जो पंजाब कभी “देश का अन्न भंडार” कहलाता था, आज वह अपने ही विकास मॉडल के बोझ तले धीरे-धीरे दबता जा रहा है। खेतों के नीचे पानी का स्तर लगातार गिर रहा है, युवा नशे की दलदल में फंसते जा रहे हैं और पढ़े-लिखे लड़के-लड़कियों के लिए विदेश जाना ही एकमात्र “सपना” बनता जा रहा है। यह लेख केवल समस्याओं की चर्चा नहीं करता, बल्कि जमीनी हकीकत, आंकड़ों और ठोस नीतिगत समाधानों की ओर भी संकेत करता है।
गिरता भूजल और खेती का संकट
पंजाब की कृषि, विशेष रूप से धान-गेहूं के चक्र ने भूजल का बड़े पैमाने पर दोहन किया है। शोध के अनुसार, भारत के सभी राज्यों में पंजाब की फसल सघनता सबसे अधिक, लगभग 190 प्रतिशत है। यही कारण है कि भूजल दोहन के मामले में पंजाब देश में सबसे आगे है। पंजाब के नीचे फैला सिंधु बेसिन का जलभंडार दुनिया के सबसे तेजी से खाली हो रहे जलभंडारों में दूसरे स्थान पर बताया जाता है।
छोटे जोत वाले किसान इस संकट का सबसे अधिक बोझ उठा रहे हैं। गहरे ट्यूबवेल या बोरवेल लगवाने का खर्च बड़े किसानों के लिए अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन गरीब किसान के लिए यह कर्ज का एक और दौर शुरू कर देता है। इस तरह पानी की असमानता सामाजिक और आर्थिक खाई को और गहरा कर रही है।
इस संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि:
- छोटे किसानों के लिए सूक्ष्म सिंचाई पर सब्सिडी और आसान पहुंच सुनिश्चित की जाए।
- पानी बचाने वाले किसानों को सीधे आर्थिक प्रोत्साहन दिया जाए।
- भूजल पुनर्भरण के लिए गांव स्तर पर तालाबों और नहरों के ढांचे की मरम्मत की जाए।
फसल विविधीकरण अब भी चुनौती
सरकारी खरीद और न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी मुख्य रूप से धान और गेहूं तक सीमित रहने के कारण किसान वैकल्पिक फसलों की ओर जाने से हिचकते हैं। मक्का, दालों और कपास जैसी फसलों के लिए भरोसेमंद मंडी और खरीद व्यवस्था का अभाव है। साथ ही, प्रसंस्करण ढांचा विकसित करने की जरूरत भी बनी हुई है।
सरकारें वर्ष-दर-वर्ष फसल विविधीकरण का नारा देती रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव की गति अभी भी बहुत धीमी है।
घटती पैदावार और बढ़ती लागत से जूझ रहे कई किसान परिवार अब अपने किसी सदस्य को ईंट-भट्ठों, निर्माण कार्य या विदेश भेजकर परिवार का खर्च चलाने को मजबूर हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रवासी आय पर अधिक निर्भर होती जा रही है और परिवारों की सामाजिक संरचना भी कमजोर पड़ रही है।
जरूरी कदमों में शामिल हैं:
- वैकल्पिक फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य से जुड़ी खरीद व्यवस्था का चरणबद्ध विस्तार।
- खाद्य प्रसंस्करण उद्योग को गांवों तक पहुंचाना, ताकि किसानों की उपज का मूल्य बढ़ाया जा सके।
पराली और प्रदूषण की चुनौती
हर वर्ष सर्दियों की शुरुआत में पराली जलाने से पैदा होने वाला धुआं पंजाब के शहरों और ग्रामीण इलाकों में लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल कर देता है। अल्पकालिक प्रतिबंध और जुर्माने हर साल लगाए जाते हैं, लेकिन वैकल्पिक समाधान जैसे पराली प्रबंधन मशीनों की सस्ती उपलब्धता तथा पराली को ईंधन या खाद में बदलने वाले उद्योग अभी भी सीमित स्तर पर हैं।
इसके परिणामस्वरूप बच्चों की स्कूलों से गैर-हाजिरी और कामकाजी लोगों के स्वास्थ्य पर हर साल प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
नशा: पंजाब का सबसे गंभीर संकट
आज पंजाब का सबसे संवेदनशील और दर्दनाक मुद्दा नशा है। शोध के अनुसार, वर्ष 2015 में ही पंजाब में 2 लाख 30 हजार से अधिक लोग अफीम श्रेणी के नशीले पदार्थों पर निर्भर थे। वहीं, 2022 के एक सर्वेक्षण के अनुसार 15.4 प्रतिशत निवासियों ने नशे के सेवन की बात स्वीकार की।
वर्ष 2015 से 2024 के बीच नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटांसेज (एन.डी.पी.एस.) एक्ट के तहत 51 हजार से अधिक मामले दर्ज किए गए और 4,600 किलोग्राम से अधिक हेरोइन जब्त की गई।
अब नशे का कारोबार केवल पारंपरिक रास्तों तक सीमित नहीं है। कई अन्य माध्यमों से भी यह नेटवर्क फैल रहा है। सीमावर्ती क्षेत्रों के बेरोजगार युवा कथित तौर पर 20,000 से 30,000 रुपये प्रति खेप के लालच में इस अवैध नेटवर्क का हिस्सा बन रहे हैं। बेरोजगारी, मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और नशीले पदार्थों की आसान उपलब्धता—ये तीनों मिलकर संकट को और गंभीर बना रहे हैं।
समाधान के लिए जरूरी है:
- गांव स्तर पर नशा मुक्ति केंद्रों और जागरूकता शिविरों की संख्या तथा संसाधन बढ़ाए जाएं।
- ओपिओइड सब्स्टीट्यूशन थेरेपी तक पहुंच को आसान बनाया जाए।
- स्कूल स्तर पर नशा रोकथाम कार्यक्रम चलाए जाएं और नशा छोड़ चुके लोगों के प्रति सामाजिक कलंक कम किया जाए।
- आधुनिक तकनीक के माध्यम से नशीले पदार्थों की आपूर्ति रोकने के साथ प्रभावित क्षेत्रों के युवाओं के लिए रोजगार के वैकल्पिक अवसर पैदा किए जाएं।
युवाओं के सामने रोजगार का संकट
डिप्लोमा या डिग्री हासिल कर चुके छोटे शहरों के युवाओं के लिए अपनी योग्यता के अनुसार नौकरी पाना मुश्किल होता जा रहा है। स्थानीय उद्योगों से जुड़ी व्यावसायिक प्रशिक्षण व्यवस्था की कमी के कारण शिक्षा से रोजगार तक का रास्ता कमजोर बना हुआ है।
नतीजतन, बड़े शहरों या विदेश की ओर पलायन युवाओं को सबसे आसान रास्ता दिखाई देता है। इससे गांवों से कुशल और शिक्षित युवाओं का लगातार पलायन हो रहा है।
जरूरत है कि:
- कृषि-प्रसंस्करण, कपड़ा उद्योग, खेल सामग्री जैसे स्थानीय उद्योगों से सीधे जुड़े कौशल विकास कार्यक्रम शुरू किए जाएं।
- छोटे शहरों में स्टार्टअप और लघु उद्योगों के लिए आसान ऋण तथा आवश्यक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराया जाए।
शहरों पर बढ़ता दबाव
पंजाब के तेजी से बढ़ते शहरों में सड़कों, सीवरेज, सार्वजनिक परिवहन और किफायती आवास की मांग लगातार बढ़ रही है। दूसरी ओर, नगर निकायों की वित्तीय स्वायत्तता सीमित है।
लाभार्थियों की पहचान में कमियां और योजनाओं के कमजोर क्रियान्वयन के कारण कई सरकारी योजनाओं का लाभ जमीनी स्तर तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता।
इसके लिए जरूरी है:
- स्थानीय सरकारों को अधिक वित्तीय अधिकार दिए जाएं और खर्च की पारदर्शी निगरानी सुनिश्चित की जाए।
- डिजिटल ट्रैकिंग के माध्यम से सरकारी योजनाओं का लाभ सही व्यक्ति तक पहुंचाया जाए।
पंजाब के सामने बदलाव की चुनौती
पंजाब का जमीनी संकट केवल पानी, नशे या बेरोजगारी तक सीमित नहीं है। यह एक कृषि-प्रधान और संसाधन-गहन मॉडल से विविध तथा ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण का संकट है।
इस बदलाव के लिए केवल सरकारी नीतियां ही पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि गांव-गांव और घर-घर की भागीदारी भी जरूरी है। जल संसाधनों में सुधार, कृषि विविधीकरण, लक्षित कौशल एवं स्वास्थ्य निवेश, मजबूत शहरी सेवाएं और बेहतर क्रियान्वयन क्षमता—इन सभी को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।
तभी पंजाब अपनी समृद्धि और अपनी युवा शक्ति को फिर से संभाल सकेगा।
समय अभी भी हाथ से पूरी तरह नहीं निकला है, लेकिन देरी की हर घड़ी धरती, पानी और युवा—तीनों से भारी कीमत वसूल करेगी।
गुरमीत सिंह तुंग
ब्यूरो चीफ (98552 21193)







