पंजाब, 30 जुलाई 2026 (गुरप्रीत सिंह): पंजाब में बढ़ती धान की खेती ने देश के खाद्यान्न उत्पादन में अहम योगदान दिया है, लेकिन इसके साथ ही पराली जलाने की समस्या पर्यावरण के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। IIT मंडी के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक नए अध्ययन में चेतावनी दी गई है कि यदि पराली जलाने पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो वर्ष 2040 तक पंजाब के कई क्षेत्रों में हवा की गुणवत्ता खतरनाक स्तर तक पहुंच सकती है।
यह अध्ययन IIT मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग की शोधकर्ता हरसिमरनजीत कौर रोमाणा ने एसोसिएट प्रोफेसर डैरिक पी. शुक्ला और अमेरिका के प्रोफेसर रमेश पी. सिंह के मार्गदर्शन में किया है। यह शोध ब्रिटेन की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है।
रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब में हर साल करीब 90 लाख टन पराली जलाई जाती है, जिससे ब्लैक कार्बन, ओजोन, कार्बन मोनोऑक्साइड और PM2.5 जैसे खतरनाक प्रदूषक वातावरण में फैलते हैं। इसका असर केवल पंजाब तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दिल्ली-एनसीआर और पूरे उत्तर भारत में गंभीर वायु प्रदूषण की स्थिति पैदा हो जाती है।
शोधकर्ताओं के मुताबिक, पंजाब का मालवा क्षेत्र प्रदूषण के सबसे बड़े हॉटस्पॉट के रूप में उभर रहा है, जबकि माझा और दोआबा क्षेत्रों में भी वायु गुणवत्ता लगातार खराब हो रही है। सैटेलाइट डेटा के विश्लेषण से सामने आया है कि पराली जलाने की घटनाओं और वायु प्रदूषण के बीच 60 से 81 प्रतिशत तक सीधा संबंध है।
अध्ययन में यह भी पाया गया कि पराली जलाने से हर साल मिट्टी में मौजूद लगभग 8.24 लाख टन जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं, जिससे भूमि की उर्वरता प्रभावित होती है। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि पूरे राज्य के लिए एक समान नीति लागू करने के बजाय जिला और ब्लॉक स्तर पर स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार योजनाएं तैयार की जानी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मौजूदा स्थिति जारी रही तो फिरोजपुर, होशियारपुर और रूपनगर जैसे जिलों में वर्ष 2040 तक जहरीली गैसों का स्तर खतरनाक सीमा तक पहुंच सकता है, जिसका सीधा असर लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ेगा।






