बढ़कर करीब 15 प्रतिशत हो गई। अनुमान है कि 2051 तक राज्य की लगभग 30 प्रतिशत आबादी बुजुर्ग वर्ग से संबंधित होगी। इसका अर्थ है कि आने वाले दशकों में स्वास्थ्य सेवाओं, वृद्ध देखभाल केंद्रों, घरेलू सहायकों और सामाजिक सुरक्षा की मांग काफी बढ़ेगी।
इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए बिल में 60 वर्ष या इससे अधिक आयु के नागरिकों के लिए देखभाल और सुरक्षा के प्रावधानों को व्यवस्थित रूप देने की व्यवस्था की गई है। इसका एक अहम सिद्धांत यह है कि बुजुर्ग व्यक्ति जहां तक संभव हो, अपने घर में ही सुरक्षित और स्वतंत्र जीवन व्यतीत कर सके। संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प के रूप में देखा गया है, न कि बुजुर्ग को परिवार से अलग करने के आसान रास्ते के रूप में।
वृद्धाश्रमों और देखभाल केंद्रों की होगी निगरानी: इस बिल का एक महत्वपूर्ण पहलू बुजुर्गों की देखभाल के नाम पर चल रही संस्थाओं को नियमों के दायरे में लाना है। वृद्धाश्रम, रिटायरमेंट होम, सहायक आवास केंद्र, डे-केयर सेंटर, हॉस्पिस, घरेलू देखभाल एजेंसियों और देखभाल करने वालों को प्रशिक्षण देने वाली संस्थाओं के लिए पंजीकरण तथा निर्धारित मानकों का पालन अनिवार्य बनाने का प्रावधान है।
इन केंद्रों में रहने वाले बुजुर्गों को सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सेवाएं, साफ-सफाई, खान-पान, मनोरंजन और सामाजिक गतिविधियों की सुविधाएं मिलनी चाहिए। किसी भी संस्था को बुजुर्गों की मजबूरी का फायदा उठाकर उनके साथ दुर्व्यवहार या आर्थिक शोषण करने की छूट नहीं होगी। बिना पंजीकरण के ऐसे केंद्र चलाने पर एक साल तक की कैद या 25 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान भी रखा गया है।
देखभाल करने वालों के लिए प्रशिक्षण और पुलिस सत्यापन: बुजुर्गों की सेवा के लिए नियुक्त व्यक्ति का केवल अनुभवी होना ही पर्याप्त नहीं, बल्कि उसका प्रशिक्षित और भरोसेमंद होना भी जरूरी है। इसी उद्देश्य से बिल में ‘केरलम जेरियाट्रिक केयर सर्टिफिकेशन फ्रेमवर्क’ स्थापित करने का प्रस्ताव है। इसके तहत देखभाल करने वालों के लिए निर्धारित पाठ्यक्रम, पेशेवर प्रशिक्षण, पहचान और पृष्ठभूमि का सत्यापन तथा समय-समय पर दोबारा प्रशिक्षण देने की व्यवस्था होगी।
विशेष रूप से अकेले रह रहे बुजुर्गों के घरों में रहकर सेवा करने वाले और आवासीय केंद्रों में काम करने वाले देखभाल कर्मचारियों के लिए पुलिस सत्यापन का प्रावधान है। उनका रजिस्टर भी तैयार किया जाएगा, जिसके माध्यम से परिवार उनकी योग्यता और प्रमाणिकता के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे।
इस व्यवस्था का दूसरा पहलू देखभाल कर्मचारियों के अपने अधिकारों की रक्षा करना है। उन्हें न्यूनतम वेतन, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां, शोषण से सुरक्षा और लागू सामाजिक सुरक्षा लाभ देने की व्यवस्था भी शामिल है।
बुजुर्गों पर अत्याचार करने वालों के लिए सख्त सजा: बिल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बुजुर्गों के साथ होने वाली हिंसा, प्रताड़ना, संपत्ति हड़पने और बेसहारा छोड़ने जैसे अपराधों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना है। परिवार का कोई सदस्य, रिश्तेदार, कानूनी वारिस या देखभाल केंद्र का कर्मचारी यदि किसी बुजुर्ग के साथ अत्याचार करता है, उसकी संपत्ति पर गैरकानूनी कब्जा करता है या उसकी सहमति के बिना उसे बेसहारा छोड़ देता है, तो तीन साल तक की कैद और 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है।
इसके अलावा, कानून के क्रियान्वयन में जानबूझकर बाधा डालने पर दो साल तक की कैद और 25 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है। यदि किसी डॉक्टर या पंजीकृत देखभाल केंद्र को जांच के दौरान बुजुर्ग के साथ गंभीर दुर्व्यवहार या लापरवाही के सबूत मिलते हैं, तो निर्धारित परिस्थितियों में 48 घंटे के भीतर जिला सुरक्षा इकाई को रिपोर्ट देना अनिवार्य होगा। बिना उचित कारण ऐसा नहीं करने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रस्ताव है।
संपत्ति और इलाज संबंधी फैसले लेने का अधिकार: बुजुर्गों की संपत्ति अक्सर पारिवारिक विवादों का कारण बनती है। कई मामलों में माता-पिता से संपत्ति अपने नाम करवाने के बाद उनकी देखभाल करने से इनकार करने की घटनाएं भी सामने आती हैं। इसलिए बिल में बुजुर्गों द्वारा अपनी संपत्ति या बैंक में जमा राशि किसी संस्था अथवा व्यक्ति को अपनी मर्जी से देने की स्थिति में विशेष जांच और सुरक्षा प्रक्रिया रखी गई है। ऐसे समझौते जिला मजिस्ट्रेट की मौजूदगी में करवाने का प्रावधान है, ताकि किसी तरह के दबाव या धोखाधड़ी की संभावना न रहे।
एक अन्य महत्वपूर्ण प्रावधान ‘लिविंग विल’ है। इसके माध्यम से बुजुर्ग व्यक्ति पहले ही लिखित रूप में अपनी इच्छा दर्ज करवा सकता है कि जीवन के अंतिम चरण में गंभीर बीमारी की स्थिति में वह किस प्रकार के चिकित्सकीय उपचार या जीवन को लंबा करने वाली प्रक्रियाओं के बारे में क्या निर्णय लेना चाहता है। इसमें वेंटिलेटर, ऑक्सीजन, कीमोथेरेपी, गहन चिकित्सा और अन्य जीवन रक्षक उपचारों के संबंध में इच्छाएं दर्ज की जा सकती हैं।
हालांकि, इस व्यवस्था को लागू करते समय सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘कॉमन कॉज’ मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करना बेहद जरूरी है। इस संबंध में विधानसभा में भी सुरक्षा प्रक्रिया को लेकर सवाल उठे थे। इसलिए बिल के क्रियान्वयन के दौरान स्पष्ट और मजबूत नियम बनाना महत्वपूर्ण होगा।
स्वास्थ्य, डिजिटल सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी: यह बिल केवल आवास या पारिवारिक देखभाल तक सीमित नहीं है। इसमें बुजुर्गों के लिए विशेष स्वास्थ्य सेवाएं, जेरियाट्रिक क्लीनिक, मोबाइल मेडिकल यूनिट, हॉस्पिस तथा अल्जाइमर, डिमेंशिया और पार्किंसंस जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए विशेष देखभाल केंद्रों की व्यवस्था भी शामिल है।
इसके अलावा बुजुर्गों को मुफ्त कानूनी सहायता, चश्मे, सुनने वाली मशीनें, चलने-फिरने के सहायक उपकरण और अन्य जरूरी उपकरण उचित कीमतों पर उपलब्ध करवाने का प्रावधान है। डिजिटल बैंकिंग और सरकारी सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले बुजुर्गों को ऑनलाइन धोखाधड़ी से बचाने के लिए विशेष साइबर सुरक्षा इकाइयां बनाने का प्रस्ताव भी है। प्रत्येक साइबर पुलिस थाने में सीनियर सिटीजन्स साइबर सेल स्थापित करने का प्रावधान इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
पंजाब समेत अन्य राज्यों के लिए भी सबक
केरल की यह पहल पंजाब जैसे राज्यों के लिए भी विशेष महत्व रखती है। पंजाब में विदेशों की ओर पलायन, गांवों में अकेले रह रहे बुजुर्ग माता-पिता, संपत्ति विवाद, वृद्धाश्रमों की कार्यप्रणाली और स्वास्थ्य सुविधाओं की असमान उपलब्धता ऐसे मुद्दे हैं, जिनके लिए ठोस नीति और प्रभावी निगरानी की जरूरत है।
भारत में पहले से ही ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ लागू है, जिसमें बच्चों द्वारा माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी, भरण-पोषण न्यायाधिकरण और बुजुर्गों को बेसहारा छोड़ने के खिलाफ कार्रवाई के प्रावधान हैं। लेकिन केरल का नया बिल देखभाल केंद्रों के पंजीकरण, कर्मचारियों के प्रशिक्षण, साइबर सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और बुजुर्गों के विशेष अधिकारों को एक ही कानूनी ढांचे में जोड़ता है।
इस बिल की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद इसे कितनी ईमानदारी से लागू किया जाता है, सुरक्षा इकाइयों को कितने संसाधन उपलब्ध करवाए जाते हैं और पीड़ित बुजुर्गों को कितनी जल्दी न्याय मिलता है। कानून बनाना पहला चरण है; उसका पालन करवाना और हर बुजुर्ग तक उसका लाभ पहुंचाना ही असली परीक्षा होगी।
केरल की यह पहल एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव की ओर संकेत करती है—बुजुर्गों की देखभाल अब केवल पारिवारिक कर्तव्य नहीं, बल्कि उनके कानूनी अधिकारों, सामाजिक सुरक्षा और सरकारी जवाबदेही का विषय बन रही है।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







